फ़िल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की पुस्तक उनकी फ़िल्म बुद्ध इन द ट्रैफ़िक जाम के निर्माण के दौरान और निर्माण के उपरांत के संघर्ष के समय में उनके द्वारा जिए गए सत्य का उद्घाटन है।

साधारणतया एक सिने निर्माता या कलाकार के लिए कृति का निर्माण संघर्ष का अंत होता है।  इसके बाद कृति समाज की गोद में डाल दी जाती है जो उसका पोषण करती है, उसके बाल स्वरों का आनंद लेती है।  किन्तु हमारे मानव समाज ने ऐसे  अनेक अध्यायों को इतिहास में देखा है जिनमे उन विचारो को विकसित होने से पहले ध्वंस कर दिया जाता है जो शक्तिशाली व्यक्तियों के विचारो से मेल नहीं खाते।

लेखक पढ़े जाने के लिए लिखता है, चित्रकार देखे जाने के लिए चित्र उकेरता है और सिनेकार दर्शकों के लिए सिनेमा बनाता है और उसे रोकने वाले अक्सर वो व्यक्ति नहीं होते जिन्हें हम आम तौर पर शक्तिशाली समझते हैं। सीता को वनवास राजऋषि वशिष्ठ नहीं भेजते बल्कि एक धोबी भेजता है। बौद्धिकता और कला के क्षेत्र का भी सत्य यही है कि सत्ता सत्ताधारी के पास नहीं है। सत्ता किसी निरीह दिखने वाले प्राध्यापक के पास है, विश्वविद्यालय जिसका साम्राज्य है, किसी फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर के पास है, सिनेमाघर जिसका अधिकार क्षेत्र है, किसी सत्यवादी की भूमिका निभाते हुए पत्रकार के पास है जिसके पास श्वेतपत्र का राजदंड है। सदियों के बनाये स्टीरियोटाइप का झूठ लपेट कर ये तय करते हैं कि आम जनता क्या देखती है, पढ़ती है, सुनती है। इनको सामाजिक वैधता वो लोग प्रदान करते हैं जो असामाजिक गतिविधियों के कारण स्वयं अवैध हैं और सत्ता-च्युत हैं। ये सत्ता से बाहर हो कर समाज की डोर थामे हैं और समाज आँखों पे पट्टी बांधे चला जा रहा है।

इस पुस्तक में इसी गठजोड़ के, एक कलाकार को पालतू बनाने के प्रयासों के और एक कलाकार के अपने सत्य के प्रति समर्पण के सँघर्ष के वर्णन हैं। इसीलिए यह कहानी एक सिने कृति के बनाने के बाद की कहानी है। विवेक ने फिल्म बनाने का भी कष्ट लिखा है, किन्तु वह एक संघर्ष ऐसा है जो विचारधारा के संकट से इतर है।

Urban Naxals by Vivek Agnihotri [Paperback: Rs 707.00]

जो भाग इस पुस्तक को नया और पठनीय बनाता है वह कलाकार का कृतित्व के बाद का संघर्ष है। यह वो भाग है जहाँ प्रसिद्ध उपन्यास फाउंटेनहेड का हॉवर्ड रोअर्क अपने अलग-अलग एल्सवर्थ तूही से मिलता है। ये वह सत्य है जिसे महसूस सब करते हैं पर जिसे कहने का साहस कोई नहीं करता। जिस सत्य को स्टालिन और माओ राक्षस बन कर पराधीन न कर सके, उसे इन मृदु भाषी कुटिल लोगो ने देवत्व का आवरण धारण करवा के सर्कस का शेर बना दिया है।

सत्य सदा प्रकट नहीं होता है। सत्य बहुधा साँप की तरह केँचुल बदलता है और बिना किसी की जानकारी के अज्ञान की अँधेरी दरारों मे विष को लिए रेंगता रहता है। जब तक हमारा पाँव इस पर नहीं पड़ता, हम इसके अस्तित्व के बोध से वंचित रहते हैं, किंतु जिस दिन यह सर्प पलट कर फुँफकारता है, मृत्यु का नील सारे समाज को जीवनहीन कर देता है।

विवेक की पुस्तक अर्बन नक्सल्स ऐसे ही विषैले सर्प से स्वयं लेखक के साक्षात्कार की कथा है जिस पर जाने-अनजाने विवेक ने पाँव रख दिया और जिसके दंश को उन्होंने सोशल मीडिया पर, मेनस्ट्रीम मीडिया मे, अपने सिने जगत मे जिया। वामपंथ या नक्सल आँदोलन सिर्फ़ एक राजनैतिक विचारधारा नहीं है। भारत मे इसका जो रूप है, वह एक साम्राज्यवादी, औपनिवेशिक सोच है।

वामपंथ भारत में खादी ओढ़ कर चुनाव नहीं लड़ता; उसकी दृष्टि अगले लोकसभा चुनाव पर नहीं होती है। वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एंटी-थीसिस है। वामपंथ सत्ता मे नहीं आना चाहता है; वह इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं होना चाहता। वह इस व्यवस्था को पलटना चाहता है। जब वह व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है, तब वह राजनैतिक व्यवस्था के संदर्भ मे नहीं बोलता। वह एक सामाजिक, सांस्कृतिक अस्तित्व को उखाड़ फेंकने की बात करता है। जैसा हम इस कहानी मे देखते हैं, यही कारण है कि यह अतिवादी समाजवाद राजनैतिक सीमाओं से परे विश्वविद्यालयों मे, टी वी स्टूडियो मे, गोष्ठियो मे, वार्ताओं मे, कला दीर्घाओं में, फ़िल्म फ्रेटरनिटी मे पनपता है। उसकी लोकतंत्र मे रुचि नहीं है। वह भीड़ तंत्र के भैंसे पर सवार होकर आता है और अपने पीछे मृत्यु और दुख का स्वर छोड़ जाता है।

लोकतंत्र संख्या का खेल है भी और नहीं भी। सार्वजनिक नैतिकता और मर्यादा लोकतंत्र को भीड़तंत्र से भिन्न करती है। वामपंथ भीड़ के व्यक्ति पर शासन का पैरोकार है। इसमें लोक मर्यादा का स्थान नहीं है। जब यह जन-अदालत मे एक मुसलमान व्यक्ति को झारखंड मे इसलिए मार देता है क्योंकि उसने मनरेगा मे व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रश्न उठाया तो इसकी आँखों से एक आँसू नहीं गिरता। बौद्धिक वामपंथ इसकी प्रदर्शित क्रूरता पर आधुनिक थ्योरीयों और ऐतिहासिक असत्यता की चिप्पियाँ लगा कर ढाँप देता है। जो अभिव्यक्ति की विचारधारा की डफली हर उपलब्ध चौराहे पर बजाते है, वह अपने प्रांगणों मे विरोधी विचारधारा को बर्दाश्त नहीं करते।

लेखक भूमिगत नक्सल आतंक और उसे उपलब्ध उद्घाटित बौद्धिक समर्थन पर बनी फ़िल्म के परिपेक्ष्य मे अपने संघर्ष को यहाँ हमारे साथ बाँटता है; छुपे हुए सर्प को उद्घाटित करता है। जैसे-जैसे विवेक फिल्म प्रदर्शन के जेएनयू से आई आई टी से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से जाधवपुर यूनिवर्सिटी जाते हैं, हम एक सधे हुए स्क्रिप्टेड नैरेटिव द्वारा विरोध की कथा पढ़ते हैं और प्याज की परतों की तरह दशकों में तैयार की हुई सामाजिक साजिश उधड़ती जाती है।

कुछ प्रसंग बड़े रुचिकर हैं, मसलन उस्मानिया यूनिवर्सिटी जहाँ से हैदराबाद में नक्सल आंदोलन में छात्रों को खींचने की शुरुआत हुई थी, वहाँ फिल्म का स्वागत होता है। संभव है, न सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर, वरन संस्थागत स्तर पर भी आयु के साथ खोखली विचारधाराएँ ज़मीन खो देतीं हैं।

किंतु यह राजनैतिक पुस्तक नहीं है, अन्यथा यह अपठनीय प्रचार-पत्र बन जाता। यह आत्मकथा भी नहीं है। हम लेखक के मन तक जाते हैं, जीवन तक नहीं। जाते भी हैं तो पूर्णतया नहीं। हम लेखक के व्यावहारिक और वैचारिक संघर्ष को देखते है, किन्तु विषय से परे उस संघर्ष की काली परछाईं पर बहुत ज्यादा नहीं जाते; हमारा सरोकार विषय के गिर्द घूमता है। इसलिए यह पॉल एस्टर की साहित्यिक आत्मकथा भी नहीं है।

कहानी बुद्धा इन ट्रैफ़िक जाम और उसके परिपेक्ष्य से बहुत दूर नहीं भागती, सन्दर्भ के दायरे में रहती है और यही विवेक की एक लेखक के तौर पर सफलता है। भाषा बहुत ही गतिशील एवम् पठनीय है। पक्तियाँ सीमित, सतर्क और सच्ची हैं, जैसे कोई शांत रात्रि मे डायरी मे लिख रहा हो, और शब्द भावनाओं की निश्चितता के साथ पन्ने पर उतर रहे हों। कहीं-कहीं पर आपको मेज़ पर पेंसिल की ठक-ठक भी सुनाई पड़ेगी और कहीं समाज की अंधेरी दरारों मे सरकते हुए सर्प की सरसराहट भी। पक्तियाँ उद्धेश्यपूर्ण हैं, शब्द व्याकुल एवं व्यग्र।

विवेक को सच्चे लेखन के लिये बधाई। अवश्य पढ़ें, अगर हम समय पर समझ सके तो भविष्य को एक छुपे हुए विनाश की संभावना के सर्प-दंश से हम बचा सकेंगे।

साकेत सूर्येश