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गांधी की सच्चाई बता दी जाए तो उनके नाम पर चल रही इंडस्ट्री का क्या होगा?

वृहस्पतिवार भोपाल लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के गांधी और गोडसे पर की गई टिप्पणी पर बहुत वबाल हुआ जो अपेक्षित था। लेकिन अगर गोडसे से हमें इतनी तकलीफ़ है तो हम इसका इलाज क्यों नहीं ढूंढते?

गोडसे को हमेशा के लिए ख़त्म करने का सबसे बेहतर और आसान तरीक़ा यह है कि गांधी को भगवान के भी सुपरपूज्य पिताजी मानना और सारी दुनिया पर भी उन्हें यही मानने की आतंकवाद की हद तक कट्टरवादी ज़िद थोपना बन्द कर दिया जाए; और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रकाश में बिल्कुल निष्पक्ष और ईमानदार नज़रिए से गाँधी जी के तमाम विचारों, शब्दों और कर्मों का आँकलन कर के देखा जाए कि उन्होंने अपने जीवनकाल में भारत के तत्कालीन वर्तमान और भविष्य पर किस तरह के दूरगामी प्रभाव डाले।

लेकिन ऐसा करने में सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि अगर एक बार भी ऐसा किया गया, तो गांधी राजनीति के बाज़ार में इतनी आसानी से और इतने महँगे दामों में बेचने लायक प्रॉडक्ट नहीं रह जाएँगे, जितनी उनकी ब्रैंडिंग की गई है इतने दशकों तक। बल्कि विडंबनापूर्ण सत्य यह है कि जिस सत्य का आग्रह सदा गांधी की कम से कम ज़बान पर रहा, उसी सत्य की कसौटी पर अगर उनके होने को अपनी समग्रता में कस दिया गया, तो उनकी स्टॉक वैल्यू हमेशा के लिए दरअसल शून्य से भी नीचे चली जाएगी।

जानते हैं ऐसा क्यों है? अगर ठंडे दिमाग़ से सुन-समझ सकें, तो व्यापार की निर्मम भाषा में सुनें। ऐसा इसलिए है कि बतौर एक प्रॉडक्ट गाँधी जी अब अपनी एक्सपायरी डेट से कहीं आगे निकल चुके हैं, इसलिए अब उन्हें ज़बर्दस्ती बेचने की कोशिश करते रहना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं होगा। लेकिन उससे भी कहीं आगे के दर्जे की मूर्खता होगी गोडसे पर यह आरोप लगाना कि उसकी कंपनी ने मार्केटिंग में बड़ी रक़म झोंक कर गांधी को नॉन-सेलेबल प्रॉडक्ट घोषित करवा दिया है।

भारत में छपने वाला एक-एक करेंसी नोट गांधी की तस्वीर लेकर उनकी मार्केटिंग का टूल रहा है। उनके नाम पर ख़र्च किए जाते हज़ारों-लाखों करोड़ रुपए, उनके नाम से जोड़ी गई हज़ारों सरकारी संपत्तियाँ, उनके ऊपर तथाकथित शोध को समर्पित अरबों का बजट लेने वाली सैंकड़ों संस्थाएँ, उन पर लिखी गई हज़ारों किताबें, उन पर बनाई गई दसियों फ़ीचर और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में ― यह सब उस बेहद ताक़तवर मार्केटिंग का हिस्सा रही हैं जो गांधी को किसी भी प्रश्न से ऊपर स्थित, भगवान के सुपरपूज्य पिताजी बतौर गढ़ने और थोपने के लिए भारत की जनता के ही पैसे से की गई क्योंकि यह उन्हें राजनीति की मंडी में धड़ल्ले से बिकने वाले एक लाजवाब प्रॉडक्ट की शक्ल देती थी।

[pullquote]गोडसे है क्योंकि गांधी हैं। गांधी ख़त्म तो गोडसे भी ख़त्म।[/pullquote]

जबकि गोडसे की मार्केटिंग के लिए तो उसके कोर्ट में दिए गए बयान को भी संविधान को ठेंगे की नोंक पर रखते हुए जनता तक पहुँचने से प्रतिबंधित कर दिया गया, उसकी मृत्यु के पूरे 20 साल बाद तक। क्यों किया गया ऐसा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को धार देने के लिए? 20 सालों तक चले मुक़दमे के बाद 1968 में बम्बई हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में गोडसे द्वारा अदालत में दिए गए उस बयान पर लगा प्रतिबंध हटाया, तब लोगों को मालूम चला कि उसने उस दिन कहा क्या था। क्या यह था गांधी के ‘सत्य’ का आग्रह? और तो और, गोडसे के उस बयान पर किसी ने मराठी में मी नाथूराम गोडसे बोलतोय नाम से एक नाटक लिखा तो उसके मंचन को तोड़फोड़, दंगा-फ़साद कर के रोका गया; उसे दो-दो राज्यों में सरकारों द्वारा प्रतिबंधित किया गया। फिर से बम्बई हाईकोर्ट ने 2001 में उसके मंचन की इजाज़त दी तो उसके कलाकारों को ले जाती बस में दिनदहाड़े आग लगा दी गई। क्या यह अराजक गुंडागर्दी थी गांधी के ‘सत्याग्रह’ की नज़ीर? कड़वी सच्चाई यह है कि गोडसे की मार्केटिंग तो यहाँ अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन गाँधी जी की इतनी भारी-भरकम अतिवादी मार्केटिंग जो की जा चुकी है आज तक, उसके लूपहोल्स ही दरअसल आज गोडसे को रिवर्स मार्केटिंग की सुविधा मुफ़्त में उपलब्ध करवा रहे हैं।

इसलिए गोडसे की संभावनाओं को शुरुआत में ही समाप्त कर देने के लिए ज़रूरी है कि गांधी को भगवान के पूज्य पिताजी मनवाने की ज़िद बन्द कर दी जाए, और इन दोनों को ही चर्चा के दायरे से धीरे-धीरे बाहर कर दिया जाए। गांधी अब और ज़्यादा नहीं बेचे जा सकते, लेकिन गोडसे-गोडसे चीख़ते हुए उन्हें उपभोक्ता तक ज़बर्दस्ती ठेलने की हर कोशिश गोडसे को ही चर्चा में लाएगी और उसे बेचने वालों को ही फ़ायदा देगी, इसे अपने दिमाग़ की सबसे गहरी नसों में बैठा लिया जाना चाहिए। गोडसे है क्योंकि गांधी हैं। गांधी ख़त्म तो गोडसे भी ख़त्म।

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मुख्य न्यायाधीश और #MeToo के दोहरे मापदंड

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय पर उनके घरेलू दफ़्तर में काम कर चुकी एक औरत द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच हेतु बनाई गई कमेटी के अध्यक्ष ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने कहा है कि यह आरोप सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय को कमज़ोर करने के लिए किसी बहुत बड़ी साज़िश के तहत लगाए गए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर होगा मीडिया इस मामले में ज़्यादा बातें न फैलाए (क्यूँकि कचहरी में एक दिन उन्हें भी आना पड़ सकता है), और अपने ऊपर ‘नियंत्रण’ रखे (क्यूँकि क़ायदे में रहोगे तो फ़ायदे में रहोगे)।

बाक़ी और भी कुछ अतिमहत्वपूर्ण बातें कहीं ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने, जैसे ―

  1. “आज बहुत ही संगीन मसला है इसलिए मैं शनिवार को भी कोर्ट में आया हूँ” (इसलिए 99999999999999 करोड़ पृथ्वियों के वज़न से भी ज़्यादा भारी इस अहसान के नीचे कुचल कर इस देश के हर आम नागरिक को आज रात ही कुत्ते की मौत मर जाना चाहिए)।

  2. “आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद-बेहद-बेहद बड़े ख़तरे में आ गई है” (इसीलिए हत्या-बलात्कार-लूटमार-भ्रष्टाचार जैसे फ़ालतू वाहियात ग़ैर-ज़रूरी 5 करोड़ मुक़दमे यहाँ 70 सालों से लटके हुए हैं और ‘बालकनी में चिड़ियों को दाना क्यूँ न खिलाएँ’ टाइप ब्रह्मांडीय महत्व के मुक़दमों पर सुप्रीम कोर्ट में रोज़ाना अहम बहसें जारी हैं)।

  3. “पानी अब सर से ऊपर जाने लगा है” (क्यूँकि जनता ने अभी तक ब्रिटिश ग़ुलामी की विरासत के गूँ में सड़ चुकी न्याय-व्यवस्था की खाद बनाने के लिए फावड़ा नहीं उठाया है अपने हाथ में)।

  4. “मुझ पर आरोप लगाने वाली औरत का आपराधिक इतिहास रहा है” (जिसमें उसके ख़िलाफ़ पूरे जीवनकाल में सिर्फ़ साल 2011 में अपने पड़ोसियों से हुए मात्र एक झगड़े की दोतरफ़ा रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी, जिसमें हुए आपसी सुलहनामे के बाद मुक़दमे की समाप्ति की सरकारी कॉपी भी वह पहले ही सार्वजनिक कर चुकी है)।

  5. “यही सब चलता रहा तो अब ‘अच्छे लोग’ न्यायपालिका में नहीं आएँगे (क्यूँकि ‘कॉलेजियम’ वाले परिवारों के सारे होनहार नन्हें-मुन्ने उस कृतघ्न स्त्री द्वारा किए गए इस घोर अत्याचार तथा जघन्य पाप से आहत हो कर आज रात के अँधेरे में ही लँगोट धारण कर के सन्यासी बनने के लिए हिमालय पर्वत की ओर निकल जाएँगे), और

  6. “कल रात से अब तक 4 मीडिया हाउस मुझसे इन घटिया आरोपों को लेकर प्रतिक्रिया माँग चुके हैं” (इसलिए इन चारों के मालिकान अब अपनी खाल उतरवाने के लिए उस्तरा भी ख़ुद ही ख़रीद लें, अब मालूम चलेगा इन्हें क्या चीज़ होती है कोर्ट-कचहरी)।

बाक़ी ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने उस ‘विशेष रूप से बुलाई गई अदालत’ में जो नहीं कहा लेकिन हर इंसान को कान खोल कर ख़ुद अपनी ही आवाज़ में सुन लेना चाहिए, वह है ―

“इस मामले में
1. #MeToo के $^%&!%& का @!$#%&, और
2. #BelieveTheWoman गया @#$&!$ की $#^&&@ का $#@%#!& लेने.”

दोहरे मापदंड

पिछले साल बॉलीवुड में #MeToo आंदोलन की धूम रही. बहुत सी स्त्रियों ने लंबे समय के बाद सामने आकर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के कड़वे अनुभव साँझा किए. ज़ाहिर है, उनमें से कुछ एक काफ़ी हद तक झूठे या तिल का ताड़ बनाने वाले भी रहे होंगे, लेकिन फिर भी सबको #BelieveTheWoman की शरण में सही मानने के दबाव डाले गए. याद रखें इन सभी स्त्रियों के पास कोई फ़ोटो, कोई वीडियो, कोई ऑडियो रिकॉर्डिंग, कोई ख़तो-किताबत, कोई स्क्रीनशॉट मौजूद नहीं थे अपनी बात को साबित करने के लिए सबूत बतौर. फिर भी उन सबको संदेह का लाभ दिया गया.

आज एक साल बाद एक 35 साला शादीशुदा औरत जो कि क़ानून की छात्रा रही है और भारत के मुख्य न्यायाधीश के घरेलू दफ़्तर में बतौर कोर्ट असिस्टेंट कार्यरत रही एक अरसे तक, वह सामने आती है और मुख्य न्यायाधीश पर अपने साथ यौन उत्पीड़न तथा उसका विरोध किए जाने के बाद उसके पूरे परिवार से भयानक बदला लिए जाने के आरोप पूरी तफ़सील से, एक-एक ब्यौरा देते हुए लगाती है, देश के 22 वरिष्ठतम न्यायाधीशों को न्याय की गुहार लगाते हुए। ध्यान दें, वह उस यौन उत्पीड़न के लिए न्याय नहीं माँग रही है, वह उस घिनौने, पैशाचिक और हैवानियत से भरे योजनाबद्ध प्रतिशोध से बचाव की गुहार लगा रही है, जो कथित रूप से उस दिन उसको ज़बर्दस्ती अपनी बाँहों में भर रहे गोगोई साहब को परे धकेलने के बाद उसके परिवार के एक-एक सदस्य से लगातार लिया जा रहा है।

पहले ‘एक दिन की छुट्टी बिना बताए लेने’ जैसे आधार पर उसे सीधे बर्खास्त किया गया, फिर एक-एक कर के उसके पूरे परिवार की नौकरियां छीनी गईं, उन पर सिलसिलेवार तरीक़े से फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाए गए (जिन सबके ब्यौरे उसने दिन-तारीख़ों के साथ मय सबूत अपने हलफ़नामे में दिए हैं), उन्हें नाजायज़ तरीक़े से कितनी ही बार पुलिस द्वारा उठा कर थाने में 24 घंटे से भी अधिक समय तक हथकड़ियां डाल कर बैठाया गया (जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग वह सबूत के तौर पर लगा चुकी है) ― जो कि सीधे सीधे मानवाधिकार विरोधी अपराध की श्रेणी में आता है।

उसके द्वारा दिए गए साक्ष्यों में मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग के अलावा तिलक मार्ग थाने के एसएचओ के साथ हुए वार्तालाप की गोपनीय कैमरे से की गई वीडियो रिकॉर्डिंग भी है जिसमें थानाध्यक्ष महोदय सहानुभूति से भरे स्वर में पूछ रहे हैं कि “मैडम किसी बड़े आदमी से ग़लती हो जाएगी तो क्या वो अपनी ग़लती मानेगा, आप ही बताओ?” उसके पास उन एसएमएस के स्क्रीनशॉट्स भी हैं जो उसके पति ने मुख्य न्यायाधीश के सचिव को भेजते हुए ‘किसी भी तरह उन्हें इस भयानक प्रताड़ना से मुक्ति दिलवाने’ की गिड़गिड़ाते हुए अर्जी लगाई थी, और कहा था कि उनका ‘परिवार तबाह हो चुका है, और सिर्फ़ CJI साहब ही उन पर दया कर सकते हैं’। उस कथित यौन उत्पीड़न वाले दिन के बाद से बर्खास्तगी तक बिना किसी बुनियाद के उसके लगातार किए गए तबादलों के भी साक्ष्य हैं जिन्हें देख कर मालूम होता है कि यह किसी का मानसिक उत्पीड़न करने के लिए ही लगाए जा रहे हैं।

याद रखें और अपने दिमाग़ में ड्रिल मशीन से छेद करके अच्छी तरह से याद रखें, कि यह 35 साला औरत क़ानून के ही क्षेत्र में काम करती रही है, और अच्छे से जानती है कि बिना मज़बूत साक्ष्यों के इतने ताक़तवर और ग़ैर-जवाबदेह पद पर बैठे व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई भी आरोप लगाना कितना ज़्यादा भारी पड़ सकता है। इसलिए भले ही वह अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को कभी साक्ष्यों के आधार पर साबित न कर सके, लेकिन अपने परिवार के एक-एक सदस्य के योजनाबद्ध, राक्षसी और भयंकर उत्पीड़न के बारे में उसके द्वारा कही गई एक-एक बात प्रमाणों, साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर इतनी मज़बूत है कि अगर इस देश में न्याय जैसी किसी चिड़िया का एक पर भी बाक़ी है और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच कर के न्याय हुआ, तो इसमें बहुत सारे लोग बहुत क़ायदे से नपेंगे इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं।

लेकिन फिर भी, उस #MeToo और #BelieveTheWoman का ज़ोरशोर से अंधा समर्थन कर रहे बहुत से लोग आज उसके द्वारा दिए गए मज़बूत सबूतों और साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ कर के उसके आरोपों को ‘संदेहास्पद’ बता रहे हैं. यह रवैया क्या है, हम कभी समझ पाएँगे?

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तो क्या हुआ अगर The Tashkent Files राजनैतिक फ़िल्म है?

Film review: पूरी ज़िम्मेदारी से कह रहा हूँ, PM Narendra Modi जैसी वाहियात फ़िल्म लोकसभा चुनाव 2019 में नरेन्द्र मोदी का जितना बंटाधार कर सकती थी, उसका 1,000 गुना ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस का The Tashkent Files कर गुज़रेगी। लेकिन विपक्षी दल तथा उनके रणनीतिकार इस बात के आँकलन में व्यापक धोखे के शिकार हो गए और ग़लत फ़िल्म की रिलीज़ रुकवाने के लिए राशन-पानी लेकर सवार हो गए।

फ़िल्म में कोई बड़ा सुपरस्टार (अक्षय-अजय-आमिर-सलमान जैसा कोई ‘बिकाऊ सुपरस्टार’) भले ही नहीं है, कलाकार सब एक से एक धुरंधर हैं — नसीरुद्दीन शाह, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक से लेकर राजेश शर्मा, प्रकाश बेलावड़ी, विश्व मोहन बडोला, मंदिरा बेदी और लंबे अरसे बाद दिखीं पल्लवी जोशी तक। और अंत में 80 के दशक में ‘ग़रीबों के देवता’ रहे मिथुन चक्रवर्ती एक बार फिर से साबित करते हैं कि नॉन-कमर्शियल भूमिकाओं में भी वे बार-बार नेशनल अवॉर्ड यूँ ही कैसे झटक लाते रहे हैं।

The Tashkent Files की ख़ूबियाँ

फ़िल्म के पीछे की गई रिसर्च बेहद ही सशक्त है; मैंने इससे पहले किसी भी हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म में आधिकारिक दस्तावेज़ों, पुस्तक अंशों, दुर्लभ आर्काइव खंगाल कर इकट्ठा किए गए साक्षात्कारों तथा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रमों की वीडियो क्लिप्स का ऐसा इस्तेमाल नहीं देखा जो इसे निश्चित रूप से एक डॉक्युमेंट्री फ़िल्म का फ़ील देता है। किसी ने मुझे बताया था कि विवेक अग्निहोत्री इस विषय पर पिछले 8-10 सालों से शोध कर रहे थे, और जिस बारीकी से एक मंजे हुए वक़ील की तरह इस फ़िल्म के माध्यम से वे सिलसिलेवार तरीक़े से चीज़ें पेश करते हैं, उसे देख कर यह बहुत असंभाव्य नहीं लगता। तथ्यों, अवधारणाओं और सन्देहों के कसे हुए ताने-बाने से बुनी गई यह फ़िल्म अपनी समग्रता में एक पक्ष को ठोस तरीक़े से रखती है।

लेकिन फ़िल्म चूँकि भारतीय राजनीति के इतिहास की एक बेहद सनसनीख़ेज़ घटना — द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु — की परतें खोलने का इरादा रखती है, इसलिए इसके कलेवर में एक भावनात्मक रूखापन और खुरदराहट आ जाते हैं जो इसे देखते वक़्त एक समय के बाद माहौल को भारी और बोझिल बना देता है।

इस जैसी फ़िल्मों को लागत और थिएटर दोनों ही ज़्यादा नहीं मिलते, इसलिए इसकी प्रोडक्शन वैल्यूज़ में वह कमियाँ साफ़ दिखाई देती हैं। विशेष रूप से संगीत इसका बहुत ही कमज़ोर है, और वे गाने न भी होते तो कोई ख़ास नुक़सान नहीं होता। लेकिन मेरे लिए यह देखना काफ़ी विचित्र था कि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद उसकी स्क्रीन पर दी जा रही जानकारियों का स्क्रोल देखने के लिए भी सिनेमा हॉल में सभी दर्शक जमे रहे। जब क्रेडिट्स आना शुरू हुए तभी थिएटर खाली होना शुरू हुआ।

लेकिन इन तमाम ख़ूबियों-कमियों के बावजूद यह कहना बिल्कुल भी ईमानदार नहीं होगा कि यह फ़िल्म किसी राजनैतिक उद्देश्य को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई है। The Tashkent Files अपनी संरचना में ही एक राजनैतिक फ़िल्म है और इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न तीखे होते हुए भी एक पक्ष विशेष की ओर ही उंगलियाँ उठाते हैं। साथ ही इसकी रिलीज़ का समय भी अपने आप में काफ़ी कुछ कहता है। लेकिन इस क़िस्म की फ़िल्म बनाना न तो इस देश में कोई नई बात है और न ही पहली बार की गई कोई शुरुआत। कुछ ही उदाहरण पेश करूँ तो परज़ानिया, फ़िराक़, शाहिद, हैदर जैसी हर फ़िल्म एक विशुद्ध राजनैतिक उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म होती है; और The Tashkent Files भी उसी सिलसिले की एक अगली कड़ी भर है जो न पहली होगी और न ही आख़िरी।

  1. जो इसे प्रोपेगैंडा फ़िल्म मानते हैं उन्हें आक्रोश को भी प्रोपेगैंडा फ़िल्म मानना होगा, परज़ानिया को भी, शाहिद को भी, हैदर को भी, उड़ता पंजाब को भी, और 12 ऑस्कर जीतने वाली गांधी को भी।
  2. चूँकि यह फ़िल्म एक राजनैतिक स्टैंड रखती है, इसलिए इसके राजनैतिक स्टैंड से इत्तफ़ाक़ रखना या न रखना हर इंसान का अपना निजी हक़ है। लेकिन जब आप एक फ़िल्म समीक्षक के तौर पर किसी फ़िल्म को परख रहे होते हैं तब उसके मंतव्य से अधिक उसकी एक कलाकृति के रूप में संरचना तथा क्राफ़्ट का मूल्यांकन करते हैं। मसलन बहुत से लोगों की हैदर के राजनैतिक मंतव्य से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके बेहद उम्दा क्राफ़्ट को कोई भी ख़ारिज नहीं कर सकता।
  3. इसीलिए, यदि The Tashkent Files की राजनीति के प्रति किसी फ़िल्म समीक्षक का विरोध है तो वह एक बिल्कुल अलग बात है, लेकिन सिर्फ़ उस विरोध के कारण इसके क्राफ़्ट को भी कोई फ़िल्म समीक्षक एक या आधा स्टार दे रहा है तो कहना पड़ेगा कि यह उस फ़िल्म समीक्षक की अपने कर्तव्य के प्रति बेईमानी है।

अंत में, अपनी निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अंत तक फ़िल्म बनाना एक बेहद मुश्किल काम है। लेकिन फ़िल्म बनाने से भी मुश्किल काम अगर कोई है, तो वह है हर प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सर्वथा निरपेक्ष भाव से किसी भी फ़िल्म के कंटेंट और क्राफ़्ट का निष्पक्ष मूल्यांकन करना।

जिस दिन आप यह पाएँ कि किसी फ़िल्म की समीक्षा करते समय आपके अंदर का इंसान आपके अंदर के समीक्षक पर हावी हो जाता है, उस दिन यह काम करना छोड़ देना चाहिए। फ़िल्म समीक्षा करना बिल्कुल किसी मरीज़ का सर्जिकल ऑपरेशन करने जैसा है, जिसमें निजी भावनाओं और पसंद-नापसंद या प्रेम-घृणा के लिए नहीं बल्कि वस्तुनिष्ठ आँकलन और सटीक तथा सार्थक चीरफाड़ की दरकार होती है। जो ऐसा निष्पक्ष, संतुलित तथा वस्तुनिष्ठ रवैया ख़ुद में न ला सकें, उन्हें फ़िल्मों का नीम हक़ीम बनने की बजाय फ़िल्म इंडस्ट्री के किसी विभाग में कम्पाउंडर बन जाना चाहिए।

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सिम्म्बा: फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो

[यह फ़िल्म समीक्षा नहीं है, ‘फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो’ देखने की लत रखने वाले एक औसत दर्शक का औसत अनुभव भर है. फ़िल्म समीक्षा के लिए मानक मीडिया स्रोतों का अवलोकन करें.]

‘सिम्म्बा’ के बारे में 9 बातें.

1. जैसा कि ट्रेलर से लग रहा था, सिम्म्बा सिर्फ़ दबंग, सिंघम और राउडी राठौड़ की कतरनें जोड़ कर कॉप फ़िल्म बनाने की कोशिश ही है, और इन तीनों से काफ़ी पीछे छूट जाती है. फिर भी औसत मसाला मनोरंजन दे ही देती है और ठीक-ठाक कमाई कर के सिनेमाई कचरात्मकता से तड़पते रहे वर्ष 2018 को जाते-जाते कुछ राहत देकर विदा करेगी.

2. रोहित शेट्टी प्रख्यात खलनायक तथा फाइट मास्टर शेट्टी के लायक बेटे हैं और 15 साल के अनुभव के बाद अब आँख बन्द कर के भी कमाऊ मसाला एक्शन फ़िल्म बना सकते हैं. यह भी उन्होंने आँख बन्द कर के ही बनाई है, क्यूँकि आँखें खोल कर वे अजय देवगन वगैरह के साथ ही बनाते हैं फ़िल्में. (अगली फ़िल्म कैनेडियन राष्ट्रवादी अक्षय कुमार जी के साथ बनाएँगे, उसका ज़िक्र आगे है.)

3. दक्षिण भारतीय फ़िल्म टैम्पर के इस ऑफ़िशियल रीमेक का पूर्वार्द्ध काफ़ी कमज़ोर है, चीज़ें काफ़ी देर तक आगे ही नहीं बढ़ती हैं. इंटरवल के बाद कथाप्रवाह में गति आती है और रुचि जगती है. कथानक इसका लेकिन बेहद घिसापिटा है 80 की फ़िल्मों जैसा ही, लोगों को अब नवीनता चाहिए कॉप फ़िल्म्स में भी.

4. 156 मिनट की लंबाई काफ़ी ज़्यादा है इसके लिए. संपादक महोदय आराम से आधा घंटा उड़ा कर अपनी मेहनत बचाते हुए मज़े कर सकते थे. ख़ैर, उनकी मेहनत, उनकी मर्ज़ी.

5. फ़िल्म अपने उत्तरार्द्ध में स्त्री सुरक्षा और विशेषतया बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के बारे में काफ़ी देर तक बात करती है. अच्छी बात यह है कि यह फ़िल्म ऐसे अपराधों के लिए अपराधियों के साथ-साथ उनकी माँओं व अन्य स्त्री संबंधियों को भी उन्हें उचित सीख न दिए जाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराती है.

6. सारा अली ख़ान की भूमिका और अभिनय उतने ही ज़ोरदार हैं जितने ‘सिंघम’ में काजल अग्रवाल और ‘राउडी राठौड़’ में सोनाक्षी सिन्हा के थे. उन्हें अलग से नहीं जानने वाले नोटिस भी नहीं कर पाएँगे वो इसमें हैं. रोहित शेट्टी की पारिवारिक एक्शन फ़िल्मों की तरह इसमें भी एक्सपोज़र या किसिंग सीन वगैरह नहीं हैं तो सारा के लिए अपनी प्रतिभा साबित करने के लिए कुछ ख़ास मौक़े भी नहीं हैं. कोई नहीं, सारा निराश न हों. बेहतरीन मौक़े अभी बहुत आएँगे, फ़िलहाल हिट देना ज़रूरी है.

7. इस फ़िल्म में संगीत था या नहीं, मुझे अब बिल्कुल भी याद नहीं है. हालाँकि सालों पहले देखी गई ‘सिंघम’ में ‘बदमाश दिल’ नाम का एक ख़ूबसूरत नग़मा था ये मुझे आज तक बख़ूबी याद है. इस बारे में इतना ही कहना है.

8. जैसी उम्मीद थी, रणवीर सिंह जी के नाज़ुक नाटकीय लचकदार कन्धे एक टफ़ कॉप फ़िल्म का बोझ संभालने में बुरी तरह से पिचक गए, और फ़िल्म का आख़िरी आधा घंटा पहुँचते-पहुँचते तो दोहरे हो गए. रोहित शेट्टी चूँकि एक्शन फ़िल्मों के मंजे हुए फ़िल्म निर्देशक हैं, इसलिए अपने नायक की हड्डियों के साथ-साथ फ़िल्म का सुरमा बनते उन्होंने देख लिया, और अपने संकट मोचक परम इष्ट अजय देवगन रूपी ‘सिंघम सर’ का सच्चे मन से स्मरण किया और उनसे प्रकट होने का आह्वान किया. यक़ीन मानिए, सच में फ़िल्म में सिंघम सर की एंट्री दबंग वाले छेदी सिंह के अड्डे पर चूहे की तरह बंधे हुए और कुटाई खा रहे रणवीर सिंह जी (इंस्पेक्टर सिम्म्बा) को बचाने के दृश्य में ही होती है. उसके बाद से फ़िल्म सिंघम सर की ही है, सिम्म्बा जी एक ओर खड़े रह कर हमारी ही तरह फ़िल्म देखते हैं. ये है इस फ़िल्म के नायक महोदय की हालत! उफ़्फ़!!

9. और अंत में इतना ही नहीं, भ्रष्ट इंस्पेक्टर सिम्म्बा को सभी जाँच संबंधी संकटों से मुक्त करने के बाद सिंघम सर एटीएस चीफ़ बनने की बधाई देते हुए जिन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी महोदय का फ़ोन रिसीव करते हैं, वे और कोई नहीं बल्कि कैनेडियन राष्ट्रवादी श्री अक्षय कुमार जी रूपी आईपीएस अधिकारी महोदय ही हैं, जिनके वर्ष 2019 में ‘सूर्यवंशी’ नाम से आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) प्रमुख का कार्यभार संभालने की फ़िल्म में बाक़ायदा औपचारिक घोषणा की गई है. बस तकनीकी एवं प्रक्रियागत कारणों से गृह मंत्रालय के लैटर पैड पर छपा नियुक्ति पत्र दिखाने की कसर भर छोड़ दी गई, चूँकि आगामी वर्ष में गृह मंत्रालय में व्यापक फ़ेरबदल की संभावना है. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सिंघम सर 2020-2021 तक छुट्टी पर ही रहेंगे, और जब लौटेंगे तो कम से कम अतिरिक्त ज़िला पुलिस अधीक्षक अथवा एडिशनल एसपी के पद तक अवश्य पहुँच चुके होंगे. अकेले अपने दम पर ऐसे सभी कर्मठ, जाँबाज़, समर्पित एवं क़ाबिल पुलिस अधिकारियों की मार्वलनुमा फ़ौज खड़ी करने के लिए माननीय श्री रोहित शेट्टी जी का मैं तहेदिल से अभिनन्दन करता हूँ, तथा भविष्य में उन्हें किसी वीरता अलंकरण से विभूषित किए जाने की भारत सरकार से अनुशंसा करता हूँ! जय हिन्द, जय कोंकण, जय गोआ, जय महाराष्ट्र!!

Arvind Arora

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#MeToo के दो प्रकार

#MeToo की चीख़ों के बाज़ार में ख़ामोशी का एक खोटा सिक्का हमारी तरफ़ से भी।

बम्बई के मीरा रोड इलाक़े के सस्ते 1BHK फ्लैट में 3 और लड़कियों के साथ साँझे में रह कर, कैसी भी फ़िल्मों में कैसा भी रोल, कोई भी क़ीमत चुका कर पा जाने के लिए स्ट्रगल करती लड़की का तब भी एक #MeToo होता है, #MeToo याने ‘मुझे भी’ (मौक़ा चाहिए, बस एक मौक़ा)। लेकिन यह वाला #MeToo भूत-प्रेत के क़िस्से की तरह होता है ― इसकी सच्चाई में यक़ीन जता कर अपनी ‘प्रगतिशीलता’ और ‘संवेदनशीलता’ के स्कोर में कोई कटौती नहीं करवाना चाहता।

वही लड़की, सालों बाद, अपने उस ‘बस एक मौक़े’ की दी हुई सीढ़ियाँ क़ायदे से चढ़ कर जुहू या बान्द्रा के एक पॉश पैंटहाउस फ्लैट तक पहुँचने के बाद, एक दूसरा #MeToo बोलती है, जो सालों पहले ख़ुद उसके द्वारा ही बोले गए #MeToo के उलट होता है। यह वाला #MeToo याने ‘मेरे साथ भी’ दरअसल ‘ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जताई जा रही गम्भीर चिंता’ जैसा होता है, जिसके बारे में कुछ भी देखे-जाने-जाँचे-परखे बिना हर व्यक्ति इसके विशेषज्ञ की पट्टी अपने दरवाज़े पर चिपकाना चाहता है ― क्योंकि मुफ़्त में ‘प्रगतिशील’ और ‘संवेदनशील’ कहलाने का इससे ज़्यादा असरदार और कारगर नुस्ख़ा और कोई नहीं।

लेकिन पहले वाले #MeToo में और दूसरे वाले #MeToo में इतना फ़र्क़ क्यों है, कोई नहीं बताना चाहता।

अब बात तनुश्री और कंगना की, लेकिन पहले कंगना की। कंगना फ़िल्म इंडस्ट्री में बिना किसी जान-पहचान के आईं, और चूँकि यहाँ ऐसे काम मिलता नहीं किसी को, तो उन्होंने अपने गॉडफ़ादर बतौर चुना आदित्य पंचोली को, जो यूँ भी उनके फ़ादर की ही उम्र के थे। कंगना आदित्य के घर किस हैसियत से दो साल तक रहीं वही जानें, लेकिन आदित्य पंचोली की जो छवि रही है इंडस्ट्री में, यह मानना काफ़ी कठिन है कि उन्होंने अपना कोई हित सधे बिना कंगना का इतना साथ दिया होगा दो साल तक ― जिसमें उन्हें सीधे महेश भट्ट से मिलवाना भी शामिल है. अब महेश भट्ट अपनी फ़िल्मों में नई लड़कियों को किन आधारों पर मौक़ा देने के लिए जाने जाते रहे हैं, इस पर हम बात नहीं करेंगे क्यूँकि महेश ख़ुद ही इस बारे में सब कुछ खुल कर कह देते रहे हैं।

ख़ैर, दो साल तक आदित्य पंचोली के घर में टिकने के बाद गैंगस्टर में रोल मिलने के बाद कंगना ने सबसे खुल कर कहा कि आदित्य पंचोली उनका शारीरिक शोषण करना चाहते हैं, उन्हें जान से मारने की धमकी देते हैं, और वहाँ से चली गईं।

मेरा छोटा सा सवाल है एक, जिसका जवाब नहीं मिलता कहीं। उन दो सालों तक आदित्य पंचोली के घर में उनकी पत्नी याने ज़रीना वहाब और बेटी याने सना पंचोली नाम की दो औरतें और भी पल-पल लगातार मौजूद थीं; जब बिना किसी रिश्ते या हैसियत के, यहाँ तक कि बतौर एक पेइंग गेस्ट बुनियादी किराया तक चुकाए बिना कंगना पूरे दो साल तक जमी रहीं ― उसी घर की रोटियां तोड़ते हुए, और आदित्य पंचोली की ‘ख़ास दोस्ती’ का केन्द्र बनते हुए।

आज #MeToo के चूल्हे पर स्त्रियों की सहानुभूति की रोटियां सेंक कर स्त्रीवाद का झंडा बुलंद करने वाले किसी भी विमर्शकारी, क्रांतिकारी, आंदोलनकारी की आँखों में क्या कभी इतनी शर्म रही कि एक बार भी ज़रीना वहाब या सना पंचोली के #MeToo पर नज़र डालते?

संयोग की बात है कि इस #MeToo महाक्रांति की दूसरी धुरी, याने तनुश्री दत्ता ने जिस फ़िल्म आशिक़ बनाया आपने से ही फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था, उस फ़िल्म के शीर्षक गीत में तनुश्री दत्ता से जितना अंग प्रदर्शन करवाया गया था (यह हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के उन बेहद गिने-चुने गीतों में से है जिसमें नायिका पूरी तरह टॉपलेस याने अर्धनग्न अवस्था में है) उतना शायद ही किसी और नवोदित नायिका से करवाया गया हो ― तनुश्री की असहजता उस गीत में उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती है और उस वक़्त इंडस्ट्री में यह चर्चा आम था कि तनुश्री को सहजता देने के लिए इस गीत की शूटिंग के वक़्त सेट से सिर्फ़ डायरेक्टर, कोरियोग्राफर और सिनेमैटोग्राफर के अतिरिक्त सभी लोगों को बाहर कर दिया गया था।

क्या तब तनुश्री को एक बार भी महसूस नहीं हुआ कि उन्हें #MeToo कह कर उनके जिस्म के इस घिनौने इस्तेमाल का विरोध करना चाहिए था? जवाब साफ़ है, तनुश्री तब भी #MeToo कह रही थीं ― बस कि उस वक़्त उन्हें किसी भी क़ीमत पर फ़िल्म इंडस्ट्री में घुसना था, इसलिए वह पहली श्रेणी का #MeToo, याने ‘मुझे भी’ (मौक़ा चाहिए, बस एक मौक़ा) था। दूसरी श्रेणी का #MeToo याने ‘मेरे साथ भी’ कहने का वक़्त तनुश्री दत्ता के पास भी अब ही आया है, जब उनके करियर और उम्र का कारवां गुज़र चुका है, और उसके गुज़रने से उठा ग़ुबार देखने के अलावा वे कुछ और कर सकती हैं तो वह कुछ दिनों के लिए ही सही, एक और ग़ुबार खड़ा करना है, जो वे ठीक-ठाक हद तक करने में सफल भी रही हैं।