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दंतेवाड़ा की वह अविस्मरणीय रात

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छत्तीसगढ़ में बस्तर इलाके की हृदयस्थली जगदलपुर में 24 अगस्त 2018 को हिन्दुस्थान समाचार ने ‘‘बस्तर विकास संवाद’’ का आयोजन किया था। जगदलपुर कृषि विश्वविद्यालय का सभागार खचाखच भरा था। सैकड़ों लोग जिन्हें बैठने को कुर्सियां नहीं मिल पायी थीं, दरवाजों के पास और गलियारों में भी खड़े थे। अद्भुत कार्यक्रम हुआ। हॉल की सीटों की संख्या के हिसाब से ही भोजन की व्यवस्था की गयी थी। लगभग दुगने लोग आ गये। भोजन कम पड़ गया। वैसे यह किसी समारोह की सफलता का शुभ संकेत भी माना जाता है। मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने अपने भाषण में दिल्ली से आये हुए पत्रकारों की टोली को चुनौती भरे स्वरों में कहा कि ‘‘आप जब इतना कष्ट करके जगदलपुर तक आ ही गये हैं, तो एक बार दंतेवाड़ा भी हो आइये। बस्तर का कैसा विकास हुआ है यह स्वयं जान लीजिए। दंतेवाडा के बारे में जो भ्रम पाल रखा है उसका समाधान भी कर लीजिए।’’

हिन्दुस्थान समाचार का अध्यक्ष होने के नाते मैंने मंच पर से ही डा रमन सिंह जी की चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया और तत्काल घोषणा कर दी कि ‘‘मेरे साथ चाहे कोई आयें या न आयें मैं तो दंतेवाडा जा ही रहा हूँ।’’ दिल्ली से लगभग 50 पत्रकार साथी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से गये थे, उनमें से लगभग आधे तो वापस लौट गये। मैं तो यह नहीं कहता कि वे दंतेवाड़ा के नाम से डर गये होंगे। क्योंकि, पत्रकार की जाति डरती तो नहीं है। जान हथेली पर रखकर घूमने की आदत पड़ चुकी होती है। किन्तु, कुछ व्यवहारिक दिक्कतें भी थी। षायद ही कोई ऐसा था जो एक रात रूकने की तैयारी से गया था। मैं भी जो कपड़े पहनकर गया था वही साथ था। न बदलने को कपड़े, न मंजन, न ब्रश, न सेविंग किट, न दवाईयां। फिर भी जब मैं दंतेवाड़ा के लिए चल पड़ा तो लगभग 20 पत्रकार मित्र साथ हो लिये।

80 से 85 किलोमीटर का जंगली रास्ता। मैंने ड्राइवर से पूछा,-‘‘कितना समय लगेगा भाई? उसने कहा,-‘‘पहले 5 से 6 घंटे लग जाते थे साहब। लेकिन, जब से डा रमन सिंह जी आये हैं, तेजी से सुधार हुए हैं। सड़क इतनी चौड़ी और अच्छी हो गयी है कि डेढ़ घंटे में जगदलपुर से दंतेवाड़ा आसानी से पहुंच जाते हैं।’’ मैंने पूछा,-‘‘सुना है यहां नक्सली सड़क नहीं बनने देते थे?’’ रामू ड्राइवर ने कहा कि, ‘‘साहब आपने ठीक ही सुना है। कोई ठीकेदार यहां आने को तैयार ही नहीं होता था। नक्सली इंजीनियरों से मारपीट करते थे। जगह-जगह सड़कें खोद देते थे। एक बार मैं भी फंस चुका हूँ।’’ मैंने पूछा- ‘‘क्या हुआ?’’ उसने बताया- कि ‘‘एक बार जगदलपुर से दंतेवाड़ा जाते हुए नक्सली सड़क खोदते हुए मिल गये। मेरी गाड़ी को रोक दिया। घेरकर गाड़ी से चाभी निकाल ली। गाड़ी में एक मरीज भी था। उन्होंने मुझे और गाड़ी में बैठे सभी लोगों को, यहां तक कि बीमार व्यक्ति को भी एक-एक फावड़ा थमाया और हम लोगों से 2 घंटे तक सड़क खोदवाते रहे। फिर मुझे चाभी देकर वापस जाने को कहा और चेतावनी दी कि दुबारा वापस नहीं आना। लेकिन, अब तो कोई ऐसी बात नहीं है,साहब। अब आप एक से डेढ़ घंटे में दंतेवाड़ा पहुँच जायेंगे। सड़क भी अच्छी है और गांव वाले भी। गांववासी नक्सलियों की सारी चालों को समझ गये हैं। ये कहने को नक्सली हैं लेकिन, वास्तव में ये तमाम अपराधकर्मी और गुंडें हैं। ट्रकों और ठीकेदारों से पैसे वसूलना, वन सम्पदा की तस्करी करना और गांव वालों को तरह-तरह से प्रताड़ित करने और जंगलों में मौजमस्ती करने के अलावे इनका कोई काम नहीं है। ये बस्तर के हैं भी नहीं। इनके सारे कमांडर दिल्ली और हैदराबाद में पढ़े आवारा लड़के हैं जो अब नक्सलवाद के नाम पर लूटमार और अय्यासी कर रहे हैं। अब इनकी जमकर पिटाई हो रही है और ये अपना जान बचाकर भागते फिर रहे हैं। गांव में अब इनका साथ देनेवाला कोई नहीं बचा है।’’

गाड़ी आगे बढ़ती रही। बढ़िया चौड़ी सड़क। सड़क की फिनिशिंग इतनी अच्छी कि लग रहा था कि किसी नवनिर्मित नेशनल हाईवे पर हों। कहीं भी एक गड्ढा नहीं। कोई ब्रेकर नहीं। गाड़ी में कोई झटका नहीं। चारों ओर हरियाली ही हरियाली। शायद ऐसी ही हरियाली को देखकर बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘‘शस्य श्यामलम् मातरम्’’ लिखा होगा। हरे भरे धान के खेत, जंगल, पहाड़ियां, छोटे-छोटे झरने, चट्टानों पर खेलते बच्चें। जगह-जगह लगे हाट। मुर्गो को लड़ाकर उसका आनन्द लेती गांव की भोली-भाली जनता। अद्भुत दृश्य था।

अब लगभग हम जगदलपुर से दंतेवाड़ा पहुंचने ही वाले थे। लेकिन, मेरी आंखे जो देखने की इच्छुक थी, वह कहीं दिख नहीं रहा था। न कहीं अर्द्ध सैनिक बल, न स्थानीय पुलिस। कोई चौकीदार भी नहीं दिखा। सबकुछ सामान्य।

अब हम अटल बिहारी वाजपेयी समेकित शिक्षण केन्द्र परिसर में पहुंच चुके थे। 240 एकड़ में फैला यह परिसर भी डा रमन सिंह का अभिनव प्रयोग है। यह एजुकेषनल सिटी जवांगा नाम के गांव में स्थित है जो दंतेवाड़ा शहर से 12 से 15 किलोमीटर पहले ही लगभग 240 एकड़ की प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर भूखंड पर डा रमन सिंह जी द्वारा बसाया गया है। पहले से ही इसका नाम अटल बिहारी वाजपेयी परिसर रखा गया है। डा रमन सिंह अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी राज्य मंत्री थे और अटल जी का भरपूर आषीर्वाद उन्हें मिला था। सबसे पहले हम बीपीओ

कम्पलेक्स पहुंचे जहां लगभग 300 नवयुवक-नवयुवतियां एक अत्याधुनिक कॉल सेंटर में काम कर रहे थे। उन्हें कम्प्यूटर पर बैठकर खटाखट काम करते देख आश्चर्य भी हुआ और आनन्द भी आया। दंतेवाड़ा जिला के युवा और उर्जावान जिलाधिकारी सौरभ सिंह स्वयं एक-एक हॉल में हमें लेकर गये और किस हॉल में क्या काम चल रहा है उसकी विस्तृत जानकारी दी। एक हॉल में हैदराबाद की एक साफ्टवेयर कम्पनी द्वारा इन बच्चों से किसी प्रोजेक्ट पर काम कराये जा रहे थे। उनका प्रषिक्षण कार्यक्रम चल रहा था। उनसे से कइयों से मैंने बातचीत भी की। उनका कहना था कि यहां के बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं और हैदराबाद की तुलना में लगभग आधे पैसे में ही इनकी सेवायें भी उपलब्ध हैं। यहां 12 घंटे काम करने का मात्र 400 रूपये प्रतिदिन देना पड़ता है, जबकि इसी काम के लिए हैदराबाद में बच्चे 800 से 1200 रूपये में भी मुष्किल से ही उपलब्ध हो पाते हैं। सभी बच्चों के लिए यहां हॉस्टल और भोजन की व्यवस्था की गई है। लड़के लड़कियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल है। बच्चे मुक्त प्राकृतिक वातावरण में काम कर रहे हैं। ये भविश्य के प्रति आषान्वित भी हैं। सभी स्वस्थ्य और प्रसन्न दिखे। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि बीसीए और एमसीए करके बच्चे अपने गांव के पास ही काम कर रहे हैं। जिलाधिकारी सौरभ सिंह ने बताया कि अब यहां की 300 सीटें कम पड़ रही है। कुछ दिन पहले यहां राश्ट्रपति महोदय भी आये थे। उन्होंने भी इस कार्य को सराहा था। अब मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के आदेश पर हम बीपीओ की सीटों को बढ़ाकर 1000 करने की कार्य योजना को मूर्त्त रूप देने में लगे हैं।

इसके बाद हम अटल बिहारी वाजपेयी शिक्षण परिसर में ही स्थित आवासीय विद्यालय में गये, जिसका नाम है ‘‘आस्था’’। सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम वाले इस विद्यालय को एक ट्रस्ट द्वारा चलाया जा रहा है, जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी ही हैं। इस आधुनिक सुन्दर से विद्यालय में नक्सली आतंक में मारे गये ग्रामीणों के बच्चे-बच्चियां मुफ्त षिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मेरे लिए वह एक आनन्ददायक या यूं कहिये आष्चर्यजनक अनुभव का क्षण था। खासकर बच्चों के स्मार्ट क्लास रूम और उनकी विज्ञान की प्रयोगषालाओं को देखकर मुझे ऐसा लगा कि दिल्ली और देहरादून के बड़े और नामी स्कूलों के बच्चों को और षिक्षकों को भी इन बच्चों और इस विद्यालय प्रबंधन के दक्षता से कुछ सीख लेने की जरूरत है। बच्चे-बच्चियां आत्मविश्वास से लवरेज। विषय का पूर्ण ज्ञान और अभिव्यक्ति में कोई झिझक नहीं। जब जिलाधिकारी ने पूछा कि स्मार्ट क्लास के बारे में सांसद महोदय को कौन जानकारी देना चाहेगा, तो आठवीं कक्षा की दस-बारह बच्चियों ने एक साथ हाथ उठा दिया। यह आत्मविश्वास देखकर मैं चकित था।

मैं देहरादून के दि इंडियन पब्लिक स्कूल का अध्यक्ष भी हॅू। इस नाते मैंने तत्काल जिलाधिकारी सौरभ सिंह जी को बच्चों को एक एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार भी किया। इसके बाद हमने जिस विद्यालय का भ्रमण किया, वह दिव्यांग बच्चों का विद्यालय था जिसका नाम है ‘‘सक्षम’’। नाम के अनुरूप ही यहां दिव्यांग बच्चे-बच्चियों को सक्षम बनाने का सार्थक प्रयास चल रहा है। यहां तमाम बस्तर इलाके के दृश्टिहीन, गूंगे-बहरे, कुबड़े और हाथ-पैर से कमजोर बच्चे पढ़ते हैं। किन्तु, सभी के सभी हैं आत्मविष्वास से भरे हुए। सभी के चेहरों पर प्रसन्नता है, उमंग है, और है अद्भुत आत्मविश्वास। हीनभावना का नामोनिशान तक नहीं। काश! ऐसे दिव्यांग विद्यालय हमारे बड़े षहरों में भी होते। मैंने बच्चों को संबोधित भी किया। उनसे बातचीत की। शिक्षकों को भी प्रोत्साहित किया। सही मायने में मन भर आया।

सर्किट हाउस पहुंचने के पहले हम ‘‘भूमगादी’’ नामक संगठन के षो रूम में गये।  ‘‘भूमगादी’’ जैविक कृशक उत्पादक कंपनी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। जिला दंतेवाड़ा में विगत चार सालों से कृषकों के बीच जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु प्रषासन द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं। इन प्रयासों के अंतर्गत जिले के जैविक खेती से जुड़े कृषकों ने एकत्रित होकर अपने जैविक उत्पाद को बाजार के साथ जोड़ने हेतु ‘‘भूमगादी’’ जैविक कृषक उत्पादक कंपनी की स्थापना अगस्त 2016 में की। अब तक जिले के 1200 जैविक कृषक इस कंपनी के षेयरहोल्डर्स बन चुके हैं एवं अपने कार्य से यह संगठन 3000कृषकों से जुड़ा हुआ है। ‘‘आदिम’’ इस ब्रांड के माध्यम से जिले के जैविक एवं परंपरागत किस्म के चावल, कोदो-कोसरा, दलहन इत्यादि को बाजार के साथ सफलतापूर्वक जोड़ने हेतु प्रयास ‘‘भूमगादी’’ द्वारा किया जा रहा है। देश भर के दिल्ली, जयपुर, चंडीगढ़, उदयपुर, पूणे, भोपाल, चेन्नई, बंगलोर,त्रिवेंद्रम, कोचीन जैसे 25शहरों में‘‘भूमगादी’’ के उत्पाद पहुंच रहे है। वर्ष 2018-19 में 250 मैट्रिक टन जैविक उत्पाद को बाजर के साथ जोड़ने हेतु प्रयास किया जा रहा है।

इसके बाद सर्किट हाउस में मुँह-हाथ धोकर लगभग 8.30 बजे रात में हम 800 साल पुराने दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन के लिए गये। किंवदंती के अनुसार जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड से पार्वती के शव को लेकर आकाश मार्ग में विचरण कर रहे थे तब भगवती का दाढ़ (जबड़ा) दंतेवाडा में ही गिरा था। उसी स्थान पर दंतेश्वरी मंदिर स्थित है और नगर का नाम भी इसी कारण दंतेवाड़ा पड़ा। छोटा सा षांत सुन्दर और प्रकृति की गोद में बसा षहर है दंतेवाड़ा। दर्शन करके हम जब सर्किट हाउस लौटे तो कुछ महिलायें मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। वे मुझे राखी बांधने आयी थीं। चूंकि, मैं राखी की पूर्व संध्या पर ही था, इसलिए यह बाजिब भी था। उन्होंने मुझे राखी बांधी। उन महिलाओं के दल का जो नेतृत्व कर रही थीं उनका नाम नीरा यादव था। उनका मायका मुलायम सिंह यादव के गांव के आसपास ही है। दंतेवाड़ा में व्याही हैं और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे और उनके साथ आयी महिलायें मुझे आष्चर्य से देख रही थी। षायद उनके लिए एक अजूबा घटना थी कि बिहार से चलकर कोई सांसद दंतेवाड़ा आया है। मैं भी इस बात से अचम्भित था कि 9-10 बजे रात को ये महिलायें अकेली सुनसान सड़कों पर घूम कैसे रही हैं। इतना बेखैफ तो वे राजधानी दिल्ली में भी नहीं घूम सकतीं। मैंने पूछा-‘‘डर नहीं लगता है क्या?’’ उनलोगों ने हंसते हुए कहा ‘‘किस बात का डर? बस्तर की महिलायें तो बाघों से भी नहीं डरती, तो क्या इन टुच्चे-लुटेरे नक्सलियों से क्या डरेंगी? भाई साहब, एक बात बताइये। आप दिल्ली में रहते हैं। कितने बच्चे दिल्ली में कुपोषण की वजह से, आक्सीजन की कमी की वजह से, कितने नागरिक सड़क दुर्घटनाओं में रोज ही मर रहे हैं। हमारे पूरे बस्तर में तो उसके एक-दो प्रतिशत भी तो नहीं मरते। मरना तो एक दिन सबको है। आपने बाहर लगा होर्डिंग नहीं पढ़ा? अटल बिहारी वाजपेयी कह रहे हैं- ‘‘लौट कर फिर आऊँगा, मौत से क्यू डरूं।’’ दंतेवाड़ा में न भय है न आतंक और न ही भागमभाग। प्रकृति का सौंदर्य देखना है तो जो यहां नहीं आये हैं उन्हें भी चाहिए एक बार दंतेवाड़ा-बीजापुर घूम आयें। जगदलपुर के चित्रकोट जलप्रपात को जरा देख लें। मांसाहारी हों तो हमारे यहां के कड़कनाथ मुर्गे का स्वाद चख लें। फिर वे बस्तर को भूल नहीं पायेंगे।’’

मैं रातभर आराम से सोया। सुबह जलपान के बाद जिलाधिकारी सौरभ ने हमें ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे एक परियोजना पर ले गये जहां बकरी पालन, गौपालन, कड़कनाथ मुर्गा पालन, मषरूम की खेती, छोटे-छोटे चावल मिल, छोटे-छोटे इलेक्ट्रोनिक रिक्षा चार्जिग स्टेशन, जिन्हें दंतेवाड़ा की सड़कों पर ग्रामीण महिलायें फर्राटे से चलाती हैं और सवारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती रहती हैं।

लौटते समय रास्ते में एनडीएमसी द्वारा 50 करोड़ की लागत से निर्मित बस्तर मेडिकल कॉलेज का सुन्दर सा विशाल भवन देखा। कंधे पर बहंगी लचकाते हुए गैस के सिलिंडर और चूल्हे को लादकर प्रसन्नता से गांव जाते किसानों को भी देखा। फिर जगदलपुर के पास नगरनाऱ में बनाये जा रहे 30 लाख टन की उत्पादन क्षमता वाले इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट को देखने गये। इन सब को देखकर ऐसा लगा कि बस्तर वाकई बदल रहा है। विकास की तेज धार में बह रही है। बिना शोर मचाये विकास गांवों तक पहुंच रहा है। जिसे देखना हो देख ले। पंजाबी की एक पुरानी कहावत है-‘‘जिन लाहौर नीं वेख्यां वो जन्मयाई नीं।’’ यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, वह पैदा ही नहीं हुआ।

दंतेवाड़ा में अविस्मरणीय रात गुजार कर मैं तो यही कहूँगा कि दंतेवाड़ा-बीजापुर, सुकमा के प्राकृतिक सौंदर्य को जिसने नहीं देखा, नियाग्रा फॉल के टक्कर वाले चित्रकोट के झरने को नहीं देखा, बस्तर की कला संस्कृति, चित्रकारी, काष्ट शिल्प,धातु शिल्प को जिसने नहीं निहारा, वह यदि प्रकृति प्रेमी होने का यदि स्वांग भरता है तो वह तो ढोंगी ही कहा जाना चाहिए। खासकर उन पत्रकारों को तो एक बार हो ही आना चाहिए जो चंडूखाने की गप्पें सुनते सुनाते हैं और दंतेवाड़ा-बीजापुर में आतंक के माहौल को प्रचारित करते हैं।

बस्तर शांत है, कृषि समृद्ध है। विकास और सम्पन्नता की ओर बढ़ रहा है बस्तर संभाग, जिसे देखना हो जाकर देख ले।

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