बीमार मेडिकल क्षेत्र का कौन करेगा इलाज

होता यह है कि मंहगी फीस की वजह से अच्छी रैंकिंग लाने वाले छात्र मेडिकल कालेजों में दाखिला लेने की स्थिति में ही नहीं होते

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कभी-कभी कष्ट होता है कि हमारे इस महान कहे जाने वाले देश में मेडिकल क्षेत्र से कोई बहुत उल्लेखनीय अनुसंधान की खबरें क्यों नहीं आतीं। एक तरह की दशकों से यथास्थिति बनी हुई है। मोटा-मोटी खबरें यही आती हैं, कि निजी अस्पतालों में डाक्टर रोगियों का खून चूस रहे हैं या फिर डाक्टर इलाज करते वक्त घोर लापरवाही बरत रहे हैं। मतलब यह कि आज रोगी अस्पताल जाकर भी कतई सुरक्षित नहीं है। यह स्थिति भयावह है I सारा मेडिकल क्षेत्र ऐसा लगता है कि राम भरोसे ही चल रहा है। आप बात मेडिकल कॉलेजों में दाखिले से ही शुरू कर लीजिए।

अपने देश में एमबीबीएस की सिर्फ साठ हजार सीटें उपलब्ध हैं। इसके बावजूद इनमें उन छात्रों को भी दाखिला मिल जाता है,जिनकी रैंक तीन लाख या उससे भी अधिक होती है। आपको यह सुनकर अजीब सा लग सकता है। पर यही वास्तविक स्थिति है। यह सब इसलिए हो पा रहा है क्योंकि आसमान छूती प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस देने में हजारों नहीं लाखों मेघावी छात्र प्रतिवर्ष असमर्थ होते हैं। इसलिए वे अपनी सीटे मजबूरी में छोड़ देते हैं। उनकी सीट मोटी फीस देने के लिए तैयार छात्र जल्दी से लपक भी लेते हैं।

होता यह है कि मंहगी फीस की वजह से अच्छी रैंकिंग लाने वाले छात्र मेडिकल कालेजों में दाखिला लेने की स्थिति में ही नहीं होते। वे जो स्थान छोड़ते हैं, उन पर कम अंक लाने वालों को मुंहमांगी डोनेशन (या यूँ कहें कि घुस लेकर) दाखिला दे दिया जाता है। बात शुरू कर लेते हैं पंजाब से। कुछ समय पहले मुझे पता चला कि पंजाब में आठ कॉलेज बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस के अंतर्गत, तीन कॉलेज पंजाब सरकार के अंतर्गत और चार निजी कॉलेज हैं। जबकि एक निजी यूनिवर्सिटी भी है। निजी यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की फीस 64 लाख रुपए है, जबकि सरकारी कॉलेजों में यही फ़ीस मात्र 4 लाख रुपए है। यकीन मानिए कि सारे देशभर के तमाम मेडिकल कॉलेजों में यही स्थिति है। सरकारी कोटे से निजी कॉलेजों में एडमिशन लेने वाले छात्रों के लिए 4 लाख रुपए फीस देनी होती है, वहीं निजी यूनिवर्सिटीज में लगभग एक करोड़ के लगभग फीस चुकानी पड़ती है।

अल्पसंख्यक संस्थानों के नाम पर चलाये जाने वाले मेडिकल कालेजों के मजे ही कुछ और हैं। ये तो कानूनन अपनी आधी सीट डोनेसन या घूस लेकर बेच सकते हैं। हममें से कोई यह तो भी पूछकर देखे कि इनके संस्थानों में अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं का प्रतिशत ही कितना है? उत्तर से आप चौंक जायेंगे। शायद दस-बीस प्रतिशत।

मेधावी छात्रों से दूर होते मेडिकल कॉलेज

सवाल यह है कि आखिर ईमानदार और मेहनतकश अभिभावक इतनी भारी-भरकम फीस देंगे कहां से? क्या पैसा कोई पेड़ों में लगता है कि उसे वहां से तोड़कर फीस के रूप में दे दिया जाए? ठीक है कि अब एजुकेशन लोन भी मिलता है। पर उसे ब्याज के साथ वापस भी तो करना होता है। उस लोन के लिए भी यदि 4 लाख से ऊपर का हो तो गारंटर, जमीं जायदाद गिरवी रखने की तमाम प्रक्रियाएं लागू हो जाती हैं। 4 लाख के लोन से मेडिकल की फ़ीस खान से पूरी पड़ेगी? बेशक निजी कॉलेजों की तरफ से ली जाने वाली अनाप-शनाप फीस की वजह से मेडिकल कालेजों में मेधावी छात्र नहीं आ पाते। जो बच्चे एक करोड़ रुपये देकर डाक्टर बनेंगे वे कालेजों से बाहर निकलते ही रोगियों को नोच-नोचकर खाने लगेंगें तो और क्या करेंगें ? वे रोगियों से मोटी फीस लेते हैं। इसके अलावा रोगियों से तरह तरह के बेवजह के टेस्ट करवाते हैं क्योंकि, सभी लैब, टेस्ट के चार्ज का मोटा प्रतिशत डाक्टरों को कमीशन देते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि वे टेस्ट पर टेस्ट इसलिए करवाते हैं क्योंकि, उन्हें मेडिकल टेस्ट करने वाली कंपनी से पैसा मिलता है। यानी वे दोनों हाथों से पैसा बटोरने लगते हैं। अब इस तरह के डाक्टरों से आप किसी बड़े अनुसंधान की उम्मीद तो मत करिए। इनका तो एकमात्र लक्ष्य ज्या से ज्यादा नोट कमाना ही रहता है। आख़िरकार ये करोडपति बाप के बेटे बने डॉक्टर भी क्या करें। इन्हें भी अपना एक करोड़ रुपये की लागत सूद सहित तो निकालनी ही है,जल्द से जल्द और जो कुछ भी लोनलिया है उसे बैंक को एजुकेशन लोन भी वापस करना है।

फीस में भारी उछाल

अभी कुछ समय पहले उत्तराखंड के 3 प्राइवेट मेडिकल कालेजों ने अपनी फीस को मनमाने तरीके से बढ़ा दियाथा। इन्होंने गेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्सेज की फीस करीब 300 फीसदी तक बढ़ा दी थी। फीस बढ़ाने में देहरादून के स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी का हिमालयन मेडिकल कॉलेज, एसजीआरआऱ यूनिवर्सिटी का एसजीआरआऱ मेडिकल कॉलेज और सुभारती यूनिवर्सिटी का सुभारती मेडिकल कॉलेज शामिल थे। सुभारती का एक मेडिकल कॉलेज मेरठ में भी है I जहां एसजीआरआर मेडिकल कॉलेज और हेल्थ साइंसेज कॉलेज ने प्रथम वर्ष की एमबीबीएस ट्यूशन फीस को 5 लाख से बढ़ाकर 19.76 लाख रुपये करने का निर्णय लिया था, वहीं एमडी इन जनरल मेडिसिन के पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स की पहले वर्ष की फीस 7.38 लाख रुपये से बढ़ाकर 26.6 लाख रुपये कर दी गई थी। हालांकि तगड़े विरोध के बाद कालेजों ने अपना फैसला बदला। वैसे यह तो मात्र घोषित फीसें हैं। एम.डी. के दाखिले का डोनेसन या घूस की दर कहीं भी दो करोड़ से पांच करोड़ तक है। कौन लायेगा इतना पैसा? भ्रष्ट राजनेताओं और घूसखोर अधिकारियों के अतिरिक्त? बड़ा व्यापारी भी इतना पैसा नहीं जूता पायेंगेंI

मैंने जैसा कि पहले इंगित किया कि मेडिकल शिक्षा पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए, उतना हमारे यहां नहीं दिया जा रहा है। जिस देश की आबादी 125 करोड़ है, वहां पर हर साल सिर्फ साठ हजार डाक्टर ही निकल रहे हैं। ये आंकड़ा बहुत निराश करने वाले हैं। इस क्षेत्र में फैली अव्यवस्था का एक और उदाहरण हाल ही में मिला। दरअसल भारत के कुछ समय पहले जार्जिया गए 62 में से 52 छात्रों को जॉर्जिया एयरपोर्ट से वापस देश लौटा दिया गया। ये सब मेडिकल की पढ़ाई करने गए थे।

जॉर्जिया एयरपोर्ट अथॉरिटी की तरफ से इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। पीड़ित छात्रों ने भारत के विदेश मंत्रालय से शिकायत की है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस मामले पर कार्रवाई करने की बात कही है। पीड़ितों में भोपाल, इंदौर और सेंधवा सहित मध्य प्रदेश के ही ज्यादातर छात्र-छात्राएं शामिल हैं। दरअसल भारत से ये 62 छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए विगत 8 अप्रैल को जॉर्जिया गए थे। जहां छात्रों को एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया। मेडिकल छात्र-छात्राओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें एयरपोर्ट पर जमीन पर बैठा दिया गया। पानी पीने और बाथरूम की इजाजत भी नहीं दी गई। एयरपोर्ट में घंटों बैठने के बाद उन्हें वापस भारत भेज दिया गया। छात्रों का कहना था कि पासपोर्ट भी एयर अरेबिया के विमान स्टाफ को यह कहकर दिया कि दिल्ली उतारने के बाद उन्हें दिया जाए।दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचकर भी पासपोर्ट वापस लेने के लिए छात्र-छात्राओं को सुबह से शाम तक जद्दोजहद करनी पड़ी। बच्चों के साथ हुए ऐसे सलूक से खफा छात्र-छात्राओं के परिजनों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया। इस पर मंत्री ने आश्वासन भी दिया कि भारतीय दूतावास मामले को देख रहा है।

पंगु हुआ मेडिकल क्षेत्र

अब आप खुद देख लें कि हमारे यहां सारा मेडिकल क्षेत्र पंगु हो रहा है। यानी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने से लेकर अस्पतालों में अराजकता व्याप्त है। उधर, डाक्टरों और रोगियों के बीच की खाई लगातार गहरी हो रही है। संबंधों में अविश्वास की भावना पैदा हो चुकी है। रोगी को लगता है कि वो जिस डाक्टर के पास इलाज के लिए गया है, वही उसका खून चूस रहा है। ये स्थिति छोटे गांवों,कस्बों से लेकर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों तक व्याप्त है। दिल्ली- मुंबई में दर्जनों डाक्टर अपने निजी गॉर्ड और बाउंसर भी रखने लगे हैं। इस सबकी कुछेक वर्ष पहले तक कल्पना करना भी संभव नहीं था। और इससे जुड़ा हुआ ही प्रश्न यह है कि रोगी के मित्र और ऱिश्तेदार इतने उग्र क्यों हो गए हैं कि वे जिस डाक्टर के पास इलाज के लिए अपने मरीज को लाते हैं, फिर उसी (डाक्टर) पर हाथ छोड़ने से भी पीछे नहीं रहते। अगर आप सारे मामले की तह में जाएंगे तो पाएंगे कि कुछ डाक्टर और अस्पताल रोगी को ग्राहक मानने लगे हैं। दूसरी ओर मरीज भी डॉक्टरों को दूसरा भगवन मानने की जगह पैसे चूसने वाले कसाई या महाजन मानने लगे हैं I इसके कारण ही डाक्टरों और रोगियों के आपसी संबंध कटु हो रहे हैं। अब डाक्टरों का पहले वाला सम्मान नहीं रहा समाज में। इसकी एक वजह ये भी है कि रोगी को टेस्ट के नाम पर खुल्लम-खुल्ला लूटा जा रहा है। उसे रोगी ना समझकर ग्राहक माना जाना वास्तव में बेहद गंभीर मसला है। अब बड़ा सवाल ये है कि देश के बीमार हो गए मेडिकल क्षेत्र को सुधारेंगा कौन? इस ओर निश्चय ही तुरंत कदम उठाने होंगे।