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Sunday 5 July 2020

जम्मू में वाल्मीकि समुदाय पर 62 साल के अन्याय की समाप्ति

जम्मू-कश्मीर में संबंधित सरकारों के हाथों उनके द्वारा किए जा रहे जर्जर उपचार से नाखुश वाल्मीकि समाज ने उनके संघर्ष को जारी रखा

जम्मू और कश्मीर सरकार द्वारा वाल्मीकि समाज को अधिवास प्रमाण पत्र दिए जाने के फैसले से समुदाय में आशा की एक लहर सी दौड़ गई है। ”अब हम भी एक गरिमापूर्ण जीवन जी सकते हैं। इतने वर्षों में हमारे साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया गया। वाल्मीकि समुदाय के सदस्यों को मौलिक, संवैधानिक और मानवाधिकारों से वंचित रखा गया।” जम्मू में रहने वाले मुदाय के सदस्य एकलव्य ने इस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया दी।

एकलव्य की प्रतिक्रिया बहुत स्पष्ट है। अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद भी एकमात्र स्वीपर का काम था जिसके लिए वह हकदार था। अब हाथ में एक अधिवास प्रमाण पत्र के साथ जम्मू और कश्मीर के किसी भी अन्य नागरिक की तरह वह सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता है।

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सन 1957 में पंजाब के अमृतसर और गुरदासपुर क्षेत्र से वाल्मीकि समुदाय के सदस्य तत्कालीन राज्य सरकार के प्रधान मंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व में एक निमंत्रण के बाद जम्मू आए थे। पंजाब से सफ़ाई कर्मचारियों को बुलाने का निर्णय स्थानीय सफाई कर्मचारी संघ द्वारा लिया गया था, जिसके कारण जम्मू शहर में स्वच्छता संकट पैदा हो गया था।

तत्कालीन सत्ता ने उन्हें राज्य में पुनर्वास का वादा किया यह कहते हुए कि ‘स्थायी निवासी’ होने का प्रावधान उनके लिए आसानी से बना दिया जाएगा। लेकिन उन वादों को कभी पूरा नहीं किया गया और वाल्मीकि समुदाय दशकों तक भुगतते रहे।

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छह लंबे दशकों के लिए वाल्मीकियों ने कागज के एक टुकड़े को पाने के लिए संघर्ष किया है ताकि वे भी अपने सपनों को साकार करने की कोशिश में जुट सकें जैसे कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार होता है।

उनका लंबा इंतजार तब खत्म हुआ जब 18 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर की सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश में अधिवास प्रमाण पत्र जारी करने के नियमों को परिभाषित करते हुए अधिसूचना जारी की।

इतने वर्षों से समुदाय के सदस्य बाक़ी नागरिकों की तरह अलग-अलग नौकरियों के लिए अर्जी देना तो चाहते थे लेकिन स्थानीय कानून के मुताबिक उन्हें अयोग्य ठहरा दिया जाता था। स्थायी निवासी प्रमाण पत्र (पीआरसी) की अनुपलब्धता ने उनसे यह मौलिक अधिकार छीन लिया था। हर कदम पर उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता था। लेकिन जम्मू-कश्मीर में समय-समय पर आई सरकारों के हाथों प्रताड़ित होते हुए भी समुदाय ने इस अन्यायपूर्ण तंत्र के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।

“अब हम अपने आगे एक उज्ज्वल भविष्य देखते हैं। अब हम अपने सपनों को पूरा करने में सक्षम होंगे जो अनुच्छेद 370 के कारण संभव नहीं थे,” जम्मू में वाल्मीकि समुदाय के टॉमस ने कहा। स्नातक होते हुए भी वे आज तक केवल जमादार की नौकरी के लिए ही अर्जी दे सकते थे।

मीडिया से बात करते हुए टॉमस की भावना को समुदाय के अन्य सदस्यों ने दोहराया। उन्हें लगता है कि अधिवास प्रमाणपत्र उनके लिए एक ऐसा सपना रहा होगा जो पूरा नहीं हो सकता था जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भाजपा सरकार ने संसद में भेदभावपूर्ण धारा 370 को निरस्त नहीं किया था।

जब से संसद ने धारा 370 को निरस्त करने का निर्णय लिया, तब से वाल्मीकि समुदाय उस ऐतिहासिक निर्णय का जश्न मना रहा है। अधिवास प्रमाण पत्र देने से उनमें खुशी की एक लहर सी दौड़ गई है।

“यह हमारे लिए सही मायने में आज़ादी का प्रतीक है। हमें ऐसा लगता है जैसे गुलामी की बेड़ियों को आखिरकार तोड़ दिया गया है। अब हमें कचरे के ढेर को साफ नहीं करना पड़ेगा,” समुदाय के सदस्य एल भट्टी ने कहा।

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