पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद चर्चा में है। पूरी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है। बात चाहे आईएसआईएस की हो, बोको हराम की हो, तालिबान की हो या फिर कश्मीर में सक्रिय लश्कर-ए-तोएबा, हिज्बुल मुजाहिदीन या हुजी जैसे आतंकी संगठनों की हो- भारत समेत पूरा विश्व इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है। लेकिन इसी इस्लामिक आतंकवाद के विषय पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जब पाठ्यक्रम शुरू करने की बात चली तो उसपर जबरदस्त विवाद शुरू हो गया। जेएनयू के अकादमिक परिषद ने राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया है। इसी के तहत इस्लामिक आतंकवाद पर भी पाठ्यक्रम होगा। विश्वविद्यालय के इस निर्णय के बाद से ही तमाम सेकुलरवादी और इस्लामिक संगठनों की ओर से विरोध शुरू हो गया है। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन डॉ जफरुल इस्लाम ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को नोटिस भेजकर उनसे पांच दिन में जवाब मांगा है। इस्लामिक विद्वानों का कहना है कि इस्लाम शांति और सुरक्षा का धर्म है। लिहाजा इसको आतंकवाद से जोड़ा जाना स्वीकार्य नहीं है। इसी तरह जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी जेएनयू के इस फैसले की आलोचना की है और कहा है कि इस्लाम को आतंकवाद से जोड़कर पेश करने की साजिश को मुसलमान कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। जमीयत का यह भी कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कदम देश के मुसलमानों को आहत करने वाला कदम है, क्योंकि भारतीय मुसलमान हमेशा शांति के समर्थक रहे हैं।
इस्लामिक धर्मावलंबियों ने तो विरोध किया ही, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी इसके विरोध में कूद पड़ीं। स्वाभाविक रूप से इस्लाम को मानने वाले लोगों के लिए यह बात स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए कि उनके मजहब को आतंकवाद से जोड़कर देखा जाए। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि पूरी दुनिया में जितनी भी आतंकवादी गतिविधियां हो रही है, उनमें 95 फीसदी से ज्यादा आतंकी गतिविधियां के आरोपी संयोगवश इस्लाम से ही जुड़े हुए हैं। इन सभी आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने वाले लोगों को हमेशा ही जन्नत मिलने का ख्वाब दिखाया जाता है, धर्म के नाम पर लोगों को ना केवल बेकसूरों की जान लेने के लिए उकसाया जाता है, बल्कि सुसाइड बॉम्बर बनने के लिए भी तैयार किया जाता है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पूरी दुनिया इन दिनों इस्लामी आतंकवाद के उभार से झुलसी हुई है। मध्य एशिया में आईएसआईएस ने जो कहर बरपाया उसका गवाह पूरा विश्व रहा है। भारत में भी कश्मीर आज अगर झुलस रहा है, तो इसकी मूल वजह इस्लामिक आतंकवाद ही है। पाकिस्तान के इशारे पर पलने वाले और कश्मीर में सक्रिय इन आतंकवादी संगठनों के सरगना आतंकवादियों को उत्साहित करने के लिए मजहब का नाम लेकर बड़ी-बड़ी तकरीर करते हैं। इन तकरीरों के कई वीडियो वायरल भी हो चुके हैं। हर इस्लामी स्कॉलर और इस्लामी नेता यह तो दावा जरूर करता है कि आतंकवादियों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन विडंबना ये है कि कोई भी इस्लामी संगठन आतंकवादियों के खिलाफ फतवा देने से बचता है। खुलेआम आतंकवाद की निंदा करने की हिम्मत कोई भी इस्लामी संगठन नहीं करता। पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद के उभार पर चिंता जताई जा रही है। एशिया से पैर पसारने वाला इस्लामिक आतंकवाद अब अफ्रीकन देशों से होते हुए यूरोप और अमेरिका तक भी पहुंच चुका है और कई देशों में अपना कहर भी बरपा चुका है।
आज दुनिया के कई देशों में मुस्लिमों को अगर भेदभाव व प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है तो इसकी भी एक बड़ी वजह चंद ऐसे इस्लामिक धर्मावलंबी हैं, जिन्होंने गैर मुस्लिमों के खिलाफ जहर बोने की कोशिश की है। ऐसा भी नहीं है कि इस्लाम को मानने वाला हर व्यक्ति कट्टर है। लेकिन चिंता की बात यही है की इस्लाम धर्मावलंबियों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जो दूसरे धर्मावलंबियों को पसंद नहीं करते। आतंकवादी गतिविधियों में मुसलमानों की संख्या सर्वाधिक होने की मूल वजह भी यही है। जहां तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस्लामिक आतंकवाद पर अध्ययन करने की बात है, तो इस विषय पर अध्ययन करने में कुछ भी गलत नहीं है। कोई भी धर्म गलत नहीं है। हर धर्म की आखिरी मंजिल ईश्वर की प्राप्ति ही है। लेकिन अगर उसमें कभी कोई भटकाव आता है तो उस पर शोध होना ही चाहिए। शोध भी तभी हो सकता है, जबकि उस विषय पर अध्ययन हो। इस्लामिक धर्मावलंबियों की एक बड़ी संख्या आज भटकाव के दौर से गुजर रही है। इसलिए जरूरी है कि इस भटकाव का अध्ययन और शोध किया जा सके, ताकि गुमराह होने वाले लोगों को वापस सही रास्ते पर लाया जा सके। इस्लामिक आतंकवाद पर अध्ययन का यह कतई नहीं है कि इसके पीछे इस्लाम को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। इसका उद्देश्य सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद के स्वरूपों का अध्ययन करना है, ताकि उनकी वजहों की तह तक जाकर, इस तथाकथित आतंकवाद को समाप्त किया जा सके और पूरी दुनिया शांत माहौल में रह सके।
हिन्दुस्थान समाचार/डॉ कविता सारस्वत

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