केजरीवाल अब कब करोगे दिल्ली में काम?

पिछले दिनों मानहानि के आरोपों में घिरे और फिर फंसने लगे तो अरुण जेटली से लेकर कपिल सिब्बल वगैरह से बेशर्मीपूर्वक माफी भी मांगने लगे

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का नाटक जारी है। यह अनिश्तिकालीन है। लगता है कि कभी खत्म ही नहीं होगा। वे पद की गरिमा को पूर्णतः भूल चुके हैं। उन्हें समझ ही नहीं आता कि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। वे और उनके तीन मंत्री क्रमश: सतेन्द्र जैन, मनीष सिसोदिया और गोपाल राय धरने पर बैठे हैं। य लोग राज्यपाल के खिलाफ उनके निवास पर उनके ही ड्राइंग रूम में धरना दे रहे हैं। इस एयर कंडीशंड रूम के आरामदायक सोफे पर लेटकर धरना देना जारी है। कभी आपने सुना है इस तरह का धरना। इनकी मांगें भी प्रतिदिन बदल रही हैं। ये स्थायी नहीं हैं। ये कभी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करते है, तो कभी कहते हैं कि आईएएस अफसरों की हड़ताल खत्म होनी चाहिए तो कभी मांग करते है कि राशन की डोरस्टेप डिलीवरी लागू होनी चाहिए।

केजरीवाल के आरोपों को आईएएस बिरादरी सिरे से खारिज कर रही है। उसका दावा है कि वे प्रतिदिन काम कर रहे हैं। काम नहीं करने का प्रश्न ही नहीं होता। लड़ने-झगडने में माहिर दरअसल केजरीवाल को तो लड़ना-झगड़ना ही पसंद है। वे पहले नजीब जंग से लड़ रहे थे। उन पर रोज आरोपों की बौछार करते थे। जंग सुसंस्कृत इंसान थे। पूर्व आईएएस अफसर रहे थे। रंगकर्मी थे। वे केजरीवाल की ओछी हरकतों से इस कदर आजिज आए कि उन्होंने अपना पद ही छोड़ दिया। उनके बाद केजरीवाल ने उप राज्यपाल अनिल बैजल से लड़ाई-फसाद करना चालू कर दिया। बैजल की एक गंभीर इंसान और अफसर की इमेज रही है। इसके बाद भी बैजल को रोज उनसे जूझना पड़ रहा है।

केजरीवाल को लगता है कि वे ही दूध के धुले हैं। शेष सारा संसार पतित है। वे किसी पर कोई भी आरोप लगाकर निकल सकते हैं। पिछले दिनों मानहानि के आरोपों में घिरे और फिर फंसने लगे तो अरुण जेटली से लेकर कपिल सिब्बल वगैरह से बेशर्मीपूर्वक माफी भी मांगने लगे। वे इन सब पर भी मिथ्या आरोप लगा रहे थे। केजरीवाल को अब पूरे देश से भी माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने समाज की कई खास शख्सियतों पर बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। लोकतंत्र में वैचारिक दृष्टिकोण का अंतर और मत-भिन्नता तो हो सकती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। पर लोकतंत्र किसी को यह अनुमति नहीं देता कि कोई भी अपने राजनीतिक विरोधी पर बेबुनियाद आरोप लगाए। आपकी भाषा शालीन तो रहनी ही चाहिए।

भाषा में किसी तरह की अनुशासनहीनता इस देश की संस्कृति में स्वीकार्य नहीं है। भाषा मर्यादित होनी ही चाहिए। पर केजरीवाल यह सीखने के लिए राजी ही नहीं है। खैऱ, नेताओं से माफी मांगने के बाद भी अब वे फिर से धरना दे रहे हैं। आरोप लगा रहे हैं। यह बात समझ से परे है कि चार साल शासन करने के बाद वे अचानक से दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग क्यों करने लगे? उनसे पहले दिल्ली में कांग्रेस सरकार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और एनडीए सरकार के दौर में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच में बेहतरीन तालमेल के साथ दिल्ली का चौतरफा विकास हो रहा था। कहीं कोई विरोध-अवरोध नहीं था। दो अलग-अलग दलों की सरकारें मिलकर राजधानी को शानदार बनाने में जुटी थीं। उसी दौर में दिल्ली मेट्रो यहां आई और उसने दिल्ली वालों की जिंदगी बदल डाली। यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चुस्त हो गई। तब न तो केजरीवाल थे, ना ही उनकी पार्टी की सरकार। पर चूंकि वे हर मोर्चे पर असफल रहे हैं, इसीलिए वे अब नाटकबाजी कर रहे हैं।

धरने ही धरने केजरीवाल ने 2014 में भी मुख्यमंत्री रहते हुए रेल भवन के पास पटेल चौक पर धरना दिया था। तब वे दिल्ली पुलिस के पीछे पड़ गए थे। वे तब रेल मंत्रालय पर भी आरोप लगा रहे थे। कह रहे थे कि उनकी रेल भवन में एंट्री बैन कर दी गई है। बाद में रेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि रेल भवन में केजरीवाल के प्रवेश पर रोक नहीं लगाई गई है। हां, केजरीवाल को रेल भवन परिसर के अंदर बैठक करने से मना किया गया था। यह तो ठीक ही किया गया था। पर वे चीखने-चिल्लाने लगे। तब दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के समर्थकों को दौड़ा-दौड़कर पीटा था, जिसमें कुछ को गंभीर चोटें भी आईं थीं। तब हालात इस कदर गंभीर हो गए थे कि घायलों को अस्पाताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक घटनास्थल तक नहीं पहुंच सके थे। केजरीवाल का अपने समर्थकों के साथ राजधानी की जनवरी की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में धरना देने का तब सभी दलों ने विरोध किया था। वे यहां तक कह रहे थे कि वे और उनके समर्थक गणतंत्र दिवस परेड तक भी नहीं निकलने देंगे। तब उन्हें कई स्तरों से ये सलाह दी गई थी कि उन्हें संवैधानिक पद पर रहते हुए इस तरह के हिंसक और उग्र धरनों और प्रदर्शनों से बचना चाहिए। पर वे माने नहीं।

केजरीवाल को अब देश कतई गंभीरता से नहीं लेता। उनकी ओछी राजनीति को सारा देश देख रहा है। दिल्ली की जनता तो उनसे त्राहि-त्राहि कर रही है। करते अफसरों का अनादर दरअसल केजरीवाल अपने को तानाशाह समझने लगे हैं। वे सरकारी बाबुओं को लगातार बेवजह अपमानित करते हैं। उन्हें याद रखना होगा कि सरकारी अफसर इनके बंधुआ मजदूर नहीं हैं। केजरीवाल के इशारों पर ही दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश की रात में सीएम आवास पर उनकी उपस्थिति में ही उनके विधायकों द्वारा लात- घूंसों से पिटाई की गई थी। एक सम्मानित अफसर को मारने-पीटने का मतलब क्या है? अब उनसे माफी मांगना तो दूर फिर से उनके खिलाफ एक्टिव हो गए हैं। अंशु प्रकाश से पहले अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की कार्यकारी चीफ सेक्रेटरी के पद पर शकुंतला गैमिलन की नियुक्ति पर भी आपत्ति थी।केजरीवाल ने उनपर तमाम करप्शन के आरोप लगाए थे।

केजरीवाल नहीं चाहते थे कि गैमलिन को दिल्ली की कार्यकाऱी मुख्य सचिव का पद मिले। अब आप खुद ही अंदाजा लगा लें कि वे किसी भी योग्य और साफ-सुथरी छवि वाले इंसान पर कोई भी तोहमत लगा सकते हैं। वे यह सब करने से पहले शायद सोचते तक नहीं हैं। अब उनके निशाने पर फिर से सरकारी बाबू ही हैं। वे और उनके चंपू मंत्री बाबुओं के पीछे पड़े हैं। कह रहे हैं कि ये अफसर तो काम ही नहीं करते। यानी ये सब को काम करने या न करने का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। मालूम नहीं कि ये बात केजरीवाल को कब समझ में आएगी कि सरकार की तमाम योजनाओं-परियोजनाओं को लागू करने का दायित्व नौकरशाही पर ही होता है। भारतीय संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमा तय करके रखी हैं। यदि बाबुओं को काम ही करने नहीं दिया जाएगा, तब तो अराजकता और अव्यवस्था तो स्वाभाविक रूप से व्याप्त होने लगेगी। सारे प्रशाननिक कार्य पंगु होने लगेंगे। दुर्भाग्यवश दिल्ली में अभी यही स्थिति निर्मित हो चुकी है।

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Member of Parliament (Bharatiya Janata Party), Rajya Sabha, and Chairman, Hindusthan Samachar Seva Samiti

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