Home India Elections अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने के लिए करहल को ही क्यों चुना

अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने के लिए करहल को ही क्यों चुना

सपा नेतृत्व अखिलेश के संसदीय क्षेत्र आज़मगढ़ में गोपालपुर सीट के लिए इच्छुक था; एक समय संभल ज़िले के गुन्नौर से चुनाव लड़ने के विकल्प पर भी सरखपाई हो रही थी

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सपा प्रमुख अखिलेश यादव का मैनपुरी की करहल सीट से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय एक स्पष्ट चयन प्रतीत हो सकता है क्योंकि यह 2002 के अपवाद को छोड़ लगभग तीन दशकों तक पार्टी के लिए एक सुरक्षित गढ़ रहा है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बात इनती सीधी नहीं है जितनी लग रही है। अखिलेश पिछले साल नवंबर तक चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे और उन्होंने मीडिया को इस बारे में बताया था। यह निर्णय मोटे तौर पर इस विश्वास पर आधारित था कि चुनाव लड़ने से वह अपने स्वयं के चुनाव प्रचार में ऐसे जुट जाएँगे कि पार्टी के अन्य उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा। लेकिन एक पखवाड़े बाद सपा प्रमुख ने अपने पहले के निर्णय में संशोधन किया और कहा कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव लड़ने और सीट के चुनाव पर भी फैसला करेगी। भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को क्रमशः गोरखपुर (शहरी) और सिराथू सीटों के लिए पार्टी की पसंद के रूप में नामित किए जाने के बाद उनके पहले विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा तेज़ हो गई।

आख़िरकार पार्टी सूत्रों ने गुरुवार को पुष्टि की कि अखिलेश करहल सीट से चुनाव लड़ेंगे। सूत्रों ने कहा कि शुरू में पार्टी नेतृत्व अखिलेश के संसदीय क्षेत्र आज़मगढ़ में गोपालपुर सीट के लिए इच्छुक था। एक समय संभल ज़िले के गुन्नौर से चुनाव लड़ने के विकल्प पर भी सरखपाई हो रही थी और इसलिए मैनपुरी सदर सीट का चुनाव भी काफी लंबे समय से एक पारिवारिक मैदान रहा है और मुलायम खुद दो बार गुन्नौर से जीते हैं जबकि वर्तमान सपा प्रमुख मैनपुरी से मौजूदा सांसद हैं।

अंत में करहल को चुना गया जहाँ से मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक सलाहकार नाथू सिंह यादव ने 1957 के चुनावों में जीत हासिल की थी।

सपा सूत्रों ने कहा कि करहल को चुनने के पीछे की रणनीति इस क्षेत्र पर अखिलेश की उम्मीदवारी का सबसे अच्छा प्रभाव बनाने की थी। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “इसका असर न केवल पूरे आगरा मंडल पर पड़ेगा, जिसका मैनपुरी एक हिस्सा है, बल्कि कानपुर और अलीगढ़ संभाग को भी प्रभावित करेगा।”

अंदरूनी सूत्रों के अनुसार 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान यादव परिवार में वर्चस्व की लड़ाई के समय शिवपाल का साथ देने वाले सपा के कुछ नेता चाचा के फिर से भतीजे अखिलेश से हाथ मिलाने से खुश नहीं हैं. ऐसा ही एक नाम था मुलायम सिंह के बहनोई प्रमोद गुप्ता जो गुरुवार को औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। पूर्व विधायक रघुराज शाक्य (इटावा) और शिवकुमार बेरिया (रसूलाबाद-कानपुर देहात) जैसे शिवपाल के अन्य समर्थक भी सपा की संभावनाओं को कुछ नुकसान पहुंचा सकते हैं। सपा के रणनीतिकारों का मानना ​​है कि करहल से अखिलेश की उम्मीदवारी से इस तरह के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी।

वैसे पार्टियों के अपने अपने फीडबैक के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा फ़िलहाल प्रतिस्पर्धा में आगे है।

यदि अखिलेश यादव आज़मगढ़ से लड़ते तो भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में सपा की संभावनाओं में कोई विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलता जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी हाथ से गया तो सपा के लिए बहुत बुरा होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए सपा ने तुलनात्मक दृष्टि से मज़बूत प्रांत से पार्टी के मुखिया को लड़वाना उचित समझा।

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