Wednesday 28 October 2020

सुशांत की नई विसरा जाँच से क्यों नहीं मिलेगा सुराग़

सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर पहले दिन से ही सवाल उठते आए हैं। कुछ लोग शुरू से ही इसे हत्या मान रहे हैं। सुशांत के गले में पाए गए निशान (ligature marks) आत्महत्या के क़यास को प्रमाणित नहीं करते। इसलिए इस आशंका को ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि सुशांत का गला घोंटा गया हो सकता है।

एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों का मानना है कि सुशांत के गले पर चोट का निशान संकेंद्रित (concentric) या सीधा है जो कि फाँसी लगने की स्थिति में ऊपर की तरफ़ या अंग्रेज़ी अक्षर U के आकार का होना चाहिए था। ऐसे में इसे कैसे आत्महत्या की घटना मान लिया गया। इस मामले को लेकर सुशांत का पोस्टमार्टम करने वाले कूपर अस्पताल के डॉक्टरों से पूछताछ की जा चुकी है। लेकिन सवाल अब भी क़ायम है कि सुशांत मामले में गला दबाकर हत्या की आशंका को आसानी से क्यों ख़ारिज कर दिया गया?

सुशांत सिंह राजपूत को ज़हर दिया गया था या नहीं, इसका पता लगाने के लिए एम्स की फॉरेंसिक टीम विसरा (viscera) टेस्ट कर रही है। मामले में एम्स में फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख और सुशांत केस में गठित मेडिकल बोर्ड के अध्यक्ष (प्रो) डॉ सुधीर गुप्ता ने कहा है कि एम्स फोरेंसिक बोर्ड जहर की जाँच करने के लिए विसरा परीक्षण कर रहा है। दस दिनों के भीतर इसका परिणाम आ जाएगा।

परंतु नई रिपोर्ट से भी सुशांत के ख़ून से इसी प्रकार ड्रग्स के मिलने की संभावना कम है क्योंकि लाश मिलने के 6 से कहीं अधिक घंटों के बाद वह कूपर अस्पताल पहुंची थी। सुशांत सिंह राजपूत का विसरा दिल्ली एम्स आज पहुंचा। इसे प्लेन के ज़रिए मुंबई से लाया गया। एम्स की पांच सदस्यीय डॉक्टरों का मेडिकल बोर्ड इस विसरा की जाँच कर रही है। 

परन्तु दिवंगत अभिनेता की लाश इतनी देर से पोस्टमॉर्टम के लिए भेजी गई थी कि तब तक उसकी पाचन प्रणाली में विष का रह जाना लगभग असंभव था। क़ानूनन मृत्यु के 6 घंटे के अन्दर शव की ऑटोप्सी होनी चाहिए। अगर सुशांत की मौत पुलिस को उसकी लाश मिलने से कुछ समय पहले ही हुई है तो विसरा रिपोर्ट से कुछ मिलने की संभावना है तो सही पर कम है। और अगर पिछली रात (13 जून) को ही उसे मार दिया गया हो तो संभावना बिल्कुल नहीं है।

विसरा जाँच के लिए मृतक के पेट के भीतर से सैंपल लिया जाता है। इस दौरान मृतक की आँत, गुर्दे और दिल आदि का सैंपल लिया जाता है, इसे ही विसरा कहते हैं। ये जाँच संदिग्ध मौत के मामलों में की जाती है। विसरा के ज़रिए यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि मौत कैसे हुई और इसकी वजह क्या थी।

अप्राकृतिक कारणवश हुई मृत्यु के मामलों में शव की अन्येष्टि से पहले उससे विसरा निकाल लिया जाता है और उसे परिरक्षित (preserve) किया जाता है ताकि पहली जाँच रिपोर्ट पर संदेह होने की स्थिति में विसरा का पुनः परीक्षण किया जा सके। ऐसा सुशांत के मामले में भी हुआ।

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