जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के आग्रह पर केंद्र सरकार ने रमजान के पवित्र महीने के दौरान आतंकियों के खिलाफ अभियान नहीं चलाने का ऐलान किया है। ऐसा करके केंद्र सरकार ने महबूबा मुफ्ती को तो जरूर खुश कर दिया है, लेकिन केंद्र का यह कदम आगे चलकर आतंकवादियों की गतिविधियों इजाफा के रूप में भी सामने आ सकता है। ऑपरेशन ऑल आउट के तहत सुरक्षाबल के जवान लंबे समय से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रहे हैं। इसका परिणाम कई दुर्दांत आतंकवादियों के मारे जाने के रूप में भी सामने आया है। खासकर बुरहान वानी के 11 पोस्टर बॉय समझे जाने वाले आतंकियों का सफाया इसी ऑपरेशन के तहत हुआ है। अब केंद्र सरकार की घोषणा के अनुरूप सुरक्षाबल के जवान अपनी ओर से आतंकवादियों के खिलाफ स्वतःस्फूर्त कार्रवाई नहीं करेंगे, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या आतंकवादियों पर सरकार की इस पहल का कोई असर होगा। संघर्ष विराम की इस घोषणा का जवाब उसी दिन आतंकियों की ओर से तब मिला, जब आतंकवादियों ने दक्षिण कश्मीर में दो स्थानों पर सेना पर हमले किए। पहली घटना शोपियां के जामनगरी गांव में हुई, जब तलाशी अभियान चला रहे सेना के जवानों पर आतंकवादियों ने गोलीबारी कर दी। सेना की जवाबी कार्रवाई के बाद आतंकवादी वहां से भाग निकले। इसी तरह त्राल के शिकारगढ़ जंगल में आतंकवादियों ने 42 राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों पर गोलियां चलाई। इन दोनों ही घटनाओं में न तो कोई जवान और ना ही कोई आतंकवादी हताहत हुआ। उसी दिन कश्मीर विश्वविद्यालय के पास ड्यूटी पर तैनात एक पुलिसकर्मी से एक आतंकवादी राइफल छीन कर फरार हो गया।

केंद्र सरकार की संघर्ष विराम की इस पहल का भविष्य क्या होगा इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी और अलगाववादी संगठन इसे केंद्र सरकार का ड्रामा बता रहे हैं। लश्कर-ए-तोएबा के प्रवक्ता अब्दुल्ला गजनवी ने तो साफ कर दिया है कि संघर्ष विराम के लिए उनकी डिक्शनरी में कोई जगह नहीं है। इसी तरह ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस ने भी इसे केंद्र सरकार की ओर से किया गया मजाक करार दिया है। साफ है कि इनलोगों पर केंद्र की इस पहल का कोई असर होने वाला नहीं है। सच्चाई तो यह है कि केंद्र सरकार का यह फैसला एक जोखिम भरा फैसला है। अभी तक सेना के जवान किसी भी स्थान पर आतंकवादियों के छिपे होने की जानकारी मिलते ही वहां पहुंच कर कार्रवाई शुरु कर देते थे। लेकिन, अब सुरक्षाबल के जवान तबतक कोई कार्रवाई नहीं करेंगे, जबतक कि उनके ऊपर हमला ना हो।

केंद्र सरकार का कहना है कि मुस्लिम समाज के लोगों को रमजान के दौरान शांति-व्यवस्था में सहयोग देने के लिए घाटी में सुरक्षा बल को कोई नया अभियान शुरू नहीं करने का निर्देश दिया गया है। स्पष्ट है कि जब सेना अपनी ओर से कोई अभियान नहीं चलाएगी, तो आतंकवादियों की धरपकड़ का काम भी रुक जाएगा और इस तरह से उन्हें अपनी बिखरी हुई ताकत को दोबारा जुटाने का मौका मिल जायेगा। इसके पहले वाजपेयी सरकार के समय भी रमजान के महीने में सुरक्षाबलों को इसी तरह अभियान चलाने से रोका गया था। तब उम्मीद की गई थी कि संघर्ष विराम से आतंकवादियों तथा अलगाववादी संगठनों को बातचीत के लिए तैयार किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका। आतंकियों की गतिविधियां चलती रही और अंत में केंद्र को मजबूर होकर संघर्ष विराम वापस लेना पड़ा। इसलिए केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि संघर्ष विराम की इस अवधि का उपयोग आतंकवादी अपनी ताकत बढ़ाने में न कर सकें, क्योंकि अगर आतंकवादियों को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिल गया तो आने वाले दिनों में यह आम नागरिकों के साथ ही सुरक्षाबलों के लिए भी सिरदर्द साबित होगा। यह ठीक है कि केंद्र के इस फैसले का राज्य में सरकार और विपक्ष दोनों ने स्वागत किया है, लेकिन यह कारगर तभी हो सकता है जब वहां के तमाम संगठन भी इसको लेकर एकमत हों। सवाल यह भी है कि क्या केंद्र की ओर से घोषित संघर्षविराम के दौरान राज्य सरकार उन पत्थरबाजों पर काबू कर पाएगी, जो हमेशा ही आतंकियों के मददगार और सुरक्षाबल के लिए सिरदर्द बने रहते हैं।

केंद्र सरकार को इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अगर संघर्ष विराम का उद्देश्य पूरा न हो सके, तो उसका अगला कदम पहले से भी कठोर होगा। घाटी की स्थिति सुधारने के लिए इसके पहले पत्थरबाजों को आम माफी देने का रास्ता अपनाया जा चुका है। वार्ताकार की भी नियुक्ति की जा चुकी है। लेकिन सच्चाई यही है कि इन दोनों ही कदमों का घाटी में कोई असरकारक परिणाम नहीं दिखा। इसके साथ ही ये भी एक तथ्य है कि कश्मीर में पाकिस्तान परस्त लोगों का मनोबल लगातार बढ़ता गया है। स्पष्ट है कि इस संघर्ष विराम के नकारात्मक असर भी सामने आ सकते हैं। केंद्र सरकार ने रमजान के दौरान संघर्ष विराम कर एक सदिच्छा का परिचय जरूर दिया है, लेकिन इसके साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होगा कि इस दौरान पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से आतंकवादी देश की सीमा में घुसपैठ न कर सकें। इसके लिए सीमा पर सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था करनी होगी। ऐसा कहना इसलिए भी उचित है, क्योंकि पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि भारत अपनी ओर से ऐसी कोई भी पहल करे, जिसका सकारात्मक संदेश कश्मीरी जनता के बीच जाये। इसीलिए वह हर हाल में रमजान के महीने में घोषित संघर्ष विराम के दौरान गड़बड़ी करने की कोशिश करता रहेगा। हमें पाकिस्तान की नापाक मंशा को समझना होगा और अपनी तैयारी उसी के अनुरूप रखनी होगी।

हिन्दुस्थान समाचार/दिव्य उत्कर्ष

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