Thursday 3 December 2020
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Temples, Hindus trampled over by the Indian state

Freeing Hindu temples has been a long-standing demand of the community. However, all governments since the British era have ignored the demand, benefited from revenue collection from these Hindu practices, corrupted the tenets of all sects of Hindus and defamed the community.

हमारे देश में वक्फ़ प्रॉपर्टी, मस्जिद, दरगाह इत्यादि जैसे मुस्लिम स्थल, गिरजा या आर्च diocese जैसे ईसाई संस्था, गुरुद्वारा या गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी सरकार के अधीन नहीं हैं, We have no problem with that. लेकिन मंदिर सरकार के अधीन है। इसलिए सरकार हिन्दुओं से मंदिर का पैसा लेकर अन्य अमुदायों में बाँट सकती है. सरकार तय करती है और न्यायलय तय करता है कि मंदिर में पूजा कैसे होनी चाहिए और मंदिर में कौन प्रवेश कर सकता है।

First of all, how is a secular state competent to deal with dharma or religion? How is even the Supreme Court a competent authority to decide how we must pay obeisance to Lord Vishnu or Lord Shiva?

We know that any government system is afflicted by corruption. The government officials swindle the temple money and Hindus get a bad name.

A state government like that of Jaganmohan Reddy in Andhra Pradesh appoints Christians in the Tirupati Tirumala Devasthanam that runs the famous Tirupati Balaji temple.

ऐसी परिस्थिति में सवाल यह उठता है कि बरसों से उठाई जा रही मंदिरों को मुक्त करने की मांग के बारे में क्या वर्तमान सरकार अवगत नहीं है? ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि इस बीच कर्णाटक चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि यह मांग पूरी कर दी जाएगी। लेकिन येदियुरप्पा की जगह कुमारस्वामी की सरकार बनी। जब येदियुरप्पा सत्ता में वापस आए, वे अपना संकल्प भूल गए। उत्तर भारत में उत्तराखंड सरकार ने बल्कि जो मंदिर मुक्त थे उन्हें भी अपने क़ब्ज़े में ले लिया।

When we raise this issue, the most common argument we hear in response is that priests and other people who manage temples cheat people. This, by the way, was a piece of prpaganda floated by the British who wanted to usurp all Hindu properties. The falsehood was propagated further by communists, Periyar followers and most shockingly, successive governments of independent India.

The question is, even if we accept the allegation of unscrupulous priests, how is Hindu society incapable of handling it without government interference? हिन्दुओं के अलग-अलग मंदिर होते हैं। यदि आपके शहर में 100 मंदिर हैं, हो सकता है कि उनमें से 5 की व्यवस्था, पूजा पद्धति, सञ्चालन, प्रबंधन आदि आपके मतों के अनुरूप हो। अगर किसी मंदिर से आप संतुष्ट नहीं हैं तो कोई और मंदिर जा सकते हैं। यदि किसी भी मंदिर से संतुष्ट नहीं हैं तो कुछ मित्रों की सहायता से अपना मंदिर बना सकते हैं। और जिन मंदिरों में आपको लगता है कि पुजारी घोटाला करता है, वहाँ दक्षिणा मत दीजिये, उस मंदिर में मत जाइए! फिर जो चंद लोग उस मंदिर में जाते हैं, यदि पैसा डूबा तो केवल उन गिनती के लोगों का पैसा डूबेगा — हालांकि मैं फिर कह रहा हूँ कि मंदिरों में घोटाले होना बर्तानिया सरकार का प्रोपगंडा था जिसे वामपंथियों और नास्तिकों ने आगे बढ़ाया।

इस चर्चा कर रहे हैं धर्म के प्रचारक नितिन श्रीधर, सबलोकतंत्र के रचित कौशिक, मानव संसाधन क्षेत्र में कार्यरत निहारिका मिश्र, सत्यान्वेषी भारत के संस्थापक और पत्रकार कुमार श्रीकांत और सिर्फ़ न्यूज़ के मुख्य संपादक सुरजीत दासगुप्ता।

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