समान नागरिक संहिता लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य

उसी प्रकार क्या सामाजिक स्थिति और आर्थिक व्यवस्था में एक समान अधिकार नहीं प्रदान किया जानाा चाहिए

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भारत सरकार द्वारा गठित विधि आयोग का कार्यकाल समाप्ति की ओर है। भारतीय संविधान में जो निर्देश दिये गये हैं, उनके अनुरूप विधिक व्यवस्था में दिखाई पड़ने वाली विसंगतियों के सन्दर्भ में सुझाव देने के लिए इस आयोग का गठन किया गया था। समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी विसंगतियों को दूर करने के लिए सरकार से कानून बनाने की अपेक्षा की है। इनमें एक अपेक्षा समान नागरिक संहिता बनाने की है। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान में प्रदत्त नागरिक समानता के अधिकार के अनुरूप समान नागरिक संहिता बनाने की अपेक्षा की है। मोदी सरकार के पूर्व किसी सरकार ने इस निर्देश का सम्यक संज्ञान नहीं लिया। क्योंकि नागरिक संहिता बनाने में विधिक राय की आवश्यकता होती है। इसलिए सरकार ने इस पर विचार करने के लिए विधि आयोग को संदर्भित कर दिया था। आयोग ने विभिन्न राजनैतिक दलों, सामाजिक संगठनों, जिसमें इस्लाम और ईसाई मतावलम्बी संगठन भी शामिल हैं को अभिमत प्रकट करने के लिए आमंत्रित किया। राजनीतिक दलों ने संभवतः बीजेपी को छोड़कर अन्य किसी राजनैतिक दल ने इस महत्वपूर्ण मसले पर अपना अभिमत प्रकट करने की आवश्यकता नहीं समझी। बीजेपी ने समान नागरिक संहिता बनाने के पक्ष में अपना अभिमत प्रकट किया है। आयोग ने एक बार फिर मुस्लनों से पूछा है कि इस संदर्भ में उनकी क्या राय है?

समान नागरिक संहिता के संवैधानिक उद्देश्य का अल्पसंख्यकों की धार्मिक निष्ठा को संरक्षण देने की संवैधानिक प्रावधान का सहारा लेकर मुस्लिम संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। जिसके कारण मुस्लिम समाज की महिलाओं को सम्पत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य इसी प्रकार के मामलों में पुरूषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों तीन तलाक को गैर कानूनी घोषित करते हुए भारत सरकार को इस संदर्भ में कागजी प्रावधान करने का जो निर्देश दिया उसके अनुरूप बनाया गया विधेयक राज्यसभा की विशेष समिति में लंबित है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन तलाक संबंधी निर्णय का स्वागत यद्यपि देश के सभी राजनैतिक दलों ने किया, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते इसके कानूनी प्रावधान को बाधित कर रखा है। संविधान द्वारा निर्देशित समान नागरिक संहिता के अनुरूप कानून बनाने की मांग सबसे पहले समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया और उसी पार्टी के हामिद दलवई ने उठाया था।

1967 चुनाव के पूर्व जब डॉ. लोहिया ने समान नागरिक संहिता का मुद्दा उभारा तब उनकी पार्टी के मुस्लिम चेहरा इशहाक इल्मी जो कि एक बड़े प्रभावी उर्दू अखबार के संपादक भी थे, उनसे अलग हो गये। लेकिन बाद के दिनों में उसी परिवार के दामाद आरिफ मोहम्मद खान, जो अलीगढ़ मुस्लिम छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे और राजीव गांधी मंत्रिमंडल में सदस्य थे, ने शाहबानो के मसले को लेकर समान नागरिक संहिता के मुद्दे को उभारा था। कट्टरपंथियों के दबाव में राजीव गांधी, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुरूप कानून बनाने के पक्ष में थे, पलटी मार गये। आरिफ मोहम्मद ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। आज उसी परिवार की एक बेटी शाजिया इल्मी मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के लिए मुहिम चला रही महिलाओं के साथ अग्रिम पंक्ति में खड़ी हैं। शाहबानो से लेकर शायरा बानो मामले की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिये हैं, उससे मुस्लिम महिलाओं को बहुत राहत मिली है। लेकिन राजनीति के चलते उसे लागू करने के लिए कानूनी प्राविधान को बाधित करने में जहां पुरातनपंथी मुस्लिम संगठन अडंगा डाल रहे हैं, वहीं वोट बैंक की राजनीति के कारण राजनीतिक दल आवश्यक सहयोग नहीं दे रहे हैं। प्रत्येक समाज में कतिपय चलन परिस्थितिवश शुरू हो जाते हैं, लेकिन परिस्थितियों के बदलने के साथ उनका लोप भी हो जाता है। यथा हिन्दूू समाज में सती, विधवा के सिर मुड़ाने, बाल विवाह आदि का चलन मुस्लिम शासनकाल में सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर हुआ था, लेकिन इनको सुधारने की कोशिश निरन्तर होती रही और स्वतंत्र देश में इस चलन पर लगाये गये कानूनी प्राविधान को समाज ने सहज स्वीकार कर लिया।

हिन्दू पुरूष और महिलाओं में संपत्ति के मामले में किसी प्रकार का भेद नहीं है। लेकिन मुस्लिम समुदाय में इस्लाम के अभ्युदय केन्द्र अरब देशों में जो जनजातीय परम्पराओं के अनुरूप स्त्री पुरूष की स्थिति में भेदमूलक प्रावधान किये गये थे, उनको कायम रखने की प्रवृत्ति आज भी हावी है। यद्यपि जहां से इस प्रवृत्ति का उद्गम हुआ, वहां उन्होंने उन प्रवृत्तियों को क्रमशः छोड़ दिया है। भारतीय महिलाएं अब फाइटर प्लेन चला रही हैं। एवरेस्ट पर तिरंगा फहरा रहीं हैं। समुद्र की छोटी नौका से साहसिक यात्रा कर रही हैं। सेना और प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों को संभाल रही हैं। आर्थिक संस्थानों बैंक आदि की अध्यक्ष भी हैं। राज्यों की मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक का पद संभाल रही हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की अध्यक्ष, देश की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर चुकी हैं और कर रही हैं। खेल के मैदान में पुरूषों से आगे बढ़ रही हैं। अपवाद स्वरूप एक दो नाम छोड़कर जैसे महबूबा मुफ्ती और सानिया मिर्जा किसी भी मुस्लिम महिला का इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान नहीं है। इसका क्या कारण हैं? क्या मुस्लिम संगठनों ने इस पर विचार किया है कि मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू महिलाओं के समान सामाजिक और आर्थिक अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। परम्परा के नाम पर भेदमूलक चलन को चिपकाये रहना कहां तक उचित है। विधि आयोग ने यही प्रश्न मुस्लिम संगठनों के सामने प्रस्तुत किया है। क्या जिस देश में राष्ट्रपति से लेकर सुदूर वनीय पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बिना जाति सम्प्रदाय क्षेत्र भाषा वेशभूूषा खानपान और लिंगभेद में एक समान मताधिकार प्रदान किया है। उसी प्रकार क्या सामाजिक स्थिति और आर्थिक व्यवस्था में एक समान अधिकार नहीं प्रदान किया जानाा चाहिए। समान नागरिक संहिता संविधान के निर्देशों और सर्वोच्च न्यायालय के मूल्यों के अनुरूप उसी समानता को स्थापित करने का प्रावधान है। जिसे मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने के उल्लेख का सहारा लेकर पुरातनपंथियों के शिकंजे से समाज की मुक्ति के प्रयास को असफल बनाने में लगे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि हिन्दू समाज में जो कुरीतियां हैं, उनको दूर करने के प्रयासों का पुरातनपंथियों द्वारा विरोध नहीं किया गया है, लेकिन समाज में सुधारवादी प्रयासों को सदैव स्वीकार किया गया है। जिसके कारण महिलाएं आज सभी क्षेत्रों में पुरूष से समानता के साथ खड़ी हैं।

तीन तलाक के मसले को लेकर मुस्लिम महिलाओं में जो जागरूकता आयी है, उसके अनुरूप कानून बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश में जो बाधाएं डाली जा रही हैं, वे अधिक दिन तक कायम नहीं रह सकेंगी। लेकिन समान नागरिक संहिता के मसले को लेकर मुस्लिम और इसाई संगठनों के पुरातनपंथी वर्ग द्वारा अपने समुदाय के साथ-साथ दलित और आदिवासी समुदाय में भय का माहौल बनाने का जो प्रयास किया है उसका संज्ञान लेना भी आवश्यक है। ‘एक देश, एक जन, एक कानून’- यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है, जिसे अभी केवल मताधिकार के रूप में स्थान प्राप्त हो सका है। एक देश एक जन की मान्यता के अनुरूप लोकतंत्र में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की मान्यता के लिए कोई स्थान नहीं है। संरक्षण उन्हें अवश्य मिलना चाहिए, जो पिछड़ रहे हैं, लेकिन इसका आधार यदि क्षेत्र और समुदाय अथवा मजहब को बनाया जाता है तो वह लोकतंत्र की ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की मान्यता के विपरीत होगा। इससे भेदभाव बढ़ेगा और बढ़ रहा है उससे उत्पन्न कटुता लोकतंत्र की नींव खोखली करने के लिए वोटबैंक खड़ा करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर रही है, जो कुटुम्बवाद और भ्रष्टाचार के दानव के रूप में अपना प्रसार करती जा रही है। भारत और भारतीय लोकतंत्र और उसके अनुरूप बनाये गये संविधान के अनुरूप व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए। इससे भेदमूलक प्रवृत्तियों का शमन हो सकेगा।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/राजनाथ सिंह ''सूर्य''
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