Monday 25 October 2021
- Advertisement -
HomePoliticsIndiaकेंद्र सरकार ने किसान नेताओं के पाले में डाली गेंद

केंद्र सरकार ने किसान नेताओं के पाले में डाली गेंद

केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से 10वें दौर की वार्ता में तीनों कृषि कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव भी रखा लेकिन प्रदर्शनकारी किसान इन कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर अड़े रहे

|

तीनों कृषि क़ानूनों के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने 20 जनवरी को नई रणनीति अपनाई। सरकार ने डेढ़ साल तक क़ानूनों को स्थगित रखने का प्रस्ताव देते हुए किसान नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब किसान नेताओं ने 21 जनवरी को बैठक कर सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करने की बात कही है। 22 जनवरी को फिर होने वाली बैठक में किसान नेता केंद्र सरकार के निर्णय पर अपना रुख़ स्पष्ट करेंगे।

अगर सरकार की तरफ़ किसान नेताओं ने भी रुख में नरमी लाते हुए केंद्र के निर्णय को स्वीकार किया तो किसान आंदोलन अगली बैठक में ख़त्म हो सकता है। गृहमंत्री के घर रणनीति विज्ञान भवन में 20 जनवरी को ढाई बजे से बैठक शुरू होने से पहले केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने गृहमंत्री अमित शाह के घर जाकर मीटिंग की। गृहमंत्री के घर पर दसवें दौर की बैठक को लेकर विशेष रणनीति बनी। इस दौरान सरकार की ओर से नई पेशकश का निर्णय हुआ।

मंत्रियों के बीच तय हुआ कि 26 जनवरी से पहले किसान आंदोलन को समाप्त करवाने का यही एकमात्र रास्ता है कि किसानों के सामने क़ानूनों को कम से कम एक से डेढ़ साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव दिया जाए और इस बीच दोनों पक्षों की बातचीत चलती रहे। गृहमंत्री से चर्चा के बाद विज्ञान भवन पहुँचे कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने यही प्रस्ताव किसान नेताओं के सामने रखा। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बैठक में किसान नेताओं से कहा कि कृषि सुधार क़ानूनों को एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित किया जा सकता है।

लगभग साढ़े पाँच घंटे चली 10वें दौर की वार्ता के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार ने एक से डेढ़ साल तक इन कृषि क़ानूनों को निलंबित करने का प्रस्ताव किसानों समक्ष रखा ताकि इस दौरान सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिध आपस में चर्चा जारी रख सकें और दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसान इस कड़ाके की ठंड में अपने घरों को लौट सकें। उन्होंने कहा, ‘‘जिस दिन किसानों का आंदोलन समाप्त होगा, वह भारतीय लोकतंत्र के लिये जीत होगी।’’

कृषि क़ानूनों के अमल पर उच्चतम न्यायालय ने अगले आदेश तक पहले ही रोक लगा रखी है। शीर्ष अदालत ने भी एक समिति गठित की है। तोमर ने 22 जनवरी को होने वाली अगली बैठक में किसानों का विरोध प्रदर्शन समाप्त करने की सहमति तैयार होने को लेकर उम्मीद जताई। उन्होंने कहा, ‘‘सरकार की तरफ़ से यह प्रस्ताव दिया गया कि कृषि सुधार क़ानूनों के क्रियान्वयन को एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित किया जा सकता है। इस दौरान किसान संगठन और सरकार के प्रतिनिधि किसान आन्दोलन के मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श करके उचित समाधान पर पहुँच सकते हैं।’’ सरकार और लगभग 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच 10वें दौर की वार्ता के बाद किसान नेताओं ने कहा कि अगली बैठक 22 जनवरी को तय की गई है। 21 जनवरी को किसान संगठन अपनी आंतरिक बैठक करेंगे।

भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा, ‘‘सरकार ने कृषि क़ानूनों को डेढ़ साल तक के लिए निलंबित रखने का प्रस्ताव रखा। हमने इसे ख़ारिज कर दिया लेकिन यह प्रस्ताव चूंकि सरकार की तरफ से आया है, हम कल इस पर आपस में चर्चा करेंगे और फिर अपनी राय बतायेंगे।’’ एक अन्य किसान नेता कविता कुरूगंती ने कहा कि सरकार ने तीनों क़ानूनों को आपसी सहमति से निर्धारित समय तक निलंबित करने और समिति गठित करने के सिलसिले में उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक हलफ़नामा देने का प्रस्ताव भी रखा। जमूरी किसान सभा के कुलवंत सिंह संधू ने कहा, ‘‘सरकार बैकफ़ुट पर है और वह झुकने के लिए आधार बना रही है।’’

केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से 10वें दौर की वार्ता में तीनों कृषि क़ानूनों में संशोधन का प्रस्ताव भी रखा लेकिन प्रदर्शनकारी किसान इन क़ानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर अड़े रहे। किसान नेताओं ने कहा कि वे तीनों क़ानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर क़ायम हैं लेकिन वे सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करेंगे और अपनी राय से अगली बैठक में वे सरकार को अवगत कराएंगे। किसानों ने यह आरोप लगाया कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानूनी गारंटी देने पर चर्चा टाल रही है।

Sirf News needs to recruit journalists in large numbers to increase the volume of its reports and articles to at least 100 a day, which will make us mainstream, which is necessary to challenge the anti-India discourse by established media houses. Besides there are monthly liabilities like the subscription fees of news agencies, the cost of a dedicated server, office maintenance, marketing expenses, etc. Donation is our only source of income. Please serve the cause of the nation by donating generously.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

- Advertisment -

Now

Columns

[prisna-google-website-translator]