पिछले दिनों देश की राजनीतिक और आर्थिक राजधानियों दिल्ली और मुंबई बारिश से जल मग्न होती रहीं। दोनों महानगरों में जिदंगी थम सी गईं। सड़कों पर भारी जाम लग गएरेल सेवायें बुरी तरह प्रभावित हुईघरों में पानी भरता जा रहास्कूल-कॉलेज बंद हो गए। इसके अलावा भी बारिश ने बहुत कुछ चमत्कार किया। देश के इन दो सर्वाधिक खासमखास शहरों की तस्वीरें बहुत कुछ बयां कर गईं। पर ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था। ये स्थिति तो हर साल लगभग होती है। योजनाएं भी हर साल ही नई बनती हैं ताकि बारिश के बाद होने वाली अव्यवस्था और अराजकता की पुनरावृत्ति ना हो। पर न जाने ये योजनाएं पता नहीं कहाँ गुम हो जाती हैं ये फाइलें।

दिल्ली और मुंबई में बारिश के कारण सड़कों पर जल भराव के कारण कई लोग उनमें गिरने मात्र के कारण मारे गए। जहां मुबई लगातार बारिश के कहर से सहम गई हैं,वहीं दिल्ली तो एक बार की बारिश भर से ही से पानी-पानी हो गई। मुंबई की बारिश को प्राकृतिक आपदा कहकर टाल देने भर से बात नहीं बनेगी। जरा किसी मुंबईकर से पूछिए कि अब चार-पांच घंटों के बरसात से क्या होता है। मुंबई से सटे वसई में तो हाल बदहाल होने लगता है। वहां पर तमाम सड़कें नदियों में बदल जाती हैंजिन पर सिर्फ नाव से ही सवारी संभव होती है। अभी पिछले हफ्ते ही जब मैं मुंबई एअरपोर्ट पर उतरा तब झमाझम बारिश के कारण आधे घंटे तक गाड़ी में बैठने के लिए इंतज़ार करना पड़ा। छाते भर से मुसलाधार बारिश का सामना करना संभव नहीं था। दिल्ली में बारिश के मौसम में मिन्टो ब्रिज पुल के नीचे दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की बसों के डूबने की फोटो दिल्ली वाले बीते पचास वर्षों से देख रहे हैं। पर स्थिति सुधर ही नहीं रही है।

अनदेखी शहरी भारत की

यह समझना होगा कि वैसे तो हमारा देश कृषिप्रधान है। शहरी भारत ही हमारे देश की वर्तमान भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। देश का लगभग सारा सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) शहरों में ही सिमटा है। जनगणना के आंकड़ों को माने तो देश की 31% आबादी आज के दिन शहरों में रहती है। हालांकि गैर-सरकारी आंकड़ें, शहरी आबादी कहीं और अधिक होने का दावा करते हैं। इन शहरों में ही रोजगार के अवसर हैं। सारे देश के नौजवानों के सपने इन्हीं शहरों में पहुंचकर साकार होते हैं। पर नीति निर्धारकों के फोकस से कहीं दूर बसते हैं हमारे शहर। यह भी समझ में नहीं आता कि दिल्लीमुबई या बाकी शहरों के महा निगम भी अपने-अपने शहरों को बेहतर और रहने लायक बनाने के स्तर पर क्यों लगातार फेल हो रहे हैं। इसके कारण तलाशना कोई बहुत कठिन नहीं होना चाहिए। इनमें हर स्तर पर काहिली और भ्रष्टाचार फैला हुआ है।

फिर भी प्यासे शहर

एक अजीब विडबंना है कि एक तरफ तो दिल्ली-मुंबई में तगड़ी बारिश हुई है तो दूसरी ओर इनके नागरिकों को पीने का साफ पानी तक उपलब्ध नहीं होता। पहले बात दिल्ली की ही कर लेते हैं। राजधानी में पानी से जुड़े सारे मामलों को दिल्ली जल बोर्ड देखता है। यह एकमात्र ऐसा विभाग हैजो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी स्वयं देखते हैं। हालांकि लगता नहीं है कि वे इस महकमों को कभी कायदे से देखते भी होंगे। यकीन मानिए कि दिल्ली जल बोर्ड का ही सर्वाधिक हाल बेहाल है। केजरीवाल जी रोज ही सुबह-शाम केन्द्र सरकार से लेकर भाजपा और कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं पर आरोपों की बौछार करने का कोई भी अवसर जाने नहीं देते। वे चिर असंतुष्ट प्राणी हैं। उन्हें सबसे शिकायतें ही हैं। शायद अपने से भी होंगी। वो कभी खुद भी अपने गिरेबान में झांक तो लें। वो खुद कब इस सवाल का जवाब दे देंगे कि वो दिल्ली को पेयजल के संकट से फलां-फलां तारीख तक उबार देंगे?यह समझने की जरूरत है कि दिल्ली का मतलब सिर्फ हरे-भरे पेड़ों से लबरेज नई दिल्ली का लुटियन क्षेत्र ही नहीं है। राजधानी का मतलब दक्षिण दिल्लीउत्तर दिल्लीपश्चिम दिल्ली या यमुना पार की सभ्रांत आवासीय कॉलोनियां भी नहीं है। दिल्ली के लगभग आधे लाखों नागरिक उन अनधिकृत कॉलोनियोंघनी बस्तियोंझुग्गियों में भी जीवन यापन करने के लिए अभिशप्त हैं, जहां पर पानी मयस्सर नहीं है। जरा सोचिए कि किन हालातों में भीषण गर्मी के मौसम में लोग रहते होंगे। आप नोट कर लें कि अरविंद केजरीवाल कभी पानी के बिन्दु पर बात तक नहीं करते। क्या जो बात सारी दिल्ली को पता हैउससे वो अनभिज्ञ हैं कि राजधानी के लाखों नागरिकों के घरों में पानी नहीं आता। ये अभागे हर रोज निजी जल आपूर्तिकर्ताओं से उपयोग के पानी खरीदने को मजबूर हैं। दस लाख की आबादी वाले संगम विहार में दिल्ली जल निगम से पानी की सप्लाई ही नहीं होती। यह हाल है दिल्ली का। उधर मुंबई में भी पेयजल संकट गहराता जा रहा है। वहां पानी कटौती से नाराज नागरिक मोर्चा निकालते रहत हैं। मुंबई से सटे ठाणे और उल्लासनगरभिंवड़ी में भी जल संकट दिनों-दिन बढ़ ही रहा है। कुल मिलाकर स्थिति निराश करती है। जब मुंबई और दिल्ली में ही गाड़ी के पटरी से उतरने वाली स्थितियां निर्मित हो चुकी है,तो फिर अन्य शहरों की बात करने का भी कोई मतलब नहीं रह जाता। पिछले दो-तीन वर्षों के भीतर हमने आईटी की राजधानी कहे जाने वाले बैंगलुरू और तमिलनाडू की राजधानी चेन्नई में भी बारिश से हुई भारी तबाही को देखा था। मतलब साफ है कि हम प्रकृतिजन्य आपातकालीन स्थितियों का सही से सामना करने में असमर्थ हैं। केन्द्र और राज्य सरकार सरकारों को शहरों को मरने से बचाना होगा। इन्हें रहने लायक बनाने की आवश्यकता है। इनसे ही देश को हर साल मोटा आयकर प्राप्त होता है। इनमें विकास के नाम पर अब हरियाली को खत्म करने की होड़ सी मची हुई है। शहरों- महानगरों की घटती हरियाली को बचाने के लिए अब सबको मिल-जुलकर आगे आना ही होगा। विकास योजनाओं की आड़ में पेड़ कटने बंद करने ही होंगे। अकारण अंधाधुंध तरीके से पेड़ों को नेस्तानाबूत करना रोकना ही होगा। अब राजधानी दिल्ली में और इससे पहले मुंबई और बैंगलुरू में पेड़ों को बेरहमी से काटने के विरोध में स्वत: स्फूर्त भाव से नागरिक सामने आए। दिल्ली में चिपको आंदोलन का भाग- दो देखने में आया। इसमें दिल्ली वालों की भागेदारी शानदार रही।

दक्षिणी दिल्ली में सात सरकारी आवासीय कॉलोनी बनाने के लिए 17 हजार पेड़ों को काटने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। पेड़ों को काटने का विरोध सड़क से लेकर सोशल मीडिया पर हो रहा था। निश्चित रूप से दिल्ली में हजारों पेड़ों को काटे जाने का पर्यावरण पर जो असर पडतावह दिल्ली के आम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा। खैरदिल्ली के चिपको आंदोलन के चलते हजारों 50 साल से लेकर सदियों पुराने नीमपीपलअशोक वगैरह के पेड़ कटने से बच गए।

मुंबई और बैंगलुरू में भी स्थानीय नागरिक हाल के दौर में सड़कों पर उतर आए ताकि उनके शहरों के पेड़ बच सकें। उनके आंदोलन का सकारात्मक असर हुआ। संबंधित सरकारी विभाग झुके। उन्होंने अपनी भावी योजनाओं में संशोधन किए। मुंबई मेट्रो अपनी योजनाओं को अंतिम रूप देने के लिए धड़ाधड़ पेड़ काट रही थी। पर वहां के नागरिकों के इसका विरोध करने पर उसको भरोसा देना पड़ा कि मुंबई मेट्रो पेड़ों को काटते वक्त सावधानी बरतेगी। जब कोई विकल्प नहीं बचेगा तब ही पेड़ कटेंगे। मुंबई और बैंगलुरू की स्थिति वास्तव में बेहद गंभीर है। इन दोनों मेट्रो शहरों में ग्रीन कवर मुश्किल से मिलता है। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब बैंगलुरु को बगीचों का शहर माना जाता था। जिन्होंने बैंगलुरू को 15-20 साल पहले देखा हैउन्हें पता है कि यह बेहद खूबसूरत शहर हुआ करता था। पर देखते ही देखते बैंगलुरू की हरियाली घटने लगी। यह स्थिति इसलिए आई क्योंकि हरियाली के स्थान पर बन गई भव्य बहुमंजिली इमारतें। जहां तक मुंबई की बात है तो वहां पर दक्षिण मुंबई के अलावा हरियाली कहीं दिखाई देती ही नहीं। सब तरफ इमारतें ही इमारतें।

एक बात समझने लायक है कि हमारे शहरतब ही रहने लायक रहेंगेजब इनमें रहने वाले इनके प्रति अपनत्व का भाव रखेंगे और प्राकृतिक सम्पदा का आदर करेंगे। वे अपने जन प्रतिनिधियों से जब बार-बार सवाल पूछेंगे कि वे अपने दायित्वों को निर्वाह करने के प्रति गंभीर क्यों नहीं हैं? तभी सुधार की किरणें दिखाई देंगी।