देश में क्यों बनी कैश क्रंच की स्थिति

इसके अलावा नकदी के संकट को बढ़ाने में सोशल मीडिया का भी बड़ा हाथ रहा है। सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर कैशलेस एटीएम से संबंधित खबरें और एटीएम के बाहर लगी कतार की तस्वीरें प्रसारित की जा रही हैं

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लगभग डेढ़ साल पहले नोटबंदी के समय एटीएम के बाहर लंबी लंबी लाइनें लगी थी और अब एक बार फिर देश में कई एटीएम के बाहर लंबी लंबी लाइन लग रही हैं। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में अचानक 11 राज्यों से एटीएम खाली होने की खबर आयी। कई बैंकों के एटीएम के बाहर कैश नहीं होने का बोर्ड लटकने लगे। खबर आयी कि देश के राज्यों के 75 फीसदी एटीएम में पैसा नहीं है। कर्नाटक में अगले महीने ही चुनाव होने वाले हैं। वहां की स्थिति तो और खराब हो गयी। बेंगलुरू, बेलगाम, गुलबर्गा, बीजापुर और मैंगलोर जैसे शहरों से एटीएम के महज दो घंटे में खाली हो जाने की खबरें आने लगीं। कैशवैन एटीएम में पैसे डालकर जाता और अगले दो घंटे बाद ही बैंकों के पास एटीएम खाली होने की सूचना पहुंच जाती।

नोटों की किल्लत शुरू होते ही जहां विपक्षी पार्टियां भी मुद्रा में आ गई। सोशल मीडिया पर भी कैशलेस एटीएम ट्रेंड करने लगा। 17 अप्रैल को नकदी का संकट ट्विटर पर टॉप टेन में ट्रेंड कर रहा था। इसी तरह फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिये भी कैशलेस एटीएम की बात काफी तेजी से प्रसारित हो रही थी। सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल बन गया था मानों देश में नोटों की भयानक कमी हो गयी है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कैश की कमी को नोटबंदी से जोड़ते हुए एक नये घोटाले का राग अलापना शुरू कर दिया। उनकी ही पार्टी के अजय माकन ने भी प्रधानमंत्री पर नोटबंदी के जरिये बैंकिंग सिस्टम को ध्वस्त करने का आरोप लगा दिया और कहा कि उसकी वजह से ही अब नकदी के संकट के हालात बने हैं। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी देश में वित्तीय आपातकाल की बात कहने लगीं। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने भी कह दिया कि देश से नोटबंदी का असर खत्म नहीं हुआ है। वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना था कि कर्नाटक चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। इसी वजह से देश में कैश के संकट की स्थिति बनी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) नेता असदुद्दीन ओवैसी कैश क्रंच को कठुआ और उन्नाव में हुए दुष्कर्म कांड से जोड़ दिया। उनका कहना था कि केंद्र जानबूझकर नकदी का संकट उत्पन्न कर रहा है, ताकि देश का ध्यान कठुआ और उन्नाव की घटनाओं से हट जाये।

देश में नकदी के संकट के हालात बने तो केंद्र सरकार ने दावा किया कि फिलहाल देश में 18 लाख करोड़ रुपये की करंसी सरकुलेशन में है, जबकि नोटबंदी के पहले 17.5 लाख करोड़ की करंसी सरकुलेशन में थी। इसके साथ ही सरकार का कहना था कि बैंकों के सरकुलेटिंग स्टॉक में अभी भी सवा लाख करोड़ के नोट मौजूद हैं, जबकि कंटिनजेंसी स्टॉक में डेढ़ लाख करोड़ रुपये कीमत की करंसी पड़ी हुई है। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक का दावा है कि देश के 85 फीसदी एटीएम ठीक से काम कर रहे हैं। सरकार ने त्वरित उपाय करते हुए 500 रुपए के नोट की प्रिंटिंग को पांच गुना तक बढ़ाने का ऐलान किया है। अभी तक रोजाना 500 करोड़ रुपए की करंसी प्रिंट की जा रही थी, लेकिन अगले कुछ दिनों तक भारतीय रिजर्व बैंक नोटों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए रोजाना ढाई हजार करोड़ की करेंसी प्रिंट करेगा, ताकि हालात पर तुरंत काबू पाया जा सके।

जानकारों का कहना है कि मौजूदा नगदी संकट की एक बड़ी वजह नकदी की मांग में कृत्रिम तौर पर अचानक हुई तेज वृद्धि है। इसके पहले जनवरी, फरवरी और मार्च के महीने में औसतन प्रति माह 40 से 45 हजार करोड़ रुपये कीमत के नोटों की खपत हुई थी, जबकि अप्रैल के महीने में 13 तारीख तक ही बैंकिंग सिस्टम से 45 हजार करोड रुपए की निकासी हो चुकी है। एक पखवाड़े से भी कम समय में अचानक हुई इस निकासी से बैंकिंग सिस्टम दबाव में आ गया है।

इसके अलावा नकदी के संकट को बढ़ाने में सोशल मीडिया का भी बड़ा हाथ रहा है। सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर कैशलेस एटीएम से संबंधित खबरें और एटीएम के बाहर लगी कतार की तस्वीरें प्रसारित की जा रही हैं। कई वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है कि देश में जल्द ही भयावह नकदी के संकट की स्थिति बनने वाली है। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा फाइनेंशियल रिजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (एफआरडीआई) का भी हौव्वा एक बार फिर खड़ा किया जा रहा है। हालांकि केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यह सिर्फ एक अफवाह है। इसके बावजूद लोगों में अपना कैश निकाल कर अपने पास सुरक्षित कर लेने के इरादे से हड़बड़ी की स्थिति बनी है। लोग अधिक से अधिक कैश निकाल कर अपने पास सुरक्षित करने में लग गए हैं।

एटीएम और बैंक से कैश की बड़े पैमाने पर हो रही निकासी के संबंध में जानकारों का कहना है कि हर वित्तीय वर्ष की शुरुआत में नकदी के उठान में स्वाभाविक तेजी आती है। भारत सरकार को भी पिछले कई सालों के ट्रेंड के मुताबिक इस बात की उम्मीद थी कि जहां अन्य महीनों में औसतन 40 से 45 हजार करोड़ रुपये की नकदी की निकासी होती है, वहां पहले के ट्रेंड के मुताबिक इस साल अप्रैल के महीने में नकदी का उठान बढ़कर 55 से 60 हजार करोड़ तक हो सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के करंसी सरकुलेशन विभाग द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी के मुताबिक अप्रैल के महीने में 55 से साठ हजार करोड़ रुपये की नकदी के उठान का अनुमान पूरे अप्रैल महीने के लिए किया गया था। ऐसा अनुमान पिछले दस सालों के दौरान आलोच्य महीने में होने वाली नकदी की मांग और पिछले छह महीने के दौरान नकदी के मासिक उठान के ट्रेंड के आधार पर लगाया जाता है। लेकिन ये व्यवस्था तब फेल हो गयी, जब महीने के शुरुआती 13 दिन में ही 45 हजार करोड़ रुपये का उठान हो गया। कैश की मांग में हुई ऐसी अचानक बढ़ोतरी ने पूरी व्यवस्था को ही ध्वस्त कर दिया।

अन्य कारणों के साथ ही शादी के सीजन की वजह से भी नकदी की मांग बढ़ी है। अप्रैल और मई के पहले पखवाड़े में काफी शादियां होने वाली हैं। इसके साथ ही अक्षय तृतीया जैसे त्योहार में भी स्वर्ण-आभूषण में होने वाले भारी-भरकम निवेश की वजह से भी नगदी का उठान तुलनात्मक तौर पर ज्यादा होता है। ये सभी ऐसे कारक हैं, जिनका अनुमान सरकार को पहले से ही होना चाहिए। अगर सरकार इसका अनुमान ठीक से नहीं लगा सकी तो इसके लिए सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक की आलोचना भी की जानी चाहिए।

हालांकि इस पूरे मामले की सबसे बड़ी वजह झूठी अफवाह ही रही है। अफवाह के कारण लोगों में डर की स्थिति उत्पन्न हुई और 17 अप्रैल तक जो स्थिति देश के 11 राज्यों में थी, वह अगले दिन ही बढ़कर अन्य राज्यों की ओर भी फैलने लगी। 18 अप्रैल को देश के लगभग हर राज्य में एटीएम के बाहर लंबी लाइन लगने की खबरें आ रही थीं। अफवाह की वजह से अधिसंख्य लोगों में इस बात का डर बैठ गया कि अगर कैश नहीं रहा तो आड़े मौकै पर वे अपना काम कैसे चलाएंगे। यही वजह है कि लोगों ने अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा राशि की निकासी शुरू कर दी। यही स्थिति डेढ़ साल पहले नोटबंदी के दौरान भी देखने को मिली थी। उस समय कई लोग जब भी एटीएम में पैसा होने की खबर पाते थे तो तुरंत एटीएम की लाइन में खड़े हो जाते थे, ताकि अपने पास कैश का पर्याप्त स्टॉक बना रहे।

कैश क्रंच की वजहों में से एक वजह कुछ सेक्टर्स द्वारा भारी मात्रा में कैश की निकासी करना भी रहा है। जिन सेक्टर्स में नकदी की जरूरत ज्यादा होती है, उन सेक्टर्स द्वारा कैश विड्रॉ करने की प्रवृत्ति अप्रैल के दूसरे और तीसरे हफ्ते में काफी तेज नजर आयी। ऐसे सेक्टर्स में कंस्ट्रक्शन, मैनुफक्चरिंग और अपैरल सेक्टर का नाम लिया जा सकता है। ये ऐसे सेक्टर हैं, जहां कामगारों को दैनिक या साप्ताहिक आधार पर भुगतान करना पड़ता है।

इसके अलावा एक बड़ा सच ये भी है कि अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी निश्चित रूप से हुई है। नोटबंदी के बाद 1000 के नोट बंद कर 2000 के नोटों की शुरुआत कर दी गयी। लेकिन इसकी वजह से समान कीमत के लिए नोटों की संख्या में पचास फीसदी की कमी हो गयी। यानी पहले जहां दस हजार रुपये के लिए कम से कम दस नोट (एक हजार के) की जरूरत होती थी, तो अब उसके लिए पांच नोट (दो हजार के) से भी काम चल जाता है। स्वाभाविक रूप से इसका भी बाजार में नकदी की उपलब्धता पर कुछ असर तो जरूर पड़ा है।

इसके साथ ही एक बड़ी वजह नोटों की जमाखोरी की भी है। नोटबंदी के बाद जब लोगों को मजबूरन घरों में रखा और तिजोरियों में बंद पैसा बैंकिंग व्यवस्था में डालने के लिए विवश होना पड़ा था तो निश्चित रुप से अर्थव्यवस्था में नकदी की उपलब्धता काफी बढ़ गयी थी। लेकिन, एक बार स्थिति के सामान्य होते ही कालाबाजारियों ने फिर से बड़े नोटों की जमाखोरी शुरू कर दी और बड़े नोट तिजोरियों में बंद होने लगे। अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी की एक बड़ी वजह यह भी है। केंद्र सरकार को इस दिशा में तुरंत ही ध्यान देना होगा, अन्यथा स्थिति और भी खराब हो सकती है।

हिन्दुस्थान समाचार/योगिता पाठक

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