#MeToo की चीख़ों के बाज़ार में ख़ामोशी का एक खोटा सिक्का हमारी तरफ़ से भी।

बम्बई के मीरा रोड इलाक़े के सस्ते 1BHK फ्लैट में 3 और लड़कियों के साथ साँझे में रह कर, कैसी भी फ़िल्मों में कैसा भी रोल, कोई भी क़ीमत चुका कर पा जाने के लिए स्ट्रगल करती लड़की का तब भी एक #MeToo होता है, #MeToo याने ‘मुझे भी’ (मौक़ा चाहिए, बस एक मौक़ा)। लेकिन यह वाला #MeToo भूत-प्रेत के क़िस्से की तरह होता है ― इसकी सच्चाई में यक़ीन जता कर अपनी ‘प्रगतिशीलता’ और ‘संवेदनशीलता’ के स्कोर में कोई कटौती नहीं करवाना चाहता।

वही लड़की, सालों बाद, अपने उस ‘बस एक मौक़े’ की दी हुई सीढ़ियाँ क़ायदे से चढ़ कर जुहू या बान्द्रा के एक पॉश पैंटहाउस फ्लैट तक पहुँचने के बाद, एक दूसरा #MeToo बोलती है, जो सालों पहले ख़ुद उसके द्वारा ही बोले गए #MeToo के उलट होता है। यह वाला #MeToo याने ‘मेरे साथ भी’ दरअसल ‘ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जताई जा रही गम्भीर चिंता’ जैसा होता है, जिसके बारे में कुछ भी देखे-जाने-जाँचे-परखे बिना हर व्यक्ति इसके विशेषज्ञ की पट्टी अपने दरवाज़े पर चिपकाना चाहता है ― क्योंकि मुफ़्त में ‘प्रगतिशील’ और ‘संवेदनशील’ कहलाने का इससे ज़्यादा असरदार और कारगर नुस्ख़ा और कोई नहीं।

लेकिन पहले वाले #MeToo में और दूसरे वाले #MeToo में इतना फ़र्क़ क्यों है, कोई नहीं बताना चाहता।

अब बात तनुश्री और कंगना की, लेकिन पहले कंगना की। कंगना फ़िल्म इंडस्ट्री में बिना किसी जान-पहचान के आईं, और चूँकि यहाँ ऐसे काम मिलता नहीं किसी को, तो उन्होंने अपने गॉडफ़ादर बतौर चुना आदित्य पंचोली को, जो यूँ भी उनके फ़ादर की ही उम्र के थे। कंगना आदित्य के घर किस हैसियत से दो साल तक रहीं वही जानें, लेकिन आदित्य पंचोली की जो छवि रही है इंडस्ट्री में, यह मानना काफ़ी कठिन है कि उन्होंने अपना कोई हित सधे बिना कंगना का इतना साथ दिया होगा दो साल तक ― जिसमें उन्हें सीधे महेश भट्ट से मिलवाना भी शामिल है. अब महेश भट्ट अपनी फ़िल्मों में नई लड़कियों को किन आधारों पर मौक़ा देने के लिए जाने जाते रहे हैं, इस पर हम बात नहीं करेंगे क्यूँकि महेश ख़ुद ही इस बारे में सब कुछ खुल कर कह देते रहे हैं।

ख़ैर, दो साल तक आदित्य पंचोली के घर में टिकने के बाद गैंगस्टर में रोल मिलने के बाद कंगना ने सबसे खुल कर कहा कि आदित्य पंचोली उनका शारीरिक शोषण करना चाहते हैं, उन्हें जान से मारने की धमकी देते हैं, और वहाँ से चली गईं।

मेरा छोटा सा सवाल है एक, जिसका जवाब नहीं मिलता कहीं। उन दो सालों तक आदित्य पंचोली के घर में उनकी पत्नी याने ज़रीना वहाब और बेटी याने सना पंचोली नाम की दो औरतें और भी पल-पल लगातार मौजूद थीं; जब बिना किसी रिश्ते या हैसियत के, यहाँ तक कि बतौर एक पेइंग गेस्ट बुनियादी किराया तक चुकाए बिना कंगना पूरे दो साल तक जमी रहीं ― उसी घर की रोटियां तोड़ते हुए, और आदित्य पंचोली की ‘ख़ास दोस्ती’ का केन्द्र बनते हुए।

आज #MeToo के चूल्हे पर स्त्रियों की सहानुभूति की रोटियां सेंक कर स्त्रीवाद का झंडा बुलंद करने वाले किसी भी विमर्शकारी, क्रांतिकारी, आंदोलनकारी की आँखों में क्या कभी इतनी शर्म रही कि एक बार भी ज़रीना वहाब या सना पंचोली के #MeToo पर नज़र डालते?

संयोग की बात है कि इस #MeToo महाक्रांति की दूसरी धुरी, याने तनुश्री दत्ता ने जिस फ़िल्म आशिक़ बनाया आपने से ही फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था, उस फ़िल्म के शीर्षक गीत में तनुश्री दत्ता से जितना अंग प्रदर्शन करवाया गया था (यह हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के उन बेहद गिने-चुने गीतों में से है जिसमें नायिका पूरी तरह टॉपलेस याने अर्धनग्न अवस्था में है) उतना शायद ही किसी और नवोदित नायिका से करवाया गया हो ― तनुश्री की असहजता उस गीत में उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती है और उस वक़्त इंडस्ट्री में यह चर्चा आम था कि तनुश्री को सहजता देने के लिए इस गीत की शूटिंग के वक़्त सेट से सिर्फ़ डायरेक्टर, कोरियोग्राफर और सिनेमैटोग्राफर के अतिरिक्त सभी लोगों को बाहर कर दिया गया था।

क्या तब तनुश्री को एक बार भी महसूस नहीं हुआ कि उन्हें #MeToo कह कर उनके जिस्म के इस घिनौने इस्तेमाल का विरोध करना चाहिए था? जवाब साफ़ है, तनुश्री तब भी #MeToo कह रही थीं ― बस कि उस वक़्त उन्हें किसी भी क़ीमत पर फ़िल्म इंडस्ट्री में घुसना था, इसलिए वह पहली श्रेणी का #MeToo, याने ‘मुझे भी’ (मौक़ा चाहिए, बस एक मौक़ा) था। दूसरी श्रेणी का #MeToo याने ‘मेरे साथ भी’ कहने का वक़्त तनुश्री दत्ता के पास भी अब ही आया है, जब उनके करियर और उम्र का कारवां गुज़र चुका है, और उसके गुज़रने से उठा ग़ुबार देखने के अलावा वे कुछ और कर सकती हैं तो वह कुछ दिनों के लिए ही सही, एक और ग़ुबार खड़ा करना है, जो वे ठीक-ठाक हद तक करने में सफल भी रही हैं।