क्यों नहीं बचे यूपी-बिहार में चोटी के कालेज

बिहार के अनेकों कोचिंग संस्थानों ने जहां सैकड़ों छात्रों को आईआईटी में जगह दिलवाई है, वहीं बेस्ट कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मामले में बिहार आज भी पिछड़ा हुआ है। क्योंकि, बिहार, झारखण्ड में पढने-पढ़ाने का माहौल सही नहीं होने के कारण अच्छे विद्यार्थी का पलायन हो रहा है

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एक बार फिर से बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, जेएनयू और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी को देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों की सूची में जगह मिल गई। वहीं देश के बेहतरीन 10 मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की लिस्ट में आईआईएम-अहमदाबाद ने बाजी मारी है। इसके अलावा टॉप 10 इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट की लिस्ट में पहले नंबर पर आईआईटी-मद्रास है। इसी तरह टॉप टेन कॉलेज की लिस्ट में दिल्ली के मिरांडा हाउस और सेंट स्टीफंस कालेज रहे। पहले तो इन सभी विद्या के मंदिरों के अध्यापकों, विद्यार्थियों और शेष लोगों को बधाई। इनकी कड़ी मेहनत, तप और त्याग के बिना इनके शिक्षण संस्थान शिखर पर नहीं जा सकते थे।

दरअसल, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ष 2018 के लिए एनआईआरएफ यानी नेशनल इंस्टिट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क इंडिया की रैंकिंग जारी की है। इनसे पता चलता है कि देश के कौन से विश्वविद्यालय या कॉलेज सबसे बेहतरीन हैं। पर एक बात से अवश्य चिंता हो रही है कि इस सूची में नए विश्वविद्यालय या कॉलेज जगह नहीं बना पा रहे हैं। आखिर कमी किस स्तर पर है? अगर बात मिरांडा हाउस और सेंट स्टीफंस कालेज की करें तो इनका सारे देश में दबदबा है। क्या ये दोनों कालेज अपने यहां पढ़ने आए विद्यार्थियों के समग्र विकास पर ध्यान देते हैं। या इनके यहां देशभर के सबसे अच्छे और मेधावी बच्चों में दाखिला लेने की होड़ लगी होती है। कुछ बात तो जरूर है कि दशकों से इनकी प्रतिष्ठा पहले जैसी बनी हुई है। इन्हें खड़ा करने के लिए कई पीढ़ियों का योगदान तो रहा ही है। मिरांडा हाउस वर्ष 1948 में स्थापित हुआ था। यहां विज्ञान, सामाजिक विज्ञान व कला के विषयों की पढ़ाई बेहतर होती है। उधर सेंट स्टीफंस कॉलेज 125 वर्ष पुराना है। इसने देश को सैकड़ों नौकरशाह, राजनेता, खिलाड़ी, कलाकार वगैरह दिए।

सबको मालूम है कि एनआईआरएफ उच्च शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग 5 व्यापक मानकों (पैरामीटर्स) के आधार पर ही तय करता है। इनमें शिक्षण संस्थानों की पहुंच एवं समावेशिता, अनुसंधान एवं व्यावसायिक प्रक्रियाएं, शिक्षण-अधिगम संसाधन (लर्निंग रिसोर्सेज), अंडर-ग्रेजुएट छात्रों के परीक्षा परिणाम और अवधारणा जैसे बेंचमार्क शामिल हैं। इन पैमानों पर श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शिक्षण संस्थानों को ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों की सूची में जगह मिलती है। तो स्पष्ट है कि सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटी और कॉलेज की सूची में जगह बनाना कोई सरल काम तो नहीं है। उसके लिए बेहतर फैकल्टी, समृद्ध पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और अन्य सुविधाओं का होना भी अति आवश्यक है। तो क्या माना जाए कि देश के अधिकतर कॉलेज इन मोर्चों पर कमजोर हैं?
एनआईआरएफ की सूची में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश वगैरह के एक कालेज ने भी जगह नहीं बनाई। यह स्थिति किसी भी परिस्थिति में संतोषजनक नहीं कही जाएगी। इस सूची में नए-नए शिक्षण संस्थान जगह बनाएं तभी लगेगा कि हमारे शिक्षण संस्थानों में आगे बढ़ने की स्वस्थ मानसिकता काम करने लगी है। ये आईआईटी, जेएनयू, सेंट स्टीफंस कॉलेज वगैरह को अपदस्थ करने का मन बना चुके हैं। ये जज्बा अभी दिखाई नहीं दे रहा है। देश में सैकड़ों यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में अध्यापन हो रहा है। तो फिर वे अपने को सबसे बेहतर बनाने की दौड़ से बाहर क्यों हैं? कमी किस स्तर पर है? इस पर विचार होना चाहिए। यथास्थिति कायम नहीं रखी जा सकती है।

ऐसा तो नहीं है कि लखनऊ, कानपुर, पटना, रांची, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जयपुर आदि में अच्छे और पुराने कॉलेज हैं ही नहीं। परन्तु, इस लिस्ट में बिहार का कोई कालेज जगह बनाने में कामयाब नहीं रहा। हालांकि टॉप-100 इंजीनियरिंग कालेजों में आईआईटी-पटना 24वें पायदान पर है। लेकिन उसकी रैंकिंग लगातार तीसरे साल गिरी है। पिछले साल यह 19वें नंबर पर था। बिहार के अनेकों कोचिंग संस्थानों ने जहां सैकड़ों छात्रों को आईआईटी में जगह दिलवाई है, वहीं बेस्ट कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मामले में बिहार आज भी पिछड़ा हुआ है। क्योंकि, बिहार, झारखण्ड में पढने-पढ़ाने का माहौल सही नहीं होने के कारण अच्छे विद्यार्थी का पलायन हो रहा है।

इस रैंकिंग के लिए आईआईटी-पटना, एनआईटी, सीयूएसबी, चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, वैशाली इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट और पटना साहिब टेक्निकल कैंपस ने ही आवेदन किया था।
इस तरह की रैंकिंग साल 2016 से जारी हो रही है। शुरुआती साल में बिहार के तीन संस्थान लिस्ट में थे। आईआईटी-पटना के साथ-साथ एनआईटी पटना और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (सीयूएसबी) को भी जगह मिली थी। 2017 के बाद से एनआईटी पटना और सीयूएसबी रैंकिंग से बाहर हैं। अगर बात उत्तर प्रदेश की हो तो क्यों नोएडा से लेकर लखनऊ तक प्रदेश का कोई भी कॉलेज पहले दस बेहतरीन कॉलेजों की सूची में जगह बनाने में असफल रहा? ये सवाल तो पूछा जाएगा? बिहार और उत्तर प्रदेश तो ज्ञान के भंडार माने जाते रहे हैं। इनसे बेहतर नतीजों की अपेक्षा का रहना स्वाभाविक ही है। कुल मिलाकर बात यह है कि देश के चुनिंदा शहरों के चुनिंदा कॉलेज ही शिखर पर जगह बनाए हुए हैं। उन्हें कोई अपदस्थ नहीं कर पा रहा है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। नहीं तो छात्र-छात्राओं का पलायन रुकेगा कैसे?

जेएनयू को भी देश की बेहतरीन यूनिवर्सिटी में से एक माना गया है। यह सुखद है। लेकिन, इसमें पढने वालों में ज्यादातर तो उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, बंगाल के ही बच्चे तो भरे पड़े हैं। हालांकि, जेएनयू हाल के दौर में अपने यहां होने वाले अखंड आंदोलनों के कारण सुर्खियों में रहा है। लेकिन, इस विश्वविद्यालय के अध्यापकों या छात्रों के किसी मौलिक काम के बारे में भी कोई जानकारी सामने नहीं आई। जेएनयू में अफजल गुरु की बरसी मनाई जाती है। बाकायदा इसके लिए कैंपस में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाता है। अफजल गुरु की फांसी के वक्त भी यहां बवाल हुआ था। जेएनयू ने देश को बड़े-बड़े बुद्धिजीवी दिए हैं। दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधारा के बीच यहां हमेशा बौद्धिक टकराव होता रहा है। लेकिन, हाल के दौर में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण जेएनयू की छवि बुरी तरह खराब हुई है। इस विश्वविद्यालय पर भी तो सरकार का आईआईटी से कम खर्च नहीं होता।
आईआईटी ने तो देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान के रूप में जगह बनाई है। इधर से देश-दुनिया को चोटी के इंजीनियर मिल रहे हैं। इसके साथ ही आईआईटी से देश को अनेक उद्यमी भी मिल रहे हैं। इंफोसिस जैसी प्रख्यात आईटी कंपनी को स्थापित करने वाले एन. नारायणमूर्ति और नंदन नीलकेणी आईआईटी के ही छात्र रहे हैं। देश की प्रमुख कंपनी आईटीसी के चेयरमैन योगेश्वर देवेश्वर भी आईआईटी के पूर्व छात्र रहे हैं। इस तरह के दर्जनों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। अब देश को अधिक से अधिक उद्यमी चाहिए। ये ही उद्योग-धंधे चालू करके रोजगार के अवसर सृजित करते हैं। जो शिक्षण संस्थान चोटी पर बैठे हैं, उन्हें अनाम-अज्ञात शिक्षा के मंदिरों से कड़ी चुनौती मिलनी ही चाहिए। तब पहले स्थान पर बने हुए कॉलेज और विश्वविद्यालय अपनी जगह को बनाए रखने के लिए और मेहनत करेंगे।