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Sunday 15 December 2019

तवलीन सिंह, यह कैसा स्वाभिमान?

‘जिस मोदी सरकार का पांच साल सपोर्ट किया उसी ने मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया,’ तवलीन सिंह ने लिखा। क्या आपने किसी क़ीमत के बदले समर्थन किया?

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Sonali Misra
Sonali Misrahttps://www.sirfnews.com
स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार, उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं प्रकाशित हुआ है और शिवाजी पर उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य है; उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है

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एक बार फिर आतिश तासीर चर्चा में हैं। इंडिया टुडे पर दिया गया उनका साक्षात्कार लोगों की ज़ुबाँ पर है। परन्तु मैं एक बार फिर से तवलीन सिंह के इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित उस लेख के बहाने कुछ बातें करना चाहती हूँ। बहुत कुछ है जिस पर चर्चा होनी चाहिए, बहुत कुछ है जो तहों के नीचे है। तवलीन सिंह एक माना हुआ नाम हैं और उनका उल्लेख एक स्वतंत्र स्त्री के रूप में होता है। पहले तो स्वतंत्रता की परिभाषा ही भ्रामक है। कहा जाए तो वह सलमान तासीर की परितक्या थीं, जिसे संबंधों की एक सुविधाजनक अवधि के बाद त्याग दिया गया, पर इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। किसी का व्यक्तिगत सम्बन्ध कितनी भी अवधि का हो, इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

प्रसंग | “भारतीय गृह मंत्रालय ने जरूरी सूचनाएं छिपाने के कारण लेखक और पत्रकार आतिश तासीर का ओसीआई (ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया) स्टेटस समाप्त कर दिया है। ब्रिटेन में जन्में लेखक आतिश अली तासीर ने दरअसल, सरकार से यह तथ्य छुपाया कि उनके पिता पाकिस्तानी मूल के थे। गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, तासीर ओसीआई कार्ड के लिए अयोग्य हो गए हैं क्योंकि ओसीआई कार्ड किसी ऐसे व्यक्ति को जारी नहीं किया जाता है जिसके माता-पिता या दादा-दादी पाकिस्तानी हों और उन्होंने यह बात छिपा कर रखी।” — हिन्दुस्तान

तवलीन सिंह अपने लेख में अपने बुरे दिनों की कहानी लिखती हैं। सहानुभूति लेने की यह ललक अभिजात्य स्त्रियों में इस हद तक क्यों है मुझे अभी तक समझ नहीं आया। इस बच्चे को इस दुनिया में लाने का निर्णय तवलीन का था और यह किसी ऐसे सम्बन्ध से उत्पन्न संतान नहीं थी जिसके लिए समाज उत्तरदायी होता! यदि कहा जाता कि उन्होंने समाज के दबाव में आकर विवाह किया और फिर उस विवाह के चलते यह संतान हुई, तब समाज की कोई भूमिका होती और यदि उन्हें समर्थन नहीं मिलता तो वह अपनी सहानुभूति वाली कहानी सुना सकती थीं और चला सकती थीं। यह संतान आपस के प्रेम सम्बन्ध के चलते हुई थी, मात्र कुछ घंटे का प्रेम और फिर जीवन भर की जुदाई!

इन प्रेम सम्बन्धों के कारण जन्म लिए बच्चे के साथ समाज का रवैया सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। परन्तु यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है कि यदि कोई स्त्री एक सिंगल माँ होने का फ़ैसला करती है तो यह उसका अपना निर्णय है और उसकी सफलता या विफलता के लिए उसे स्वयं ही तैयार होना चाहिए। स्वयं के लिए गए निर्णय के आधार पर वह स्वयं को पीड़िता घोषित नहीं कर सकती है।

तवलीन सिंह उस लेख में आगे लिखती हैं कि उनके पास वित्तीय रूप से केवल उनकी नौकरी का सहारा था जो उन्हें एमजे अकबर ने दिलाई थी जब उन्होंने कहा कि उन्हें काम की ज़रूरत है। और उनकी माँ गॉल्फ़ लिंक में उनकी बरसाती का किराया देती थीं। उसके बाद जो लिखती हैं, वह सबसे महत्वपूर्ण है। वह अपनी गरीबी का रोना रोते हुए लिखती हैं कि उनके मित्र वसुंधरा राजे ने पैसे से उनकी मदद की और उनके बेटे आतिश ने उनकी बहन के जुड़वां बच्चों के छोटे कपड़े पहने। यद्यपि यह किसी भी मध्यवर्गीय घर में बहुत आम बात है कि बच्चे अपने से बड़ों के छोटे कपड़े बहुत ही ख़ुशी-ख़ुशी पहनते हैं। हम सब ऐसे ही बड़े हुए हैं; हाँ, मगर यह बात दूसरी है कि हमारी माओं ने इसे कभी प्रतिष्ठा का विषय नहीं बनाया, न ही सहानुभूति का विषय। कैसी सहानुभूति? उसके बाद वह लिखती हैं कि उनके बेटे आतिश के पास जो सबसे अच्छे कपड़े थे, वह सोनिया गांधी द्वारा दिए गए थे। सोनिया गांधी तवलीन सिंह की मित्र थीं और वह आतिश के लिए अच्छे कपड़े दिया करती थीं।

इस पूरे अनुच्छेद से जो कुछ भी उभरता हो, एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी स्त्री की तस्वीर तो नहीं उभरती। उभरती है तो मात्र ऐसी स्त्री की तस्वीर जिसने समाज को दिखाने के लिए या फिर न जाने क्यों एक दिन के बने सम्बन्ध से उपजे पुत्र को जन्म दिया और फिर उसकी क़ीमत सभी से वसूलनी चाही।

स्वतंत्र स्त्रियाँ सीता का बहुत उपहास करती हैं और कहती हैं कि वह सीता नहीं। सीता जैसी वह हो भी नहीं सकती। सीता स्वाभिमान के चलते अपने पति का घर छोड़ आई थीं और उन्होंने अपने पति का नाम लिए बिना अपने पुत्रों को स्वाभिमान से जीना सिखाया। यह कैसा स्वाभिमान रहा तवलीन सिंह का कि अपने बच्चे के लिए पहले तो मदद ली और बाद में उस मदद के कारण बाकी लोगों को अपराधी घोषित कर रही हैं! एक सिंगल माँ होने का निर्णय आपका, सलमान तासीर के साथ रिश्ता बनाने का निर्णय आपका, फिर उस पुत्र के लिए भारत सरकार अपने नियम क्यों तोड़े? क्या इसलिए कि सोनिया गांधी आपकी मित्र थीं और आपके पुत्र के लिए कपड़े लाती थीं? यदि वह आपके पुत्र के लिए कपड़े लाती थीं और आपकी तमाम तरह से सहायता करती थीं तो क्या इसी कारण आपका क़लम हिंदुत्व के ख़िलाफ़ चलता रहा? और वह अपने लेख में लिखती हैं कि यद्यपि उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की कई मुद्दों पर प्रशंसा की, फिर भी मोदी सरकार ने यह किया!

अब एक बात तो तवलीन सिंह को स्वीकारनी होगी कि क्या वह स्वाभिमानी हैं या सत्ता के साथ रंग बदलने वाली? क्योंकि एक पत्रकार साफ़-साफ़ यह लिख रही हैं कि उनकी मदद एक दल के नेता ने की, फिर दूसरे दल की नेता ने तो और भी ज़्यादा, और फिर जिनके विषय में पत्रकार महोदया ने लिखा, उन्होंने पत्रकार महोदया की सहायता नहीं की! प्रश्न यह उठता है कि अपने फ़िफ़्थ कॉलम में आपने जमकर हिंदुत्व के विरोध में लिखा है। हिंदुत्व को भारत के ख़िलाफ़ भी आपने खड़ा कर दिया। आपने गौ तस्करों पर अपने लेखों में कुछ नहीं लिखा, मगर आपने बीफ़ हिस्टीरिया का लक्ष्य मुसलमानों को बता दिया?

आपने सरकार के कुछ क़दमों का समर्थन किया, मगर समाज को तो नहीं समझा? सरकार और समाज के बीच आपके लिए केवल सरकार ही महत्वपूर्ण रही तो आपके एक व्यक्तिगत निर्णय के लिए वही समाज क्यों आपसे कोई सहानुभूति रखे जिस समाज को आप पिछड़ा कहती हैं?

इतने स्पष्ट नियम को समझने में किसे परेशानी हुई होगी?

आप और आपका पुत्र पूरी तरह से हिंदुत्व और हिन्दुओं के प्रति एक अथाह नफ़रत से भरे हुए हैं, फिर भी आप चाहती हैं कि वही हिन्दू समाज आपके उस निर्णय में आपका साथ थे, जिसे लेते समय आपने समाज से तो नहीं पूछा था? सरकार के बने नियमों का उल्लंघन करने का अधिकार आपको कौन देता है? क्या सरकार की प्रशंसा का अर्थ यह होता है कि वह आपको कुछ विशेष लाभ दे? क्या जिस प्रकार सोनिया गांधी आपके पाकिस्तानी पुत्र के लिए कपड़े लाती थी, वह क़ानून भी आपके पुत्र के अनुसार बनाए?

यह स्वाभिमान मुझे समझ नहीं आया! आख़िर यह कैसा स्त्री का सुविधाभोगी स्वाभिमान है कि जब मन हुआ किसी से भी मदद ले ली, कहीं से सरनेम ले लिया, और समाज पर थोप दिया — कि अब मेरे इस निर्णय का सम्मान करिए! ऐसा नहीं होगा। समाज ने सीता का आदर किया था, सीता से बड़ी स्वाभिमानी स्त्री न ही इतिहास में कोई है और न ही हो सकती है। आप जहां एक तरफ़ कहती हैं कि आपने सलमान तासीर से कोई रिश्ता नहीं रखा तो ऐसे में सलमान तासीर का सरनेम क्यों अपने बेटे को दिया? आप उस सरनेम का मोह क्यों नहीं छोड़ सकीं?

आतिश तासीर सरकार के विरोधी हो सकते हैं, मगर हिंदुत्व से इस हद तक नफ़रत? और वह भी उस देश में रहते हुए जिस देश की आत्मा ही हिंदुत्व के रंग में रंगी हुई है! आप ऐसी कैसे स्वाभिमानी स्त्री रहीं कि आपने अपने पुत्र को उसके पिता के देश और पिता के धर्म से प्यार सिखा दिया, मगर इस देश की आत्मा से परिचय नहीं कराया?

मेरा प्रश्न और आपत्ति आपके लेख की प्रथम पंक्ति को लेकर है कि ‘जिस मोदी सरकार का पांच साल सपोर्ट किया उसी ने मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया’! यक़ीन नहीं हो रहा! क्या आपने किसी क़ीमत के बदले समर्थन किया? क्या आपने समर्थन के लिए शर्त रखी थी? क्या आपने स्वाभिमान को दांव पर नहीं लगाया या आपने सत्ता के साथ चलने का अपना चरित्र दिखाया? पंरतु फिर भी एक स्त्री होने के नाते आप अपने व्यक्तिगत निर्णय के लिए सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकतीं। और न ही उस समाज को अपने उस निर्णय के लिए आप दोषी ठहरा सकती हैं जो कहीं से भी इसके प्रति उत्तरदायी नहीं है। समाज ने आपसे सिंगल माँ बनने के लिए नहीं कहा, सरकार ने नहीं कहा। यदि आपने सिंगल माँ बनने का निर्णय लिया है और वह भी दुश्मन देश के नेता की डोमेस्टिक पार्टनर के रूप में, तो उसकी प्रतिक्रिया के लिए केवल आप ही उत्तरदायी हैं, कृपया अपने स्वार्थ के लिए स्त्री स्वाभिमान आदि शब्दों का प्रयोग न करें।

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वैसे आज की स्थिति तीन साल पहले से बेहतर है; सन 2016 में भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे कम से कम एक वेबसाइट को हर दिन हैक किया जा रहा था
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