बुजुर्गों को लेकर मोदी सरकार की चिंताएं

सरकार चाहती है कि कोई भी संतति यदि अपने माता-पिता को देखभाल की जिम्‍मेदारियों से बचने की कोशिश करती है या उन्हें उनके साथ दुर्व्यवहार करते पाया जाता है तो उसके लिए छह महीने की जेल की सजा तय हो

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भारतीय संस्‍कृति में अपने माता-पिता और अन्‍य बुजुर्गों की चिंता करने की नसीहत ठीक उसी तरह दी गई है, जैसे कि हम अपने नवजात शिशु की देखभाल करते हैं। जिस देश में बचपन से ही बताया जाता रहा है कि मातृ देवो भवः ! पितृ देवो भवः ! आचार्य देवो भवः ! अतिथि देवो भवः ! माता-पिता, गुरु और अतिथि संसार में ये चार प्रत्यक्ष देव हैं, इनकी सेवा करनी चाहिए। इनमें भी माता का स्थान पहला, पिता का दूसरा, गुरु का तीसरा और अतिथि का चौथा है तथा ‘प्रातकाल उठी के रघुनाथा, मातु-पिता गुरु नावहीं माथा’ ऐसे श्रीराम के आदर्श से विमुख होती संतति के बारे में क्‍या कहा जाए। यह निश्‍चि‍त ही पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति का प्रभाव ही है कि हम अपनी कुल परंपरा से विमुख होते जा रहे हैं। वर्तमान परिवेश में आधुनिकता की चकाचौंध और दग्‍ध होती मानवता के बीच आए दिन यह सुनने में आ जाता है कि संतान अपने माता-पिता की देखभाल करने के बदले उन्‍हें अन्‍यान्‍य प्रकार से प्रताड़ि‍त कर रही है। जीवन के उत्‍तरार्द्ध की स्‍वाभाविक मजबूरियों के कारण माता-पिता भी बच्‍चों की प्रताड़ना को सहने के लिए विवश रहते हैं। ऐसे समय और परिस्‍थ‍ितियों के बीच केंद्र की मोदी सरकार कानून के भय से ही सही कुछ सकारात्‍मक निर्णय लेने की जो सोच रही है, वास्‍तव में उसकी आज सराहना की जानी चाहिए।

सरकार चाहती है कि कोई भी संतति यदि अपने माता-पिता को देखभाल की जिम्‍मेदारियों से बचने की कोशिश करती है या उन्हें उनके साथ दुर्व्यवहार करते पाया जाता है तो उसके लिए छह महीने की जेल की सजा तय हो। अभी इस प्रकार के विषय सामने आने के पश्‍चात अधिकतम दुष्‍ट संतान को तीन माह की ही सजा कानून से मिलती है किंतु मोदी सरकार की मंशा के पूर्ण होने के पश्‍चात यह सजा छह महीने की कर दी जाएगी, जिसके लिए उसे माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण व कल्याण अधिनियम 2007 में आवश्‍यक बदलाव करने होंगे। इस संदर्भ में खुशी इस बात की भी है कि सरकार ने इसमें आवश्‍यक संसोधन की अपनी पूरी तैयारी कर ली है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने संशोधन विधेयक का मसौदा न केवल बनाया है, बल्कि पूर्णत: आवश्‍यक सुधार के साथ तैयार कर रखा है, जिसमें कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण बिल 2018 के मसौदे के अंतर्गत प्रत्‍येक बालक की परिभाषा का दायरा भी बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है। वर्तमान कानून के तहत बच्‍चों को अपने माता-पिता के लिए खर्च राशि का जो अधिकतम निर्धारण किया गया था, वह दस हजार रुपये प्रतिमाह था। लेकिन नया विधेयक मंजूर हो जाने के बाद यदि बच्‍चों की आय अच्‍छी है तो उन्‍हें नई व्‍यवस्‍था के अंतर्गत अधिक राशि अपने माता-पिता की देख-रेख में खर्च करनी होगी। मोदी सरकार इस संसोधन विधेयक के माध्‍यम से सिर्फ इतना ही चाहती है कि जिन लोगों की कमाई अच्छी है, वे अपने माता-पिता की देखभाल भी अच्‍छे ढंग से करें। इसीलिए इस संशोधित विधेयक में देखभाल की परिभाषा बदलने का प्रस्ताव है और इसमें खाना, कपड़ा, घर और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के अलावा माता-पिता की सुरक्षा का इंतजाम करना आगे से सम्‍मलित किया गया है । वस्‍तुत: इस एक निर्णय से ही बुजुर्गों के जीवन स्‍तर में व्‍यापक स्‍तर पर सुधार आएगा, वे सतही जीवन जीने के लिए मजबूर नहीं होंगे। संशोधन विधेयक का यह मसौदा आश्‍वस्‍त करता है कि गुजारा भत्ते की निर्धारित दस हजार रुपये प्रति माह की सीमा खत्म होगी।

इस संशोधन विधेयक के माध्‍यम से गोद लिए या सौतेले बच्चों, दामाद, बहू और पोते-पोतियों, नाति-नातिनों को भी किसी व्यक्ति के बच्चों की श्रेणी में शामिल करने का प्रस्ताव है। बुजुर्गों के जैविक बच्‍चे नहीं हैं, अथवा उनसे खून का सीधा रिश्‍ता नहीं है, यह कहकर अब तक बचते आए लोगों को इस नियम से जोड़कर मोदी सरकार वास्‍तव में उन तमाम लोगों का नैतिक दायित्‍व तय करने जा रही है, जो किसी तरह से ऐसे मामलों में कानून की गिरफ्त से बाहर आते रहे हैं और बचते रहे हैं। यदि संपत्‍त‍ि में अधिकार जमाते वक्‍त इन गोद लिए अथवा सौतेले बच्‍चे का महत्‍व है, तो क्‍यों नहीं इस बात को भी स्‍वीकारना चाहिए कि बुजुर्ग संबंधित संतान की जिम्‍मेदारी हैं और उनका हर खयाल रखना उनका परम कर्तव्‍य है। मौजूदा कानून के प्रावधान सिर्फ जैविक बच्चे एवं पोते-पोतियों को ही इस श्रेणी में शामिल करने तक सीमित हैं। वस्‍तुत: मोदी सरकार का लाया जा रहा यह संशोधन विधेयक उन तमाम लोगों के लिए सीधी चुनौती भी है और दिशा संकेत भी कि यदि अब नहीं सुधरे और आगे अपने माता-पिता को प्रताड़ित किया तो उसका बड़ा हर्जाना चुकाना होगा, क्‍योंकि इसके प्रावधान में यह सुनिश्‍चित कर दिया गया है कि यदि कोई बच्चा अपने मां-बाप की अनदेखी करता है या उनकी देखभाल करने से मना करता है तो बुजुर्ग माता-पिता मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

वास्‍तव में किसी माता-पिता का मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल जाना ही उनके बच्‍चों के लिए आगे कानून के उन तमाम नियमों से परिचित कराने वाला होगा जो यह तय कर देते हैं कि माता-पिता की देखभाल हर हाल में उचित ढंग से करना प्रत्‍येक संतान की प्रथम जिम्‍मेदारी है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा तैयार संशोधन विधेयक को संसद से मंजूरी मिलते ही यह 2007 के कानून का स्थान ले लेगा, इसके बाद अब तक जिन दोषी करार संतान को तीन महीने की सजा होती थी आगे से उन्‍हें छह महीने जेल की सजा काटनी होगी। वास्‍तव में यह संशोधन विधेयक मोदी सरकार का उन तमाम लोगों के लिए एक दिया गया संकेत है, जो अपने अभिभावकों की सही देखरेख नहीं करते हैं। यह साफ और सीधे शब्‍दों में कहता है कि अपने बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी करने वालों की खैर नहीं है। अत: अपने माता पिता का सम्‍मान ठीक उसी प्रकार करो जैसी भारतीय परंपरा कहती है, और जिसका वर्णन कई स्‍थानों पर किया गया है।

हिन्दुस्थान समाचार/मयंक चतुर्वेदी

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