23 C
New Delhi
Friday 6 December 2019
Views Articles स्वरा राग बेसुरा क्यों अलाप रही हैं?

स्वरा राग बेसुरा क्यों अलाप रही हैं?

स्वरा भास्कर जी,

23 फरवरी की सुबह आपका पत्र पढ़ा। बधाई! बहुत अच्छा लिखती हैं आप। आपके अभिनय का तो मैं प्रशंसक हूँ ही, आपकी लेखनी का भी क़ायल हो गया। वैसे आप मुझे नहीं जानतीं — एक छोटा सा टेलीविज़न पत्रकार और एंकर हूँ मैं। पर मैं आपको बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ, जब आप मॉडलिंग करती थीं तब से। एक मॉडल के रूप में भी आपकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति को हमेशा मैंने सराहा है।

उमर ख़ालिद जिस रात पुनः प्रकट हुआ
उमर ख़ालिद जिस रात पुनः प्रकट हुआ

हालांकि आपके पत्र में क्या होगा इसका आभास बिना पढ़े ही हो गया था। क्योंकि आप जब भी अभिनेत्री से एक्टिविस्ट की भूमिका में आती हैं तो आपकी एक ही दिशा होती है — नरेंद्र मोदी को गरियाओ, हिन्दूओं को कोसो। (इससे पहले कि मेरी प्रोफाइलिंग हों जाये – “भक्त”, “हिन्दू फंडामेंटलिस्ट”, यहाँ यह जोड़ देना ज़रूरी समझता हूँ कि बेशक यह आपका हक़ है, और किसी को हक़ नहीं इस पर उंगली उठाने का) पर दरअसल एक अभिनेत्री के रूप में आप ज़रूर बहुत वर्सटाइल एक्ट्रेस हैं, लेकिन एक एक्टिविस्ट के रूप में आप टाइप्ड हो चुकी हैं। इसलिए जब पढ़ा कि स्वरा भास्कर ने उमर ख़ालिद को ख़त लिखा है तो शीर्षक देख कर ही समझ गया था कि “भारत के बर्बादी गैंग” के कर्मों को जायज़ ठहराने की ही पहल होगी। और ऐसा ही हुआ भी।

पुरानी कहावत है न, “ख़त का मजमून भांप लेते है लिफ़ाफ़ा देख कर”। वैसे इसको मैं यूं भी कह सकता था कि “गाय जब पूँछ उठाएगी तो गोबर ही करेगी”। लेकिन ये नहीं कहूँगा। हालांकि ये डायलॉग आपकी फ़िल्म इंडस्ट्री का ही है, इसमें आपको गोबर का तो पता नहीं पर गाय की बू ज़रूर आ सकती है। क्योंकि गाय की बात करना ज़रा हिंदूवादी मामला हो जाता हैl इसलिए आपकी पसंद का ख़याल रखते हुए हिंदूवादी गाय को परे रख कर उर्दू का मुहावरा इस्तेमाल करना ही ठीक रहेगा।

अपने पत्र में उम्मीद के अनुसार ही आपने पूरा ज़ोर लगा कर यही साबित करने की कोशिश की है कि उमर ख़ालिद चूंकि मुस्लिम है इसलिए उसे सरकार, पूरा सिस्टम, मीडिया और देश के लोग (सिर्फ भटके हुए, आप जैसे सही — ग़लत का विवेक रखने वाले लोग नहीं) उसे आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए हैं। इस देश में मीडिया ट्रायल से कोई बचा नहीं है। यह उदाहरण आपको बुरा लगेगा, पर आज जो देश के प्रधानमंत्री हैं वो भी दस साल तक मीडिया ट्रायल का शिकार होते रहे, फिर उमर ख़ालिद तो महज़ एक स्टूडेंट ही है। इसलिए इस मुद्दे पर आपके ग़ुस्से को जायज़ मानते हुए भी एक सवाल ज़रूर पूछना चाहता हूँ — किस मीडिया, टेलीविज़न एंकर या बड़े नेता ने उमर ख़ालिद को आतंकवादी कहा? किसी ने नहीं। हाँ, कुछ न्यूज़ चैनल्स ने उसे हिज़्बुल मुजाहिद्दीन या जैश-ए-मोहम्मद का “sympathizer “ ज़रूर कहा। और इसमें क्या ग़लत है भला? मेरे अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं, पर आप तो इंग्लिश की स्टूडेंट रह चुकी हैं; आपको sympathizer का मतलब बताना सूरज को दिया दिखने जैसा है। फिर भी यहाँ कुछ विदेशी शब्दकोशों को उद्धृत करता हूँ —

  1. a person who supports a political organization or believes in a set of ideas

  2. a person who is in approving accord with a cause or person

तो ये तो शाब्दिक अर्थ हुआ। भावार्थ अगर आप समझना चाहें तो जो भी देश का नागरिक (चाहे हिन्दू हो, मुस्लिम या कोई और) देश के टुकड़े -टुकड़े करना चाहता है, जो भी देश का नागरिक सेना के जवानों की शहादत का जश्न मनाता है और आतंकवादियों को शहीद मनाता है क्या वो आतंकवादियों का समर्थक नहीं? इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो हिन्दू है या मुस्लिम। आख़िर कन्हैया तो हिन्दू ही है न! देशद्रोही हिन्दू भी हो सकता है मुस्लिम भी। जयचंदों और अफ़ज़लों की कमी थोड़े ही है इस देश में!

Swara-Bhaskar-Wiki---Prem-Ratan-Dhan-Payo-Movie-Actress
स्वरा भास्कर

पर आप फ़िल्मी लोग बहुत कल्पनाशील होते हो! अपनी चिट्ठी में बार बार उमर के लिए “मुस्लिम”, “आतंकवादी” जैसे सम्बोधनों का इस्तेमाल करके आपने उसे हीरो बना दिया। आपकी प्रेरणा से ही जब उमर अपने बिल से निकल कर कैंपस में फिर से अवतरित हुआ तो उसने “My name is Khan and I am not a terrorist” की तर्ज़ पर डायलॉग मारा – “मेरा नाम उमर ख़ालिद है और मैं आतंकवादी नहीं हूँ!”

आपने सही लिखा है कि जिन लोगों की सभाओं में 25 लोग भी नहीं जुटते, वो भला देश क्या तोड़ेंगे! वैसे इनकी सभाओं में 25 क्या, पच्चीस सौ और पच्चीस हज़ार लोग भी जुट जायेंगे तब भी ये लोग भारत के टुकड़े नहीं कर पाएंगे। क्योंकि आपके जेएनयू की “भारत तेरे टुकड़े होंगे” ब्रिगेड को लगता है कि भारत तो सिर्फ़ गांधीजी का देश है। और उन्हें लगता है कि हिन्दुस्तान तो “कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो” वाले गांधीजी को फ़ॉलो करता है। इसलिए भारत की बर्बादी करना बड़ा आसान है। पर ये भारत की बर्बादी ब्रिगेड भूल गयी कि ये देश गांधीजी के साथ साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाकउल्ला खान और सुभाष चन्द्र बोस का भी देश है, जो ये सीख गए हैं कि वतन के लिए मरा भी जा सकता है और मारा भी जा सकता है। जेएनयू में जो लोग भारत की बर्बादी होगी के नारे लगा रहे थे वो ये भी भूल गए कि इस देश में हज़ारों-लाखों लांसनायक हनुमंतअप्पा, कैप्टेन तुषार महाजन और कैप्टेन पवन कुमार जैसे जांबाज़ सिपाही हैं जो भारत को आबाद रखने के लिए जान न्यौछावर करने को तैयार बैठे हैं।

अरे अरे… शहीद कैप्टेन पवन कुमार का ज़िक्र आया तो अचानक याद आया कि ये जांबाज़ सिपाही भी तो जेएनयू का ही पूर्व छात्र था! आपने उमर ख़ालिद को जो चिट्ठी लिखी है उसका शीर्षक यही कहता है कि आप भी जेएनयू की पूर्व छात्रा हैं और उमर ख़ालिद भी, इसलिए इस अधिकार से, कनिष्ट के प्रति उभरे स्नेह भाव से आपने यह पत्र लिखा। कन्हैया भी जेएनयू का ही है इसलिए आपने उसके पक्ष में अपने ट्विटर हैंडल से एक अभियान छेड़ रखा है। पर इस नाते तो आपके स्नेह और सम्मान के अधिकारी शहीद कैप्टेन पवन कुमार भी हैं। जिस तरह आपने उमर ख़ालिद को इतनी लम्बी चिठी लिखी उसी तरह से एक छोटा सा ख़त शहीद पवन कुमार की माँ को भी लिख देतीं, जिसने अपना एकमात्र बेटा उस कश्मीर और उन कश्मीरियों को बचाते हुए खो दिया, जिसे आज़ाद कराने के लिए उमर ख़ालिद जैसे एलीट छात्र भारत को बर्बाद तक करने को तैयार हैं। जेएनयू के पूर्व छात्र पवन कुमार की माँ की आँखों से आंसू अब भी नहीं सूखे हैं, आपका ख़त शायद उस माँ की हौंसला अफ़ज़ाई करता जिसकी गोद सूनी हो गयी है। अपने ख़त में आपने सिमी के सदस्य रह चुके उमर ख़ालिद के पिता की भी खूब पीठ ठोंकी है, पर एक ख़त शहीद पवन के पिता राजबीर सिंह को लिख कर उन्हें भी सैल्यूट कर देतीं, जिन्होंने अपने बेटे की शहादत पर कहा कि उनका एक ही बेटा था पर उन्हें गर्व है कि अपना बेटा उन्होंने सेना को और देश को दे दिया।

pavan kumar

वैसे गर्व तो आपको भी होगा कैप्टेन पवन कुमार पर! 22 साल के इस शहीद ने वो कर दिखाया जो जेएनयू के आप जैसे बाईस सौ लोग नहीं कर पा रहे थे। पूरे देश ने जब से वो फ़ुटेज देखी थी जिसमे खुले आम जेएनयू में पूरे दिन “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह”, “भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी, जंग चलेगी” जैसे नारे लग रहे थे, तब से हर कोई यह मान रहा था कि जेएनयू में सिर्फ़ देश तोड़ने की मंशा रखने वाले लोग ही हैं। पर कैप्टेन पवन की शहादत से सबको यह महसूस हुआ कि, नहीं, जेएनयू में सारे देश विरोधी ही नहीं हैं। सिर्फ़ कुछ ही ऐसे लोग हैं वहां। इस शहादत ने उस “शट डाउन जेएनयू” अभियान की हवा निकाल दी जिसके ख़िलाफ़ आप भी थीं और मैं भी हूँ। तो क्यों न इस बात के लिए कृतज्ञता जताते हुए ही आप एक ख़त शहीद के परिवार को लिख देतीं?

पर शायद कैप्टेन पवन की माँ और पिता को पत्र लिखने के लिए आपको समय नहीं मिल पाया होगा। न जाने कितनी बैचैन रातों को जग कर आपने उमर ख़ालिद को इतना लम्बा ख़त लिखा होगा, आप थक गयीं होंगी! हो सकता है रिफ़्रेश होने के लिए आज रात मुंबई में नाईट आउट पार्टी का प्रोग्राम बन गया हो! पर पार्टी के बीच से ही कैप्टेन पवन की शहादत पर एक ट्वीट ही कर देतीं! कन्हैया के लिए तो आपने पचासों ट्वीट करके अभियान चला रखा है। कैप्टेन पवन के लिए एक ही ट्वीट कर देतीं। भूल गयी होंगीं, न? आपके ट्विटर पर भी तो अभी पार्टी चल रही है! उमर ख़ालिद को इतना ज़ोरदार ख़त लिखने के बाद से देश भर से कितने लाल सलाम मिल रहे हैं आपको। चलो, अब जब मैंने याद दिला ही दिया है, तो ये जश्न ख़त्म हो जाये फिर कल-परसों में औपचारिकता के लिए एक ट्वीट कर देना। जैसे किसी के याद दिलाने पर लांसनायक हनुमंतअप्पा को आपने श्रद्धांजलि की औपचारिकता की थी!

स्वरा जी, आप शायद बहुत भावुक हैं। आपके पत्र में 30 साल के ‘छात्र’ उमर ख़ालिद के लिए बहुत दर्द छलक रहा है कि कहीं भारत की पुलिस, भारत के लोग उसे मार न डालें। पर स्वरा जी, महज़ 22 साल के कैप्टेन पवन कुमार को तो मार डाला गया है; उसके लिए आपका कोई दर्द छलकता दिखाई नहीं दिया? ओह्ह हो! मैं भी कितना बेवक़ूफ़ हूँ न! कहाँ कहाँ की, क्या क्या बात करने लगा! मैं तो यह भूल ही गया था कि आप जेएनयू वाले हो भई; भारत के वीर सैनिकों की मौत पर आप लोग मातम नहीं जश्न मनाते हो। 2010 में वहां सीआरपीएएफ़ के 76 जवानों की मौत का जश्न मनाने की ख़बर तो सभी अख़बारों में छपी थी।

पता नहीं आपने जेएनयु का होने के कारण अपने ही कुछ जूनियर्स की इस बेशर्मी का विरोध किया था नहीं, कोई चिट्ठी-विठ्ठी लिखी थी या नहीं इन लोगों को। पर उस वक़्त बुरा तो बहुत लगा होगा आपको, और शायद इस हरकत पर शर्मिंदगी भी महसूस हुयी होगी। क्योंकि भारतीय सेना के जवानों की मौत के जश्न का आप कैसे समर्थन कर सकती हैं? आपके तो पिताजी ख़ुद 37 साल भारतीय जल सेना की सेवा कर चुके हैं। इस नाते तो आप भी भारत के एक वीर सिपाही की बेटी हैं। देश के वीर सिपाहियों की बेटियां कैसी होती हैं, इसका एक बिलकुल ताज़ा उदाहरण देश ने देखा है। पम्पौर आतंकवादी हमले में शहीद हुए सैनिक राजकुमार राणा की बेटी से जब किसी पत्रकार ने बात कि तो रुंधे गले से उसने कहा कि पापा मुझे बहुत प्यार करते थे और डॉक्टर बनाना चाहते थे। उस बिटिया की उम्र सिर्फ 14 -15 साल रही होगी पर जब उससे पिता की शहादत के बारे में पूछा गया तो उसने कहा — पिताजी ने देश के लिए जान दी है और पूरा देश उसके पिता को आज सलामी दे रहा है, ऐसी सलामी हर किसी को थोड़े ही नसीब होती है! छोटी सी बच्ची की सोच कितने ‘बड़े-बड़ों’ से बड़ी है। काश देश के हर सिपाही के बेटे बेटियों में ऐसे ही संस्कार होते!

चूंकि आपके पिताजी का ज़िक्र आया तो बस यूँ ही बता दूँ कि सौभाग्य से उनसे अच्छा परिचय है। आपके पिता अक्सर मेरे टेलीविज़न शोज में पैनल गेस्ट के तौर पर आते रहते हैं। सामरिक, रणनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उनकी समझ और जानकारी बेजोड़ है।

आप मीडिया से बहुत नाराज़ हैं, मीडिया ट्रायल से बहुत नाराज़ हैं। आपकी नाराज़गी जायज़ है। आज कल हर कोई मीडिया से नाराज़ है। पर अपने पिताजी से पूछियेगा जैसे जेएनयू के सारे छात्र गद्दार नहीं वैसे ही सारे मीडिया वाले ख़राब नहीं। कुछ लोग बहुत ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं। ये और बात है कि जब से लोगों ने बड़े-बड़े पत्रकारों, बड़े- बड़े चैनल और नामी-गिरामी टेलीविज़न एंकर्स को नीरा राडिया कांड में दलाली करते हुए देखा, कॅश फ़ॉर वोट कांड के स्टिंग ऑपरेशन को दबाते हुए देखा, कोयले की दलाली में हाथ काले करते देखा, तब से लोगो के मन में मीडिया की बहुत विश्वसनीयता नहीं रह गयी है। पर आपके ट्वीट्स देख कर लगता है कि आपके पसंदीदा पत्रकार तो वही कुछ गिने चुने लोग हैं जिनका नाम राडिया काण्ड में दलाली करने में उजागर हुआ।

स्वरा जी, मैं आपके पिछले एक साल के ट्वीट्स अभी पढ़ रहा था, आप पेरिस पर हुए आतंकवादी हमले से लेकर पैलेस्टाइन तक हर मुद्दे पर ट्वीट करती हैं, पर पठानकोट आतंकी हमले और पाकिस्तान पर खामोश हो जाती हैं। कश्मीरी पंडितों की बात तो करती हैं पर उनके दर्द की बात करना आपको हिंदूवादी ताकतों का कम्युनल एजेंडा लगता है! लेकिन जब उमर ख़ालिद और उसके साथी कैंपस में संसद पर आतंकवादी हमले के गुनहगार अफज़ल की बरसी मनाते हैं, उसको सजा देने पर देश की सर्वोच्च अदालत को “हत्यारी” कहते हैं, “घर घर से अफज़ल निकलेगा” का नारा लगते हैं, “बन्दूक़ के दम पर कश्मीर की आज़ादी” लेने का नारा लगाते हैं, तब आपको वो “इडियट” लगता है।

umar idiot
स्वरा भास्कर के लेख का एक अंश

वैसे कन्हैया और उमर इतने “इडियट” नहीं हैं जितना आपने अपनी चिट्ठी में इन्हें दिखने की कोशिश की है। आपको मालूम नहीं होगा शायद इसलिए बता रहा हूँ कि आतंकवादियों के समर्थन में इन्होने जिस कार्यक्रम का आयोजन किया था, उसकी अनुमति लेने के लिए अपनी एप्लीकेशन में इन्होने लिखा था कि कविता पाठ के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करना है। लेकिन कार्यक्रम आतंकवादियों की “जुडिशल किलिंग “ के विरोध में और भारत की बर्बादी — बन्दूक़ के दम पर कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में हुआ। बन्दूक़ के दम पर कश्मीर की आज़ादी के नारे की टेप जब मीडिया में आ गयी तो कन्हैया ने नयी टेप शूट करवाई, जिसमें कश्मीर की आज़ादी सामंतवाद से आज़ादी, संघवाद से आज़ादी में बदल गयी!। तो अपने बिल में दुबकने से पहले जो उमर “भारत तेरे टुकड़े होंगे” दहाड़ रहा था और घर घर से अफज़ल निकाल रहा था, जब अपने बिल से निकला तो बैकग्राउंड में बैनर टांग दिया — “जस्टिस फ़ॉर रोहित वेमुला”! भई वाह, ग़ज़ब का शातिर दिमाग़ पाया है आपके इन टू “इडियट्स” ने!

वैसे आपकी चिट्ठी ऐसा आभास देती है कि मानो एक बड़ी बहन छोटे “इडियट” भाई को प्यार से झिड़की दे रही हो। पर यहाँ भी आप “भाई” के प्यार में अंधी दिखाई देती हैं। आपने एक बार भी उसे प्यार से इस बात के लिए झिड़की नहीं दी कि भई तुम तो कहते हो कि तुम आदिवासियों के लिए काम करना चाहते हो, इसीलिए इसी विषय में रिसर्च भी कर रहे हो। पर आदिवासियों के तमाम मुद्दों को छोड़ कर ये अफ़ज़ल गुरु और हिंदुस्तान की बर्बादी/ कश्मीर की आज़ादी के झंडाबरदार क्यों बन गए? एक बड़ी बहिन की तरह आपको यह जानने की उत्सुकता भी नहीं हुयी कि कहीं भाई ग़लत संगत, बुरी सोहबत में तो नहीं पड़ गया!

मुझे नहीं पता कि कश्मीर को लेकर आपकी राय क्या है (वैसे मुझे और पूरे देश को न तो इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही पड़ना चाहिए) पर जिस तरह आपने “अमेरिका बरसों तक कश्मीर को विवादित क्षेत्र मनाता रहा, उस अमेरिका से भारत की दोस्ती”, “पीडीपी-भाजपा गठबंधन”, “हुर्रियत नेताओं से वाजपेयी सरकार की वार्ता” जैसे मुद्दे घुमा फिरा कर उठाते हुए उमर ख़ालिद की “भारत की बर्बादी तक कश्मीर की जंग” से सहानुभूति जताई है, उसे देख कर मुझे हैरानी हुई। अपने पत्र में आपने “कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार”, “भारत से अलग होने के कश्मीर के हक़” के जो मुद्दे उठाए हैं, इन पर आप कम से कम अपने पिताजी से ही थोड़ी जानकारी हासिल कर लेतीं। मैं और मेरे जैसे बहुत से लोग जो तथ्यों, तर्कों और अपने इतिहास के ज्ञान के आधार पर जानते और मानते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा है और रहेगा, उनके पास इस मुद्दे पर कहने के लिए बहुत कुछ है, पर आप अपने घर पर ही अपने पिता से टूयशन ले लें तो देश पर बहुत एहसान होगा। इन विषयों पर आपने अपने पिता के ज्ञान का ज़रा भी लाभ उठाया होता तो आप उस “इडियट” उमर ख़ालिद में भी सही-गलत का भेद करने की समझ विकसित करने में मददगार हो सकती थीं। अगर ऐसा होता तो आज वो “इडियट” जेल में नहीं होता।

पर यक़ीन मानिये कि उमर ख़ालिद इसलिए जेल में नहीं है कि वो मुस्लिम है, कश्मीर और अफ़ज़ल को लेकर उसकी अपनी एक ‘राय’ है, जैसा कि आपको और आपकी सहेली को लगता है। वो इसलिए जेल में है क्योंकि उसने भारत के संविधान, भारत की सर्वोच्च अदालत और भारत की संप्रभुता को चुनौती दी है। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को, राष्ट्रपति के विवेक से लिए निर्णय को “न्यायिक हत्या” बताना, उन्हें हत्यारा कहना, भारत की बर्बादी तक जंग चलाने का आह्वान करना, भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए नारे लगाना — क्या ये अपराध नहीं? क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी है? सिर्फ “राय” है? स्वरा जी, मैं पचासों बार कश्मीर गया हूँ, जान जोख़िम में डाल कर बहुत रिपोर्टिंग की है वहां। अलगाववादियों के पत्थर खाए हैं। आतंकवादियों के इंटरव्यू किये हैं। आतंकवादियों के गढ़ों और अलगाववादियों के घरों-दफ्तरों मैं भी कश्मीर की आज़ादी के नारे तो लगते देखे और सुने हैं, लेकिन भारत की बर्बादी और भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे मैंने कश्मीर मैं भी आज तक नहीं सुने।

और अगर इन “इडियट्स” ने ये सब करके भी अपराध नहीं किया, जांच में इनके ख़िलाफ़ कुछ सबूत नहीं मिलता तो अदालत उन्हें रिहा कर देगी! इतना तो देश की अदालतों पर हमें भरोसा करना ही चाहिए।

पर आपके लिए संविधान, सर्वोच्च न्यायलय, इस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था कुछ मायने कहाँ रखती है? मुझे आज भी याद है लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद आपने ट्वीट किया था कि संख्या (यानि जनमत) से क्या फ़र्क़ पड़ता है, संख्या ग़लत को सही नहीं ठहरा सकती। तो आपके हिसाब से इस देश का जनमत गलत है, देश की अदालतें हत्यारी हैं, देश के राष्ट्रपति जल्लाद हैं और देश का संविधान बकवास है। बस सही हैं तो आप!

DD News के एंकर अशोक श्रीवास्तव उक्त चैनल के एक शो के दौरान
DD News के एंकर एवं इस खुले पत्र के लेखक अशोक श्रीवास्तव उक्त चैनल के एक शो के दौरान

स्वरा जी, अंत में आपसे सिर्फ़ एक बात पूछना चाहता हूँ — अपनी राजनैतिक पसंद-नापसंद और अपनी राजनैतिक-वैचारिक प्रतिबद्धताओं को ज़रा परे रख कर दिल से जवाब दीजियेगा। क्योंकि आप एक भारतीय हैं, क्योंकि आपके पिता भारतीय नेवी के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं, इसलिए पूछ रहा हूँ कि जब आपने सुना कि जेएनयू में “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह” “भारत की बर्बादी तक, कश्मीर की आज़ादी तक जंग चलेगी, जंग चलेगी”, “इंडियन आर्मी मुर्दाबाद” जैसे नारे लगे हैं, तो क्या आपका ख़ून नहीं खौला, दिल रोया नहीं? आपने एक बार भी इन नारों के ख़िलाफ़ नहीं बोला, बल्कि बड़ी आसानी से कह दिया कि “इडियट्स ने रायता फैला दिया”! स्वरा जी, ये रायता नहीं ये ज़हर फैलाया जा रहा है। पर शायद मुंबई के बॉलीवुड की चकाचौंध या फिर लेफ़्ट-लिबरल की वैचारिक प्रतिबद्धता रायते और ज़हर में फ़र्क़ करने का विवेक ख़त्म कर देती है!

भारत माता की जय!

अशोक श्रीवास्तव

आपका एक प्रशंसक

Subscribe to our newsletter

You will get all our latest news and articles via email when you subscribe

The email despatches will be non-commercial in nature
Disputes, if any, subject to jurisdiction in New Delhi

3 COMMENTS

  1. बहुत लाजवाब सर! बहुत दुख होता है जब ऐसे लोग (स्वरा भास्कर) इनकी वकालत करते हैं क्योंकि ये उस परिवार से आए हुए है जहां वीरता…अनुशासन..त्याग और देशभक्ति कूट कूट भरी होती है….स्वरा जी….कृपया अपने पापा से एक बार इस मुद्दे पर बात जरूर कीजिएगा….धन्यवाद

  2. लेख में मुद्दे की नब्ज़ पकड़ी गयी है। मगर बहुत दुःख की बात है कि आज कल देश में देशभक्ति की बात करना भी एक कट्टरता माना जाता है।

Leave a Reply

Opinion

Trump Drives Democrats And Media Crazy

America can never be the same again, even after Trump leaves the White House,” say many, and you can read that anywhere

Balasaheb Thackeray’s Legacy Up For Grabs

The Uddhav Thackeray-led Shiv Sena has failed to live up to the ideals of Balasaheb, leaving a void that the BJP alone can fill

How BJP Pulled Off Maha Coup With Nobody Watching

As Devendra Fadnavis desisted from contradicting Uddhav Thackeray everyday, the media attention moved from the BJP to its noisy rivals

Anil Ambani: From Status Of Tycoon To Insolvency

Study the career of Anil Ambani, and you will get a classic case of decisions you ought not take as a businessman and time you better utilise

तवलीन सिंह, यह कैसा स्वाभिमान?

‘जिस मोदी सरकार का पांच साल सपोर्ट किया उसी ने मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया,’ तवलीन सिंह ने लिखा। क्या आपने किसी क़ीमत के बदले समर्थन किया?
- Advertisement -

Elsewhere

Nirav declared 2nd fugitive economic offender

Nirav Modi, fighting his extradition case in England, was further remanded, unable to convince the court he wouldn't intimidate witnesses

RBI policy rates intact; SBI disapproves status quo

The 6-member MPC headed by the RBI governor unanimously decided to maintain the repo rate at 5.15% and the reverse repo rate at 4.90%

Parliament canteen to stop offering subsidised food

The Narendra Modi government had been reducing the subsidy for food at the Parliament canteen gradually since 2016; it will now be eliminated

Burnt body found again: Bengal after Telangana, Bihar, UP

Bengal Police confirmed that the woman was burnt and killed on 4 December in Malda while they could confirm rape after the autopsy report

Citizenship, Dabholkar, Bhima-Koregaon divide Maha govt

The INC not only disagrees with the Shiv Sena on the Citizenship Amendment Bill but also questions the NCP for the Bhima-Koregaon riots

You might also likeRELATED
Recommended to you

For fearless journalism

%d bloggers like this:
Skip to toolbar