इसी साल के अंत में चार राज्यों के विधानसभा और 2019 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए चुनावी दांव की पृष्‍ठभूमि बनानी शुरू कर दी है। कैराना लोकसभा उपचुनाव के दौरान बागपत की आमसभा में मोदी ने कहा था कि अन्य पिछड़ा वर्ग के अंदर अति पिछड़ा वर्ग (एमबीएस) के लोगों को एक विशेष आरक्षण कोटा उपश्रेणी बनाकर देने की तैयारी की जा रही है। दरअसल सरकार चाहती है कि पिछड़ी जातियों के बिखरे और अति पिछड़े वर्ग को भी आरक्षण नीतियों का ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले। इसी मकसद की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की कवायद को खूब प्रचारित किया गया। इस नए आयोग का नाम सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग राष्‍ट्रीय आयोग (एनएसईबीसी) होगा। दरअसल इस आयोग के जरिए बीजेपी की मंशा समाजवादी पार्टी और बीएसपी के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपना वोट बैंक बढ़ाना है।

पिछड़े और अतितियों के बीच विभाजन कैसे हो, इस पर केंद्र सरकार लगातार काम कर रही है। दरअसल इस कवायद को मोदी के सामने नीतीश कुमार द्वारा बिहार में अपनाई गई सामाजिक न्याय बनाम आरक्षण की वह नीति हैं, जिसके जरिए पिछड़ों के आरक्षण का 27 प्रतिशत कोटा बढ़ाए बिना ही पिछड़ा वर्ग की सूची में 79 जातियों से बढ़ाकर 112 जातियां कर दी गई थीं। नीतीश कुमार ने यही खेल दलित और महादलित जातियों के बीच विभाजन करके खेला था। जिसमें वे सफल भी रहे। हालांकि पिछड़ों को लुभाने का काम मोदी सरकार निरंतर कर रही हैं। इसी सिलसिले में पिछड़ों में क्रीमीलेयर की आमदनी का दायरा 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख कर दिया गया है। इसी तरह पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की मंजूरी में भी चुनावी लाभ की मंशा निहित है। वैसे ओबीसी की सूची के उपवर्गीकरण की बात कोई नई नहीं है।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अति पिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है। अगर कोई सरकार ऐसा करना चाहती है तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है। देश के नौ राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुडुचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम-बंगाल, बिहार, महाराष्‍ट्र और तमिलनाडू में अन्य पिछड़ा वर्ग का उपवर्गीकरण पहले ही किया जा चुका है। लेकिन ओबीसी या एससी, एसटी का जो निर्धारित कोटा है, उसमें बढ़ोतरी संविधान में संशोधन के बिना नहीं की जा सकती है। बावजूद राज्य सरकारें इस कवायद में लगी रहती हैं। हालांकि आयोग को जब संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा तब पिछड़ा वर्ग सूची में किसी नई जाति को जोड़ने या हटाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास नहीं रह जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का प्रावधान है। इसमें शर्त है कि यह साबित किया जाए कि दूसरों के मुकाबले इन दोनों पैमानों पर पिछड़े हैं, क्योंकि बीते वक्त में उनके साथ अन्याय हुआ है, यह मानते हुए उसकी भरपाई के तौर पर आरक्षण दिया जा सकता है।

राज्य का पिछड़ा वर्ग आयोग राज्य में रहने वाले अलग-अलग वर्गों की सामाजिक स्थिति का ब्योरा रखता है। वह इसी आधार पर अपनी सिफारिशें देता है। अगर मामला पूरे देश का है तो राष्‍ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी सिफारिशें देता है। देश में कुछ जातियों को किसी राज्य में आरक्षण मिला है तो किसी दूसरे राज्य में नही मिला है। मंडल आयोग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी साफ कर दिया था कि अलग-अलग राज्यों में हालात अलग-अलग हो सकते हैं। वैसे देश के जाट, गुर्जर, पटेल और कापू ऐसे आर्थिक व शैक्षिक रूप से सक्षम और राजनीतिक पहुंच वाले लोग हैं,जिन्हें आरक्षण दिए जाने की कोई लाचारी प्रत्यक्ष तौर से दिखाई नहीं देती है। बावजूद ये जातियां अपने को पिछड़ों की सूची में शामिल कराने में उतावली हैं, तो इसका एक ही कारण है कि सरकारी नौकरियों से जुड़ी प्रतिष्‍ठा और आर्थिक सुरक्षा। जबकि पिछड़ी जातियों की अनुसूची में जाटों को शामिल करने की केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट 17 मार्च 2015 को खारिज कर चुकी है। अदालत ने इस सिलसिले में स्पष्‍ट रूप से कहा है कि पुराने आंकड़ों के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

अदालत ने जाटों को आरक्षण पर राष्‍ट्रीय पिछड़ा वर्ग अायोग की नसीहत नकारने के सरकार के फैसले को भी अनुचित ठहराया था। अदालत ने कहा था कि इस परिप्रेक्ष्य में आयोग की सलाह आधारहीन नहीं है, क्योंकि आयोग एक विधायी संस्था है। आयोग ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में भरतपुर व धौलपुर के जाटों को केंद्र की ओबीसी की सूची में शामिल करने से मना कर दिया था। कारण ये जातियां पिछड़ी नहीं रह गईं हैं, इसलिए पिछड़े होने के मानक पूरे नहीं करती हैं। लेकिन केंद्र ने रिपोर्ट पर यह आरोप मढ़कर नजरअंदाज कर दिया था कि आयोग ने जमीनी हकीकत पर विचार नहीं किया। साफ है, जब तक जाट या आरक्षण की प्रतिक्षा में खड़े अन्य दबंग व सक्षम समुदाय सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से पिछड़े घोषित नहीं कर दिए जाते, तब तक किसी भी वादे या विधेयक पर अमल की उम्मीद संभव नहीं है ? अब मोदी सरकार एक ऐसी सोशल इंजीनियरिंग की रचना करने की तैयारी में है, जिसके भीतर ही एक जाति के वर्चस्व को दूसरी जाति चुनौति देकर अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति करे। यदि मोदी सरकार अपनी इस कवायद में कामयाब हो जाती है तो उत्तर-प्रदेश व अन्य राज्यों में समाजवादी पार्टी और बीएसपी जिस गठबंधन की तैयारी में हैं, उसके कोई मायने नहीं रह जाएंगे।

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