कब सीखेंगे हम सेफ्टी का रास्ता

सवाल है कि ऐसे अनावश्यक हादसे और लापरवाहियां कब थमेंगी? रेलवे और बाकी संबंधित विभाग तो सुधरेंगे का नाम ही नहीं ले रहे। तो क्या यह मान लिया जाये कि हमारे यहां मासूम ऐसी लापरवाही के शिकार होते रहेंगे

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26 अप्रैल का दिन बड़ा ही मनहूस साबित हुआ। सुबह- सुबह ही खबर आई कि गौतम बुद्ध की तपस्थली कुशीनगर में 13 स्कूली बच्चे घोर लापरवाही की वजह से अपनी जान गंवा बैठे। रेल ट्रैक पर स्कूल जा रहे बच्चों की लाशें देख कलेजा कांप उठा। पत्थर-दिल इंसान भी उस भयावह मंजर को देखकर अपने आंसू रोक नहीं पाया होगा। कैसे वो बच्चे सुबह उठे होंगे स्कूल जाने के लिए। उन्हें क्या पता होगा कि आज ही उनकी जीवन यात्रा समाप्त हो जाएगी। कुशीनगर रेलवे क्रासिंग पर अगर गेटमैन होता तो शायद हादसा न होता। गेट खुला था तो बच्चों को टाटा मैजिक में स्कूल लेकर जा रहा ड्राइवर बेधड़क ट्रैक को पार करने लगा। उस ड्राइवर की भयानक चूक के कारण पैसेंजर ट्रेन ने टाटा मैजिक के परखच्चे उड़ा दिए। यदि ट्रैक पार करते वक्त ड्राइवर ने “ रुको, देखो, फिर जाओ” जैसे सामान्य ड्राइविंग के सिद्धान्त का पालन करते हुए ट्रैक पर दोनों दिशाओं में देख लिया होता तो यह हादसा न होता। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो बेचारे बच्चों ने तो ट्रेन को आता देख चीखना तक शुरू कर दिया था, पर ड्राइवर तो दोनों कानों में इअर-फोन लगाकर मनपसंद गाना सुनते हुए गाड़ी हांक रहा था।

सवाल है कि ऐसे अनावश्यक हादसे और लापरवाहियां कब थमेंगी? रेलवे और बाकी संबंधित विभाग तो सुधरेंगे का नाम ही नहीं ले रहे। तो क्या यह मान लिया जाये कि हमारे यहां मासूम ऐसी लापरवाही के शिकार होते रहेंगे। घटना के बाद मुआवजा देने की घोषणाएं भी होने लगीं। घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताये जाने वाले ट्वीट सामने आने लगे। लेकिन, अपना देश तो गलतियों से सीख लेकर अपने को सुधारने वाला दिख नहीं रहा है। यहां पर मौत सबसे सस्ती हो गई है। इस हादसे में अनेकों बच्‍चे गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं। स्‍कूल वैन में कुल 18 बच्‍चे सवार थे। ये सभी अभागे बच्चे कुशीनगर के डिवाइन मिशन स्‍कूल के थे। क्या कोई पूछेगा कि टाटा मैजिक जिसकी क्षमता मात्र सात सवारियों की है, तीन गुना सवारियों को लेकर कैसे जा रहा था। जब यह रोज ही हो रहा था तो पुलिस और परिवहन विभाग के अधिकारी या तो अंधे थे या रिश्वत लेकर इस अनियमितता की इजाजत दे रखी थी। स्कूल का प्रबंधन भी हर रोज बच्चों को इस मौत के कुंए में क्यों डाल रहा था। क्या ये सभी आपराधिक षड्यंत्र के दोषी नहीं हैं?
नहीं सीख लेंगे गलतियों से

जैसा कि मैंने पहले कहा कि हम गलतियों से सबक लेना ही नहीं जानते। उत्तर प्रदेश में इससे पहले भी इस तरह के हादसे होते रहे हैं। सन 2016 में भी भदोही के पास बच्चों से भरी स्‍कूल वैन ट्रेन की चपेट में आ गई थी। उस हादसे में 10 बच्चों की मौत हो गई थी और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उस वैन में भी करीब 19 बच्‍चे सवार थे। उस वक्‍त हादसे की वजह स्‍कूल वैन के ड्राइवर की लापरवाही को बताया गया था। तब भी मृतकों और घायलों को सरकार और रेलवे ने मुआवजा देकर इतिश्री कर ली थी। नेताओं ने मृतकों के परिवारों के प्रति संवदेना व्यक्त कर दी थी। पर हमने कुछ सीखा नहीं। क्या भदोही हादसे के लिए रेलवे के किसी अफसर को नौकरी से बर्खास्त किया गया ? क्या स्कूल प्रबंधन और ट्रॉसपोर्टर को जेल भेजा गया? नहीं। तो क्या कुशीनगर हादसे के बाद अब लापरवाह अफसरों पर गाज गिरेगी? शायद अभी भी नहीं। कबतक बर्दाश्त होंगीं ऐसी जानलेवा लापरवाहियां।

पटरियों पर खून के धब्बे
एक बार फिर से रेल की काली पटरियों पर लाल खून के धब्बे पड़ गए हैं। हमेशा की तरह से हादसे के बाद हादसे के कारण खोजे जा रहे हैं। खोज निरंतर जारी है। पर नतीजा कुछ भी नहीं। खोज के नाम पर सिर्फ लीपापोती हो रही है। इसबार अपराधियों को बचाने के लिए ऐड़ी-चोटी का प्रयास कर दो- चार दिनों के बाद सब कुछ पूर्ववत हो जाएगा। सब कुछ भूला दिया जाएगा। अगले हादसे के बाद फिर मुआवाजा दिया जाएगा, संवेदनाएं व्यक्त की जाएंगी और हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए जांच समिति गठित हो जाएगी। वो अपनी रिपोर्ट कब और किसको देगी, ये किसी को पता नहीं चलेगा। उसकी सिफारिशों के बारे में कोई कार्रवाई की तो सोचेगा भी नहीं।

यह मान लीजिए कि तगड़े और अति सख्त कदम उठाए बिना कुशीनगर जैसे हादसे नहीं रुकेंगे।आखिर कब तक कभी किसी ड्राइवर, कभी आतंकवाद और कभी मौसम को जिम्मेदार ठहराया जाता रहेगा, जबकि असली वजह बदइंतजामी और लापरवाही ही है। माना कि दुर्घटना कहीं भी हो सकती है। लेकिन यहां तो हादसा होना सामान्य सी बात मान ली गई है। ज्यादातर हादसे इंसानी लापरवाही, उपकरण संबंधी समस्याओं, बिना निगरानी वाले क्रॉसिंग, आधुनिक सुरक्षा तंत्रों के अभाव और थके-हारे तथा अनपढ़ , अकुशल और संवेदनहीन ड्राइवरों की वजह से ही होते हैं। लापरवाही भी किसी एक स्तर पर नहीं होती।नीचे से ऊपर तक यह क्रम चलता ही रहता है।

त्रासद कथा रेलवे की
भारतीय रेल की त्रासद कथा बदस्तूर जारी है, तो दूसरी तरफ उन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, जिससे इस तरह के हादसों को खत्म किया जा सके। इससे बड़ा अफसोस क्या हो सकता है कि दुनिया के विभिन्न देश ‘ न हादसा- न पटरियों पर मौत’ के लक्ष्य को पाने की कोशिश कर रहे हैं, तब हमारे यहां हादसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।

रेल विभाग की काहिली का सबसे शर्मनाक उदाहरण देश ने पिछले कुंभ मेले के समय देखा था। इलाहाबाद में आयोजित महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन होने वाले शाही स्नान में शरीक होने के लिए भारी संख्या में भक्तजन इलाहाबाद पहुंचे थे। इतने अहम मौके पर भी रेल विभाग अपने को इस तरह से तैयार नहीं कर पाया ताकि हादसे को टाला जा सके।

काहिली सेप्टी विभाग की
रेल मंत्रालय में एक भारी भरकम सेफ्टी विभाग भी है। वह क्या कर रहा है, इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। क्या ये सेफ्टी सेमिनार करने के अलावा भी कुछ करता है? लगता तो नहीं है। इस विभाग के बारे में रेलवे में काम करने वाले सभी लोग जानते हैं, पर कहना कोई नहीं चाहता, क्योंकि सबको अपनी नौकरी बचानी होती है। क्या कुशीनगर की घटना के बाद रेलवे सेफ्टी विभाग के आला अफसरों को डिसमिस नहीं किया जाना चाहिए? कुछ साल पहले उत्‍तर प्रदेश के कांशीराम नगर जिले में देर रात मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर बस और रेलगाड़ी के बीच हुई भयंकर भिड़ंत में 38 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। उस दिल दहला देने वाले हादसे में लगभग 50 से ज्‍यादा लोग गंभीर रूप से जख्‍मी हो गये थे। यह कोई पहली ऐसी वारदात नहीं थी, जब मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग ने जिदंगियों को निगला। उत्तर प्रदेश में तो बार-बार मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर मौत का खेल होते ही रहता है। राज्य के रेलवे ट्रैक सैकड़ों लोगों की कब्रगाह बन चुके हैं। राज्य में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर दर्जनों ऐसी वारदाते हो चुकी हैं, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत और लगभग इतने ही लोग घायल हो चुके हैं। ये तो वो आंकड़े हैं, जिनमें एक बार में दर्जन से ज्‍यादा मौतें हुईं। रोजाना एक-दो इंसान मानवरहित क्रॉसिंग की बलि चढ़ते ही हैं, जिनके आंकड़े महज रेलवे और पुलिस की फाइलों में दफ्न हो जाते हैं।

इन तमाम हादसों से बेखबर रेल प्रशासन मरने वालों को ज्‍यादा और घायलों को कम मुआवजा देकर अपना पल्‍ला झाड़ लेता है। मगर मानवरहित क्रॉसिंग पर उसका ध्‍यान नहीं जाता। अब सोचने वाली बात यह है कि अगर रेलवे प्रशासन समय रहते मानवरहित क्रॉसिंग पर अपना ध्‍यान केन्द्रित कर लेता तो शायद कुशीनगर में स्कूल जा रहे नौनिहाल मारे ना जाते। दरअसल रेल क्रासिंग पर चौबीसों घंटा सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है। रेलवे क्रासिंग वाले स्थान पर छोटे फ्लाईओवर या अंडरपास निर्माण उपयोगी हो सकता है। दुर्घटना संभावित स्थानों पर युद्ध स्तर पर शीघ्र कार्य करने की आवश्यकता है । ड्राइविंग लाइसेंस के नियमों को भी सख़्त करने की वश्यकता है। नहीं तो मानवता इसी तरह हर दिन घायल होती ही रहेगी। क्या अब भी देश जागने के लिए तैयार है?

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Member of Parliament (Bharatiya Janata Party), Rajya Sabha, and Chairman, Hindusthan Samachar Seva Samiti