दबाव में न्यायपालिका, कैसे उतरेगा बोझ

रिपोर्ट के मुताबिक जून 2017 तक रेल मंत्रालय के कुल 67,332 मुकदमे लंबित थे। इनमें भी 10,000 से ज्यादा मामले ऐसे हैं, जो पिछले 10 साल से अधिक समय से लटके पड़े हैं

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लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक न्यायपालिका काफी दबाव में है। अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। देश के विभिन्न अदालतों में अभी जितने मुकदमे लंबित हैं, सिर्फ उनकी ही ढंग से सुनवाई की जाए, तो उनका निपटारा होने में लगभग 25 सालों का समय लगेगा। आसानी से समझा जा सकता है कि अगले 25 सालों में अदालतों में और कितने नए मुकदमे आएंगे। इस तरह से जो लंबित मुकदमे हैं, उन्हें निपटाने में 25 वर्ष की जगह और भी लंबा समय लग सकता है। देश के विभिन्न अदालतों में लंबित लगभग सवा तीन करोड़ मुकदमों में लगभग 57% मुकदमे फौजदारी मामलों के हैं, जबकि दीवानी व अन्य मामले की संख्या लगभग 43% है। इसमें हैरान करने वाली जो बात है, वह यह कि सवा तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमों में 46% यानी करीब एक करोड़ सैंतालीस लाख मुकदमे तो विभिन्न सरकारों की वजह से हैं। केंद्र और राज्य की सरकारों ने इतनी याचिकाएं दाखिल की हुई हैं कि अदालत की बड़ी ताकत उन याचिकाओं के निपटारे में ही खराब हो रही है। यदि सरकार छोटे-छोटे मसलों पर मुकदमा दायर करना बंद कर दे, तो सिर्फ इतना से ही न्यायपालिका के बोझ में काफी कमी आ सकती है।

देश की अदालतों ने भी अपनी सुनवाइयों के दौरान कई बार इस बात को लेकर चिंता जाहिर की है कि सरकार छोटे-छोटे मसलों को लेकर अदालत का समय व्यर्थ ही जाया करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि किसी विवाद को बातचीत द्वारा सुलझाने के लिए (आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट) सरकार अपनी ओर से पहल क्यों नहीं करती। दिल्ली बार एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक आपसी बातचीत या मध्यस्थता के जरिए मसलों को हल करने की कोशिश की जाए तो लगभग सरकार की ओर से दायर होने वाले करीब 32 प्रतिशत मुकदमे अदालत तक पहुंचेंगे ही नहीं। स्वाभाविक है कि अगर अदालतों के पास पड़े इन मामलों को मध्यस्थता के जरिए सुलझा लिया जाए तो आउट ऑफ कोर्ट भी कई चीजें सेटल हो सकती हैं। लेकिन आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट में भी कई पेंच है। सेटलमेंट का यह काम देश की नौकरशाही को करना है और अमूमन नौकरशाह खुद पर कोई जिम्मेदारी लेने से बचने की कोशिश करते हैं। उन्हें हमेशा ही इस बात का डर होता है कि अगर उन्होंने अपने हिसाब से मामले को सेटल करने की कोशिश की तो कल को कहीं उनके खिलाफ ही कोई दूसरा मामला ना बन जाए। यही वजह है कि आम तौर पर नौकरशाह अपना दिमाग लगाकर मामले को आउट ऑफ कोर्ट सेटल करने की जगह उसे कोर्ट के भरोसे ही छोड़ देते हैं।

केंद्र में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी तो एक उम्मीद बनी थी कि एनडीए की सरकार मुकदमों की संख्या पर अंकुश लगाने या अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए नई नीति तैयार करने की कोशिश करेगी। सरकार ने इस संबंध में एक नई वाद नीति तैयार भी की थी। लेकिन, अफसोस इस बात का है कि चार साल के कार्यकाल के दौरान सरकार ने अपनी ओर से इसके क्रियान्वयन की कोई गंभीर कोशिश नहीं की और इस तरह से लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती ही गई। अदालतों पर मुकदमों के बोझ की बात करते वक्त हमें यह भी याद रखना चाहिए कि देश में न्यायपालिका पहले ही न्यायाधीशों की कमी और जरूरत के मुताबिक अदालतों की संख्या में कमी की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में अगर सरकारी मुकदमों की संख्या में ही कमी ला दी जाये, तो इससे अदालतों के समय में तो बचत होगी ही, कम संख्या में मौजूद न्यायाधीश भी ज्यादा जल्दी मामलों का निपटारा कर सकेंगे। केंद्रीय कानून मंत्रालय की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकार के 10 मंत्रालय मुकदमा करने के मामले में सबसे आगे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक जून 2017 तक रेल मंत्रालय के कुल 67,332 मुकदमे लंबित थे। इनमें भी 10,000 से ज्यादा मामले ऐसे हैं, जो पिछले 10 साल से अधिक समय से लटके पड़े हैं। वित्त मंत्रालय से संबंधित विभागों के 15,646, गृह मंत्रालय के 11,600, संचार मंत्रालय के 12,621, शहरी विकास मंत्रालय के 2,306 और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के 1,714 मुकदमे अदालतों में लंबित पड़े थे। देश की विभिन्न अदालतों में इस समय लगभग सवा तीन करोड़ मामले लंबित हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट की बात करें, इस साल मई के पहले सप्ताह में ही 54,013 मुकदमे लंबित थे। इसी तरह विधि संबंधी संसदीय समिति की ताजा रिपोर्ट में देश के सभी हाईकोर्टो में जनवरी 2018 तक 34,27,462 मुकदमे लंबित हैं।

अब बात न्यायाधीशों को रिक्त पड़े पदों की करें तो सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के कुल 31 स्वीकृत पदों में से 7 पद रिक्त हैं। इस साल के अंत तक चार और पद रिक्त हो जाएंगे। इसी तरह उच्च न्यायलयों में न्यायाधीशों के लगभग साढ़े चार सौ पद रिक्त हैं। इनमें से लगभग ढाई सौ पदों के लिए कॉलेजियम ने सरकार से अनुशंसा की हुई है। जबकि अधीनस्थ न्यायपालिकाओं में न्यायाधीशों के कुल 22,677 स्वीकृत पदों में से 5,984 पद रिक्त पड़े हैं। आसानी से समझा जा सकता है कि अधीनस्थ न्यायपलिका तीन चौथाई से भी कम क्षमता से काम कर पा रहा है।

साफ है कि एक ओर तो न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ लदा है, दूसरी ओर उसके जरूरत भर न्यायाधीश भी नहीं हैं। देश की न्याय प्रक्रिया को यदि दुरुस्त करना है तो एक साथ दो मोर्चों पर काम करने की जरूरत है। सबसे पहले तो जितने भी रिक्त पद हैं, चाहे वे अधीनस्थ अदालतों के हों या उच्च अथवा सर्वोच्च न्यायालयों के, उन्हें तत्काल भरा जाना जरूरी है। इसके लिए सरकार को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से विचार-विमर्श करके आवश्यक योजना तैयार करनी चाहिए। इसके साथ ही सरकारी मुकदमों की संख्या में कटौती करने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए। इसके साथ ही एक बड़ी जरूरत देश में नए अदालतों का गठन करना और उनके लिए स्वीकृत जजों की समयबद्ध तरीके से नियुक्ति करना भी है। अदालतों और जजों की संख्या बढ़ाकर भी मुकदमों के बोझ को कम करने की कोशिश की जा सकती है। इसके लिए केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को मिलकर काम करना होगा। अन्यथा देश की न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ बढ़ता ही जाएगा और लोगों से न्याय उतना ही दूर होता चला जाएगा।

हिन्दुस्थान समाचार/डॉ कविता सारस्वत

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