बच्चे घर देर आए और दुरुस्त न आए तो?

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— ममा, आज हम सारे दोस्त ग्रेसी के घर नाईट स्पेंड करेंगे! सुबह आ जायेंगे।
— फ़्रेंड्स के साथ लाँग ड्राइव पर जा रहा हूँ, लौटने में देर हो जाएगी।
आज दोस्तों के साथ लेट-नाईट पार्टी है, आप फ़िक्र मत कीजिएगा।

जवान होते बच्चों के माता-पिताओं को अक्सर यह सब सुनने को मिलता है। कुछ इसे सामान्य ढंग से लेते हैं तो कुछ अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर घबरा जाते हैं। एक ओर देर रात होने वाले हादसों की आशंकाएँ माता-पिता को डराती हैं तो दूसरी ओर दोस्तों का दबाव उनके बच्चों को ज़िद्दी बनाने लगता है। बच्चे जानते हैं कि अगर उनके माता-पिता ने उन्हें अनुमति न दी तो उनके दोस्तों के बीच उनका बहुत अधिक मज़ाक़ बनेगा। ऐसी स्थिति में भले ही माता-पिता उनकी ही सुरक्षा को लेकर चिंतित होते हैं, उन्हें तो माता-पिता दुश्मन ही नज़र आते हैं — जिनके मन में उनकी भावनाओं की, उनकी खुशियों की कोई कद्र ही नहीं। जो बस उनके ऊपर अपना रौब ही दिखाते रहते हैं!

अक्सर इस तरह की खींचातानी को लोग जेनरेशन गैप का नाम देते हैं। लेकिन मुझे तो महसूस होता है कि यह जेनरेशन गैप कम, और “हालात का गैप” अधिक है। बच्चे माता-पिता के नज़रिए को समझ नहीं सकते क्योंकि वे अभी माता-पिता बने ही नहीं। हाँलाकि माता-पिता तो बच्चों के मन की बात समझ सकते हैं। वे तो उस उम्र से गुज़र चुके हैं जिस उम्र में अभी उनके बच्चे हैं। लेकिन अक्सर वे अपनी उस उम्र की बातों को, उन सारी भावनाओं को भूल जाते हैं। और यदि कुछ माता-पिता उस उम्र को याद रखते हुए ही अपने बच्चों को समझाने की कोशिश करते हैं तो उनकी ये बात उनके बच्चे समझ नहीं पाते।

बच्चे केवल यही समझते हैं कि उनके माता-पिता उनकी इच्छाओं का गला घोंट रहे हैं। जबकि दूसरी ओर माता-पिता जानते हैं कि जब वे इस उम्र में थे तो ऐसे ही उनका भी दिल मचलता था — अपने हमउम्र लोगों के साथ अधिक से अधिक समय गुज़ारने को, देर रात मौज-मस्ती करने को। भले ही उनके मौज-मस्ती करने के अंदाज़ अलग रहे हों, उनकी भी उन इच्छाओं पर उनके माता-पिता ने भी बंदिशें लगाई ही थीं और उस समय उन्होंने भी कभी न कभी यही सोचा था कि उनके माता-पिता उन्हें नहीं समझते, उनकी इच्छाओं का गला घोंटते हैं… और फिर, समय के साथ उन्हें समझ में आया था कि उनके माता-पिता ने उनके साथ ठीक ही किया था।

किसका दिल नहीं करता रातों को दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने का? मेरा भी करता था। जब मैं किशोरावस्था में थी, ऐसी पार्टियों में जाने की बड़ी इच्छा होती जहाँ देर रात तक म्यूज़िक, डांस और मस्ती का माहौल होता। उस अवस्था की क्या बात करूँ, आज भी इस तरह की पार्टियों के लिए कहीं न कहीं एक दबा सा आकर्षण रहता ही है। लेकिन ऐसी पार्टी में गयी नहीं। उस उम्र में भी नहीं गयी और इस उम्र में भी नहीं। उस उम्र में तो इसलिए नहीं कि वही… माता-पिता की बंदिशें! और इस उम्र में मैं ख़ुद माँ बन चुकी हूँ। भले ही गुज़री हुई अपनी किसी भी उम्र को भूली नहीं हूँ, आज अपने माता-पिता के नज़रिए को समझ पाती हूँ। समझ पाती हूँ कि अभिभावकों की ग़ैर-मौजूदगी में होने वाली देर रात वाली पार्टियों में मौज मस्ती से अधिक संभावनाएँ अप्रत्याशित घटनाओं की होती हैं। कई बार तो पार्टी वाली जगह पर ही अप्रिय हालात उत्पन्न हो जाते हैं और कई बार वहाँ से लौटते समय रात के सन्नाटों में सुनसान सड़कों पर अप्रिय हादसे हो जाते हैं। जब भी चार युवा हमउम्र एकसाथ होते हैं, मौज-मस्ती में डूबे उनका ध्यान ही नहीं जाता कि कब कोई हादसा हो गया।

ऐसी स्थितियों में जहाँ वयस्क होता मन सोचता है, अरे, कुछ नहीं होता, सब ऐसे ही डरते हैं, वहीं वयस्क मन हर बार ऐसी ही अप्रिय घटनाओं के लिए ही डरता रहता है।

बात दोनों की ही कुछ हद तक सही होती है। जहाँ ये बात सच है कि आख़िर हर बार तो कुछ अप्रिय घटना हो नहीं जाती, वहीं यह भी तो ग़लत नहीं कि क्या पता कब ऐसी अप्रिय घटना घट ही जाये!

नियम कोई नहीं, बस एक लकीर होती है, सुरक्षा और असुरक्षा की — जिसे परम्परा में लोग मर्यादा और अमर्यादा का नाम दे देते हैं।

युवा क्रांतिकारी मन परम्पराओं को नहीं मान पाता। ऐसे में मर्यादा की बातें उसे खोखली लगती हैं। लेकिन क्या सुरक्षा की बात करना भी ग़लत है? आख़िरकार सीट-बेल्ट लगाने से या टू-व्हीलर पर हेलमेट लगाने से ख़ुद हमारा जीवन सुरक्षित रहता है। ऐसा तो है नहीं कि हमपर यह नियम थोपने वाले का कोई निजी लाभ होता है!

क्या ग़लत है और क्या सही इसका निर्णय हम खुद ही कर सकते हैं। हमारा अपना जीवन हमारे लिए कितना क़ीमती है यह हमें ख़ुद ही समझना होगा।

आख़िर हमारे जीवन पर कोई विपदा आयी तो तकलीफ़ खुद हमें ही झेलनी होगी। हाँ, यदि हमारे जीवन पर कोई विपदा आने पर तकलीफ़ हमारे किसी दुश्मन को भुगतनी पड़ती तो शायद हम इस तरह के दुस्साहस को सही ठहरा भी सकते थे। लेकिन ऐसा कहाँ होता है? हमारी सारी नादानियों की सज़ा केवल हमें उठानी पड़ती है और साथ ही उठानी पड़ती है हमारे माता-पिता को। तो क्यों न खुद ही विवेक से काम लेकर निर्णय करें कि दोस्तों के साथ हमारे प्रोग्राम हमें कितना सुरक्षित या असुरक्षित रखेंगे? अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने से हम डरपोक नहीं हो जाते! आख़िर जीवन हमारा है; इसे सुरक्षित रखने का अधिकार भी हमारा ही है।