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अफ़सर बनने की चाह और बन जाने पर उल्लास क्या उचित है?

गांधी-नेहरु परिवार के लम्बे समय तक करीबी रहे नटवर सिंह सेवा में रहते हुए आईएफएस अफसर से अधिक देश के पहले राजनीतिक परिवार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते थे

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निश्चित रूप से संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में उतीर्ण होना कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। इसी लिए इस अति अहम परीक्षा में सफल होने वाले नौजवानों को सारा देश एक आदर्श के रूप में देखने लगता है। यही आजकल हो रहा है और पहले भी होता आया है। यूपीएससी परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद सफल अभ्यर्थियों के मीडिया साक्षात्कार दिखा रहा है। टीवी चैनल अपना टीआरपी बढ़ा रहे हैं I वे भी अभी तो देश के लिए कुछ करने के प्रति गंभीर से लग रहे हैं। ये ही तो आख़िरकार, देश की नौकरशाही के शिखर पर जाएंगे । एक तरह से यह भी जा सकता है कि इनके कंधों पर ही होगी सरकार के कार्यक्रमों,योजनाओं और परियोजनाओं और लाखों करोड़ों के बजट को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी।

बेलगाम बाबू

पर इधर बीते कुछ वर्षों से नौकरशाही का जिस तरह से राजनीतिकरण हो रहा है, वह शुभ तो नहीं ही माना जा सकता। यह भी सच है कि इधर शिखर पर पहुंचे सरकारी बाबू थान तक कि महिला अधिकारी भ्रष्टाचार के मामलों में फंस रहे हैं। येअपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने के लिए किसी भी स्तर तक उतरने को तैयार दिखने जाने लगे हैं। बेलगाम हो रहे हैं ये । ये अपने पद का खुलकर दुरुपयोग कर रहे हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के आईएएस जोशी दम्पती के ठिकानों में छापेमारी में करीब 250 करोड़ रुपये की चल-अचल सम्पति का पता चला है।

कहां मिलेंगे वे बाबू

अब हमारे यहां एल.पी. सिंह, एके दामोदरन,के सुब्रमण्यम टीएन शेषन, और जेएन दीक्षित जैसे अफसर कहाँ खो गए हैं। एके दामोदरन ने ही भारत-सोवियत संघ के बीच साल 1971 में हुई एतिहासिक संधि का मसौदा तैयार किया था। स्वाधीनता के बाद भारत की विदेश नीति की रूप-रेखा को दिशा देने में 1953 बैच के आईएफएस अफसर दामोदरन साहब की अहम भूमिका थी। हालांकि उन्होंने अपनी लम्बी सरकारी सेवा के दौरान तमाम प्रधानमंत्रियों और दूसरे अहम मंत्रियों के साथ काम किया पर उन्हें कभी किसी का ‘खास आदमी’नहीं माना गया। वे रिटायर होने के बाद किसी दल से नहीं जुड़े किसी पद की लालसा में। अब उनके जैसे नौकरशाहों का टोटा है। उन जैसे तटस्थ और ईमानदार सरकारी अफसरों की प्रजाति तेजी से विलुप्त हो रही है। अब सिविल सेवा के माध्यम से आए तमाम आला अफसर नौकरी पर रहते हुए ही किसी बड़े रसूखदार नेता के खासमखास बन जाते हैं,जिससे कि रिटायर होने के बाद भी उन्हें कोई बढ़िया सी पोस्टिंग मिल जाए या वे राजनीति में अपने भाग्य को बिना किसी समाज सेवा के चमका सकें।

करते कोरपोरेट दुनिया का रुख

दूसरी थोड़े चालू किस्म की प्रजाति उन अफसरों की है,जो सेवा में रहते हुए ही किसी दल विशेष का आदमी बनने का गौरव हासिल करके अपने शेष भविष्य को सुरक्षित कर लेते हैं। जब तक सरकार की तरफ से इस तरह का कोई कठोर नियम नहीं बनाया जाता कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं (विदेश सेवा, पुलिस सेवा और राजस्व सेवा सहित) के अफसर अपनी सेवा से मुक्त होने के कम से कम तीन-चार साल तक किसी पार्टी या कोरपोरेट घराने से नहीं जुड़ेंगे तब तक हमारे यहां तमाम बड़े बाबू अपना जुगाड़ बिठाते रहेंगे। एक ताजा उदाहरण लीजिए। पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर रिटायर होने के चंदेक महीने के बाद टाटा समूह के इंटरनेशनल डिविजन के प्रमुख बन गए। दरअसल अब अफसर पैसे कमाने को लेकर इतने व्याकुल रहते हैं कि वे अपने मूल काम की अनदेखी करते हुए बड़े नेताओं की सेवा में लगे रहते हैं। वे इस क्रम में तटस्थ,काम को लेकर कतई निष्ठावान और फेयर नहीं रह पाते। यह एक गम्भीर स्थिति है।

जयशंकर की तरह पहले भी अनेक शिखर अफसर कोरपोरेट दुनिय़ा में जाते रहे हैं। भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव अशोक झा ने रिटायर होने के चंद माह के बाद ही हुंदुई कंपनी के सीईओ के पद को संभाल लिया था। कहने वाले कहते हैं कि कोई कोरपोरेट घराना उन्हें ही उपकृत करता है,जिनसे उन्हें पहले लाभ होता रहा है। भारत की एक प्रमुख रीयल एस्टेट कंपनी डीएलएफ लिमिटेड ने कुछ साल पहले एक वरिष्ठ आईएएस अफसर राजीव तलवार को अपने यहां एक बड़े पद पर रखा। हमें यहां इस बात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है कि किसी को कितनी पगार मिलती है। सवाल तो नैतिकता का है। इस सवाल का तो जवाब उन तमाम अफसरों को ही देना होगा जो सेवा में रहते हुए किसी खास नेता, राजनीतिक जमात या कोरपोरेट घराने के लिए खुलकर काम करने लगते हैं। उन्हें बदले में मिलती हैं रेवड़ियां।

इस लिहाज से यशवंत सिन्हा और अजीत जोगी जैसे आईएएस अफसर हटकर ही माने जाएंगे। इन और इन जैसे कुछ और अफसरों ने तब अपनी सेवा से रिटायर होने का फैसला लिया जब इन्हें रिटायर होने में 10-15 साल शेष थे। 1960 बैच के आईएएस अफसर सिन्हा ने में सरकारी नौकरी को छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा। आईएएस अधिकारी रहे अजीत जोगी ने भी अपने कैरियर के शिखर पर रहते हुए सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति करने का फैसला किया था। वे सम्भवत: पहले और एकमात्र आईएएस अफसर हैं, जो किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। देश के किसी भी अन्य नागरिक की भांति इन्हें भी किसी भी पेशे को चुनने का अधिकार तो है ही । इन्होंने किसी पार्टी में शामिल होकर कोई गलत काम नहीं किया।भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी के भी एक सीएमडी आरएस शर्मा ने रिटायर होने के कुछ ही समय के बाद निजी क्षेत्र की एक बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी में शीर्ष पद पर नौकरी कर ली थी। भले ही उन्होंने उस कंपनी को एनटीपीसी में रहते हुए कोई लाभ नहीं पहुंचाया हो पर इस बात को मानेगा कौन?

गांधी-नेहरु परिवार के लम्बे समय तक करीबी रहे नटवर सिंह सेवा में रहते हुए आईएफएस अफसर से अधिक देश के पहले राजनीतिक परिवार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते थे। कहने वाले तो कहते हैं कि 1953 बैच के आईएफएस अफसर नटवर सिंह को गांधी-नेहरु परिवार से करीबियों के चलते हमेशा बेहतर पोस्टिंग भी मिलती रहीं। जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान उनके सितारे गर्दिश में आएI क्योंकि, तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई उन्हें कसते रहते थे। उन्होंने जनता पार्टी के शासनकाल में अपनी परेशानियों के संस्मरण एक अंग्रेजी दैनिक में लिखे भी थे।

अपने लाभ के लिए सियासत का रुख करने वाले अफसरों पर लगाम लगाने के लिए एक सुझाव यह भी आ रहा है कि इन्हें खुद ही रिटायर होने के बाद तीन साल बाद तक किसी पार्टी या कोरपोरेट घराने से नहीं जुड़ना चाहिए। बेशक, यह सुझाव तो काम का है।

खैर, यूपीएससी की परीक्षा को फतेह करने वाले सभी सफल अभ्यर्थी ट्रेनिंग के बाद अहम सरकारी पदों को संभाल लेंगे। सबको बधाइयांI परन्तु, यह देखा जाए कि जोश और उत्साह से लबरेज इन अफसरों में अपने काम के प्रति निष्ठा बरकरार रहे। अगर ये पटरी से उतर गए तो फिर देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही होगी।

Ravindra Kishore Sinhahttp://www.sirfnews.com
Member of Parliament (Bharatiya Janata Party), Rajya Sabha, and Chairman, Hindusthan Samachar Seva Samiti

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अभी मैंने सरकार के मंत्री बिसाहूलाल सिंह जी को बुलाया था, अपने वक्तव्य के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है।

भावना कुछ भी हो, संदेश गलत नहीं जाना चाहिए। एक-एक शब्द तोल-तोल कर बोलना चाहिए। मैंने चेतावनी दी है कि ऐसे ऐसे वक्तव्य किसी भी हालत में नहीं आने चाहिए।

मां, बहन एवं बेटी का सम्मान भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार तथा मेरे लिए सर्वोपरि है। मां, बहन और बेटी हमारे लिए देवी तुल्य हैं और उनके कल्याण के लिए हम अनेक योजनाएं चला रहे हैं।

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Ravindra Kishore Sinhahttp://www.sirfnews.com
Member of Parliament (Bharatiya Janata Party), Rajya Sabha, and Chairman, Hindusthan Samachar Seva Samiti

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