जेएनयू में क्यों तार-तार हो गई गुरु-शिष्य परंपरा

अंग्रेजी अखबार डीएनए ने रविवार 15 अप्रैल 2015 को अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित एक खबर में बताया कि जेएनयू में वर्ष 2013-14 में यौन उत्पीड़न के 25, 2014-15 में 35 और 2015-16 में 42 मामले दर्ज किए गए

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अगले वर्ष जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) अपनी स्थापना के 50 साल की यात्रा पूरी कर रहा है। किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए पांच दशकों का सफर पूरा करना महत्वपूर्ण उपलब्धि ही माना जाएगा। जेएनयू से देश को बहुत उम्मीदें थी, अभी भी हैं। यहां से देश को शोधार्थी,नौकरशाह, विद्वान, कलाकार, उद्यमी वगैरह मिलें, इसी उद्देश्य से इसकी स्थापना हुई थी। लेकिन, इधर हाल के वर्षों में यौन उत्पीड़न के मामलों जिस तेजी के साथ जेएनयू में बढे हैं और सामने आ रहे हैं, वे चिंता अवश्य पैदा करते हैं। छात्रोओं का अपने अध्यापकों और सहपाठियों पर बार-बार यौन उत्पीड़न के आरोप लगाना यहां पर हाल के दौर में व्याप्त सडांध और गड़बड़ी को दर्शाता है।

अंग्रेजी अखबार डीएनए ने रविवार 15 अप्रैल 2015 को अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित एक खबर में बताया कि जेएनयू में वर्ष 2013-14 में यौन उत्पीड़न के 25, 2014-15 में 35 और 2015-16 में 42 मामले दर्ज किए गए। ये दर्ज मामले हैं। हुए कितने होंगे, यह तो कोई भी अंदाजा लगा सकता है। जबतक पानी सर के ऊपर से नहीं बहने लगता, शायद ही कोई अबला शिकायत दर्ज करने को तैयार होती है। बदनामी तो आखिर उसकी ही होती है। देश के सर्वोत्कृष्ट कहे जाने वाले इस शिक्षण संस्थान में टी हर महीने दो-तीन यौन उत्पीड़न के केस सामने आ रहे हैं। इससे जेएनयू बिरादरी की छीछालेदर तो होती ही है। स्थिति इतनी बदतर हो रही है कि एक मामला शांत होता नहीं है कि दूसरे पर हंगामा होने लगता है। एक ताजा मामले में जेएनयू के एक और प्रोफेसर के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने छात्रा के यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया है। जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर अजय कुमार के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पीड़ित छात्रा ने प्रोफेसर के खिलाफ वसंत कुंज थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने (प्रोफेसर) उसके साथ अश्लील अभद्रता की। प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। एक महीने के दौरान ही जेएनयू में छात्रा उत्पीड़न का यह तीसरा मामला है। इससे पहले दो अलग-अलग मामलों में चार प्रोफेसर आरोपी हैं। क्या यह शोभा देता है कि किसी शिक्षा के प्रतिष्ठित मंदिर में अध्यापक अपनी छात्राओं का यौन उत्पीड़न करें? गुरु द्रोणाचार्य-एकलव्य की परंपरा वाले इस देश में गुरु-शिष्य के बीच की खाई गहरी ही होती जा रही रही है।पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच तालमेल का साफ अभाव दिख रहा है। दोनों के रास्ते अलग-अलग क्यों हैं? आखिर कमी किस स्तर पर है? इस पर समाज और जेएनयू बिरादरी को सोचना तो होगा ही ।

पिछले दिनों जेएनयू के प्रोफेसर अतुल जौहरी को यौन उत्पीड़न के मामले में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया था। उन पर यौन उत्पीड़न के आठ मामले दर्ज हैं। उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर छात्रों ने थाने पर प्रदर्शन भी किया था। प्रोफेसर परआरोप है कि वे अक्सर आपत्तिजनक द्विअर्थी टिप्पणियां करते थे, यौन संबंध बनाने के लिए खुले तौर पर मांग करने के अलावा लगभग सभी लड़कियों की शारीरिक बनावट को लेकर टिप्पणी करते थे। अगर कोई लड़की विरोध करती तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित करते थे। प्रोफेसर पर लगे आरोपों को सुनकर शर्म आती है। यद्यपि प्रोफेसर जौहरी इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं। लेकिन,आप यह तो मानेंगे ही कि जेएनयू में सब कुछ ठीक तो नहीं है। राजधानी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी, जमिया मिलिया यूनिवर्सिटी और आईआईटी जैसे शिक्षण संस्थान भी हैं। वहां पर यौन उत्पीड़न के मामले शायद ही कभी सुनाई देते हैं। फिर जेएनयू में ही क्यों हर तरह की अराजकता व्याप्त रहती है? निश्चित रूप से यहां के छात्र देश के सबसे मेधावी छात्रों में शुमार होते हैं। इधर की फैकल्टी का भी सारे देश में अच्छा-खासा सम्मान रहा है। यहां प्रो. कमला प्रसाद, प्रो. ईश्वरी प्रसाद, प्रो. कृष्णा भारद्वाज, प्रो. धर्मा कुमार, डॉ. अमुन, डा. पुष्पेश पंत जैसे दर्जनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके शिक्षाविद रहे हैं। गड़बडी तो इधर कुछ सालों में ही पैदा हुई है, जिसकी वजह से यहां से सिर्फ धरनों और प्रदर्शनों की ही खबरें बाहर आती हैं। पिछले दशकों से जेएनयू में कोई अन्तरराष्ट्रीय स्तर का शोध कार्य हुआ हो, ऐसा भी सुनने को नहीं मिला ।

जेएनयू कैंपस को आप देश की किसी भी अन्य यूनिवर्सिटी के कैंपस से अधिक आकर्षक मान सकते हैं। हजारों एकड़ में फैले इस विशाल हरियाली भरे परिसर में प्रवेश करते ही आपको समझ आ जाएगा कि ये कोई सामान्य शिक्षण संस्थान नहीं है। चारों तरफ हरियाली और पहाड़ियों के बीच-बीच में क्लास रूम, लाइब्रेरी, हॉस्टल, प्रशासनिक ब्लॉक, फैक्ल्टी के फ्लैट, जिम आदि हैं। जेएनयू कैंपस के डिजाइनर प्रख्यात आर्किटेक्ट सी पी कुकरेजा ने जब इसका डिजाइन तैयार किया होगा तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर यहां पर पढ़ाई कम और नारेबाजी अधिक होगी। सन 1969 में स्थापित जेएनयू में देश को बहुत कुछ देने की संभावनाएं हैं। पर ये अपनी क्षमताओं के अनुसार काम तो नहीं कर रहा। यहां से सकारात्मक खबरें कम और नकारात्मक खबरें अधिक आती हैं। जरा सोचिए कि जेएनयू में संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरु की बरसी मनाई जाती है।जेएनयू में अफजल गुरु की बरसी को आयोजित करने में वामपंथी संगठन और कश्मीरी छात्र सक्रिय रहते हैं। पिछले साल बाकायदा इसके लिए कैंपस में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। यहां अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के वक्त भी बवाल हुआ था। जेएनयू ने देश को बड़े-बड़े बुद्धिजीवी दिए हैं। दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधाराके बीच यहां हमेशा से बौद्धिक टकराव होते रहे हैं। बिहार के दिग्विजय सिंह (अब स्वर्गीय), सीताराम येचुरी, निर्मला सीतारमण जैसे राजनीतिज्ञ यहीं के पूर्ववर्ती छात्र हैं। यहां तक सब ठीक है। लोकतंत्र में मत-भिन्नता रह सकती है।आपको दूसरी विचारधारा का भी आदर करना होगा। लेकिन, अब वहां पर राष्ट्रद्रोह और यौन उत्पीड़न के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा चिंता पैदा करता है। इन कारणों के चलते जेएनयू की छवि पर बदनुमा दाग लग गया है। इस छवि को ठीक करने की आवश्यकता है। जेएनयू बिरादरी को भी सोचना होगा कि यहां से अब तक देश को कोई भी सम्मानित उपन्यासकार,रंगकर्मी, एक्टर, चिंतक, उद्यमी, खिलाड़ी नहीं मिला। अगर मुझे जानकारी नहीं है तो मेरा इस लिहाज से कोई भी ज्ञानवर्द्धन कर सकता है। क्या यहां शोध करने वालों ने कोई अनूठा मूल काम करके दिखाया है? यह जरूर है कि जेएनयू के बहुत से छात्र-छात्राएं हर साल यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण कर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसे अधिकारी बनते हैं। कुछ मीडिया में भी अपनी शेखी बघारते मिल जायेंगे। पहली नजर में बस यही उपलब्धि सामने आती है। क्या यह पर्याप्त है? क्या जेएनयू से “देश के टुकड़े करने” जैसे नारों केअतिरिक्त भी कुछ सुनने को मिलेगा?

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Member of Parliament (Bharatiya Janata Party), Rajya Sabha, and Chairman, Hindusthan Samachar Seva Samiti

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