कप्तान कालिया पर राजनीति क्यों?

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तो नरेन्द्र मोदी सरकार ने शहीद कैप्टन सौरभ कालिया को लेकर उत्पन्न जन भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपने पूर्व का फ़ैसला बदल दिया है। करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए सौरभ कालिया सहित 5 भारतीय जवानों का मामला उन सारे भारतीयों को रह-रह कर टीसता है जिन्होंने 1999 के उस दौर को देखा है।

हालांकि पाकिस्तान की अनैतिक घुसपैठ से अनजान भारतीय सेना ने जानकारी मिलने के बाद सरकार का आदेश आने के साथ जिस तरह पाकिस्तानी घुसपैठियों के क़ब्जे से एक से एक दुर्गम स्थानो को मुक्त करवाने में शौर्य और वीरता का परिचय दिया उससे दुनिया ने भारत की सैन्य क्षमता का लोहा माना।

यह बिना घोषणा किए हुए एक ऐसा युद्ध था जिसमें भारत के राजनैतिक नेतृत्व को और सेना को एक साथ संकल्प और दृढ़ता भी दिखानी थी तथा अत्यंत सतर्कता और संयम भी बरतना था। हमारी सेना तथा राजनैतिक नेतृत्व ने तमाम उत्तेजनाओं के बावजूद इसे दो देशों के युद्ध में परिणत नहीं होने दिया। इसीलिए करगिल युद्ध को भारत पाकिस्तान के पूर्व युद्धों से अलग विशेष स्थान दिया जाता है — कारण इसमें अपनी सीमा को ख़ाली करवाने के लिए युद्ध तो लड़ना था, पर इसमें अति संयम का परिचय देना था, अन्यथा सरकार पर जिस तरह पाकिस्तान को सबक सिखाने का दबाव था उसमें थोड़ा भी धैर्य चूकने से हालात बिगड़ सकते थे। ऐसे युद्ध में भूमिका निभाने वाले सैनिकों के प्रति देश हमेशा कृतज्ञ रहेगा।

सरकार की ओर से कैप्टन कालिया के मामले को लेकर जो कुछ और जिस तरह कहा गया उससे देश एवं शहीदों के प्रति अलग भावना में जीने वालों को धक्का लगना स्वाभाविक था। पिछली सरकार ने कह दिया था कि कैप्टन कालिया सहित जवानों का मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नहीं ले जाया जा सकता। सौरभ कालिया का मामला युद्धबंदियों के साथ अमानुषिक अत्याचार का है। कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा 6 जून 1999 को 4 जाट रेजिमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया सहित 5 जवानों के शव भारत को सौंपे गए थे। कैप्टन कालिया ऐसे पहले सैन्य अधिकारी थे जिन्होंने करगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की जानकारी दी थी। इनके शरीर को देखकर किसी के मुंह से भी आह निकल सकती थी। शरीर पर सिगरेट से जलाने और कान को गर्म रॉड से दागने और जलाने के निशान साफ़ थे, उनकी आंखें फोड़ी और निकाल ली गईं थीं… दांत टूटे थे तथा हड्डियों और कमर को टुकड़े-टुकड़े में काटा गया था। जब उनके शव भारत आए और उसकी सूचना देश में फैली तो चारों ओर आक्रोश और क्षोभ की लहर फैल गई थी। भारत ने इसे युद्धबंदी-संबंधित जिनेवा क़रार के उल्लंघन का मामला बताया, इसका प्रतिरोध किया, पर पाकिस्तान ने किसी तरह के उत्पीड़न से इन्कार कर दिया।

जितनी छानबीन हुई उससे साफ़ है कि कैप्टन कालिया सहित जाट रेजिमेंट के 5 जवानों को 15 मई 1999 को पाकिस्तान की सेना द्वारा पकड़ा गया था। दरअसल उन्होंने अपने यान से गश्त लगाते हुए भारत के उन क्षेत्रों में घुसपैठ और मोर्चाबंदी को देख लिया था जहाँ से जाड़े के मौसम में भारतीय सेना हट जाया करती थी। यह आपसी समझ की परंपरा थी। पाकिस्तान ने उसी का लाभ उठाया और पूरी तैयारी से घुसपैठ व मोर्चाबंदी करवा दी। कैप्टन कालिया ने इसकी सूचना अपने रेजिमेंट को दी जहाँ से यह सभी संबंधित स्थानों पर भेजा गया। कहा जाता है कि उनका जहाज़ पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वैसे एक पक्ष यह भी है कि उनका यान ख़राब हो गया था और उन्हें आपातकाल में पाकिस्तानी क्षेत्र में उतारना पड़ा। ऐसी स्थिति में सैन्य व्यवहार के अंतरराष्ट्रीय नियम हैं। पाकिस्तान ने इसके विपरीत व्यवहार किया। पाकिस्तान ने कहा कि सैनिकों का शव गड्ढे में पाया गया था। यानी उनका यान दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिससे वे मर गए थे। पर आखिर दुर्घटना में मरे हुए जवानों की आंखें कैसे निकल जाएंगी? शरीर के टुकड़े-टुकड़े कैसे हो जाएंगे?

अपने पुत्र की तस्वीर के साथ कप्तान सौरभ कालिया के माता-पिता
अपने पुत्र की तस्वीर के साथ कप्तान सौरभ कालिया के माता-पिता

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उनके साथ बर्बरता स्पष्ट होती है। पहला तार्किक उत्तर यही होगा कि हमारे बहादुर सैनिकों के साथ ऐसे व्यवहार करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को सज़ा मिलनी चाहिए। इन शहीद सैनिकों के परिवार लगातार आवाज उठाते रहे हैं। सौरभ कालिया के पिता 3 वर्ष पहले मामले को उच्चतम न्यायालय भी ले गए। उच्चतम न्यायालय ने सरकार को नोटिस दिया और तत्कालीन सरकार का वहाँ जवाब था कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में यह मामला टिकने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वहाँ ले जाना संभव नहीं। वर्तमान सरकार ने भी हाल में राज्य सभा में इससे संबंधित दो प्रश्नों के उत्तर में यही कह दिया!

सांसद राजीव चन्द्रशेखर ने पूछा था कि क्या सरकार सौरभ और 5 अन्य भारतीय सैनिकों की पाकिस्तानी सेना द्वारा हत्या किए जाने के मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाएगी? दो, क्या इस मामले पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा? जवाब में केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने कहा कि इस मामले से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को न्यूयॉर्क अधिवेशन के दौरान 22 सितंबर 1999 को और मानवाधिकार आयोग को अप्रैल 2000 में ही अवगत करा दिया गया था।

यह सच है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के लिए गए प्रतिनिधिमंडल ने ऐसा किया था। मानवाधिकार आयोग में संबंधित काग़ज़ात के साथ औपचारिक शिकायत भी की गई थी। वीके सिंह के जवाब में यह भी शामिल है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के ज़रिए क़ानूनी कार्यवाही के बारे में भी सारे पहलुओं पर विचार किया गया, लेकिन यह संभव नहीं लगता।

इस बयान के सामने आते ही दोनों सरकारें इस मामले पर एक ही पायदान पर खड़ी नजर आने लगीं। चाहे वह भाजपा नेतृत्व की सरकार हो या कांग्रेस नेतृत्व की, यह मानने का कोई कारण नहीं है कि अपने शहीदों को न्याय दिलाने से ये मुँह मोड़ेंगे। लेकिन नौकरशाही ऐसे मामलों की अपने तरीक़े से व्याख्या करती है। यह बात ठीक है कि जैसा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मोदी सरकार के बदले रुख़ की जानकारी देते समय कहा कि सरकार इस मामले को सीधे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में नहीं ले जा सकती क्योंकि भारत और पाकिस्तान कॉमनवेल्थ के देश हैं। इसमें एक प्रावधान है कि कॉमनवेल्थ के देश एक दूसरे के ख़िलाफ़ compulsory jurisdiction का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसी के अनुसार हमारे विदेश राज्य मंत्री ने उत्तर दिया था और जो शपथपत्र यूपीए सरकार ने दाख़िल किया था उसी को हमने दोहराया था।

जब अक्टूबर 2013 में कैप्टन कालिया का मामला उठा था तो भाजपा का मत था कि अगर हम सरकार में आये तो इस मामले पर फिर से कार्यवाही करेंगे। सत्ता में आने के बाद नई सरकार ने पूर्व सरकार का ही अनुसरण किया — हालांकि सरकार का रुख़ बदल गया है। लेकिन इससे कॉमनवेल्थ वाले नियम नहीं बदलेंगे। तत्कालीन सरकार का विश्लेषण यह है कि सौरभ कालिया को जो यातनाएँ दी गईं वह एक अपवाद वाली स्थिति निर्मित करती है। इसलिए सरकार उच्चतम नयायालय से ही शपथपत्र बदलकर पूछेगी कि इन प्रावधानों को देखते हुए भी क्या भारत अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जा सकता है। तो अब उच्चतम न्यायालय को तय करना है।

उच्चतम न्यायालय इस विषय में कुछ भी राय दे, अगर पाकिस्तान तैयार नहीं हुआ तो उसे आप अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इसके लिए कॉमनवेल्थ का नियम बदलवाना होगा। हालांकि पाकिस्तानी मीडिया में उसके सैनिकों का बयान आया था जिसमें सौरभ कालिया को पकड़ने और बर्बरता बरतने की बात कही गई थी। इसका एक वीडियो भी यूट्यूब पर उपलब्ध है। लेकिन जो देश यह मानने को ही तैयार नहीं कि उसमें उसकी सेना का हाथ है, जो यह कहता रहा है कि यह तो कश्मीरी मुजाहीदीन की कारस्तानी है, वह अपनी सेना द्वारा जिनेवा संधि के उल्लंघन को स्वीकार कैसे कर सकता था? अब तो करगिल के जनक जनरल परवेज़ मुशर्रफ तक इसे पाकिस्तान सेना की करतूत मान चुके हैं।

यह कहना उचित नहीं है कि कैप्टन कालिया या अन्य का बलिदान व्यर्थ गया। भारत उस तरह दरिंदगी नहीं बरत सकता था। करगिल में कुल 496 भारतीय सेना के तथा 5 वायु सेना के जवान मारे गए थे। पाकिस्तान की तत्कालीन ख़ूफ़िया रिपोर्टें भी 735 पाकिस्तानी सैनिकों के मरने की बात थी। कई पूर्व सैनिकों ने 2,000 से ज़्यादा सेना के मरने का दावा किया। स्कार्दू, रावलपिंडी एवं लाहौर के सैनिक अस्पताल घायल सैनिकों से भर गए थे। पाकिस्तान ने भारी संख्या में अपने सैनिकों का शव लेने से इन्कार भी कर दिया था — क्योंकि ऐसा करते ही यह साफ हो जाता कि घुसैपठ यानी सीमा का अतिक्रमण पाक सेना ने किया था। उस युद्ध में विजय, पाकिस्तानी सेनाओं का भारी संख्या में हताहत होना तथा उसे पहुँचाई गई क्षति कैप्टन कालिया की बर्बरता का जवाब माना जा सकता है।

बावजूद इसके वर्तमान सरकार इस मामले पर दूसरे तरीक़े से पहले ही पेश आ सकती थी। हालांकि इस मामले में बहुत कुछ होने की संभावना नहीं है, फिर भी सरकार कह सकती थी कि हम पाकिस्तान के साथ हर बातचीत में इस मामले को उठाएंगे और न्याय मांगेंगें। कम से कम आगे तो उसे यह स्टैण्ड लेना ही चाहिए।

यह लेखक की निजी राय है।