सर्फ एक्सेल विवाद ― विज्ञापन जगत भी लिबरलों, वामपंथियों का गढ़

सतही तौर पर सर्फ एक्सेल का विज्ञापन मासूम सा लगता है; गहराई से सोचें तो यह हमारी संस्कृति पर एक टिप्पणी है

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मीडिया, शिक्षा और एनजीओ इत्यादि की तरह विज्ञापन भी वामपंथी लिबरलों का एक मज़बूत गढ़ है। पहले के समय में विज्ञापन किसी ब्रांड के बारे में लोगों में जागरुकता उत्पन्न करने का साधन होते थे, लेकिन जब से कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व अथवा सीएसआर के नाम पर धूर्त एवं मक्कार रास्तों द्वारा वामपंथी एनजीओ छाप गुंडों को सरकारी मदद के साथ-साथ निजी सेक्टर से रंगदारी टैक्स देने का भी रास्ता बनाया गया तब से विज्ञापन जगत में भी वामपंथियों के मक्कार हिंदू विरोधी एजेंडे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

अब विज्ञापन केवल ब्रांड के प्रचार हेतु ही प्रयोग नहीं किए जाते, बल्कि अब उनमें सामाजिक न्याय के पाखंडी वामपंथी योद्धाओं के प्रमुख हथियार अर्थात कुछ वर्गों के फ़र्ज़ी उत्पीड़न की कहानियाँ बुनी जाती हैं और कोई इनका विरोध इसलिए नहीं कर पाता कि उसे सांप्रदायिक, दक्षिणपंथी, दंगाई, फ़सादी, हिंदू आतंकवादी आदि नामों से पुकारा जाएगा।

इन मानवतावादी दिखने वाले विज्ञापनों की तहों के अंदर बड़ी होशियारी से वामपंथ का ज़हरीला संदेश पिरोया गया होता है जो हमें ऊपर से देखने पर भले ही नज़र नहीं आता लेकिन अंदर ही अंदर हमारे अवचेतन मस्तिष्क को वामपंथ के घिनौने हिंदू-विरोधी तथा देशद्रोही एजेंडा का शिकार बनाता चला जाता है।

इसी श्रृंखला में सर्फ़ एक्सेल का एक नया विज्ञापन उल्लेखनीय है जिसे होली के अवसर पर जारी किया गया है और जिसमें घृणित रूप से अबोध बच्चों का इस्तेमाल किया गया है।

ऊपर से देखने पर यह विज्ञापन मासूम सा लगता है जिसमें कुछ शरारती बच्चे होली खेल रहे हैं तथा उनमें से एक बच्ची एक दूसरे बच्चे को इन रंगों से बचाती है।

मैं उम्मीद करता हूं कि आपने विज्ञापन देखा होगा अतः मैं उसके विस्तार में नहीं जाऊंगा, साथ ही यदि आप उस विज्ञापन को देख चुके होंगे तब आपके लिए मेरी बात को समझना ज़्यादा आसान हो जाएगा।

इस विज्ञापन में होली खेलते दिखाए गए बच्चे भारत के बहुसंख्यक अर्थात हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं जो एक अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम बच्चे के ऊपर अपने संकीर्ण विचार तथा त्यौहार थोपते हैं। वहीं तथाकथित प्रतिगामी तथा संकीर्ण विचार ― जैसे भारत माता की जय कहना, राष्ट्रगान के समय खड़े हो जाना, अपनी सेना का सम्मान करना, आतंकवाद का विरोध करना इत्यादि.

वामपंथ के नर पिशाच इसी तरह के बहुसंख्यक हिन्दू लोगों को ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ के नाम से बुलाते हैं। देखिए कि कैसे इस विज्ञापन में बड़ी चालाकी से दिखाया गया है कि अपने घरों से रंग भरे गुब्बारे फेकने वाले बच्चे दरअस्ल अपने घर में बैठकर सोशल मीडिया से अपना प्रतिरोध दर्ज करवाने वाले हिंदू हैं। यहाँ गुब्बारों में भरा रंग दरअसल वामपंथियों द्वारा तथाकथित नफ़रत व हिंसा से भरे उन्मादी राष्ट्रवाद का प्रतीक है। वामपंथियों तथा लिबरलों का कहना यही है कि भारत की हिंदू जनता की ऐसी घोर नफ़रत का सामना यहाँ के मुस्लिमों को रोजाना करना पड़ता है।

दूसरी तरफ़ साइकिल पर निकलती उस बच्ची को देखिए। वह इन्हीं तथाकथित सामाजिक न्याय के योद्धा वामपंथी लिबरल लोगों का प्रतीक है जो रंग भरे गुब्बारे फेंक रहे हिंदू वादियों द्वारा फेंके गए सारे गुब्बारे अपने ऊपर झेल लेती है ताकि एक मासूम मुस्लिम बच्चे को इस नफ़रत भरे उन्माद से बचाया जा सके। साथ ही वह उन बच्चों को अर्थात हिंदू वादियों को चुनौती भी देती है कि उनके पास और भी गुब्बारे हों तो वह भी उनका सामना करने को भी तैयार है। वह इन तथाकथित अंधभक्त हिन्दुओं से भयभीत नहीं होती है, वह हिम्मत वाली तथा समझदार लिबरल है। आप समझ रहे हैं न कि एजेंडा कहां जा रहा है?

और इसके बाद वह लिबरल बच्ची इन हिंदूवादी बच्चों के द्वारा प्रयोग किए जा रहे सारे गुब्बारे समाप्त करवा देने के बाद बड़ी चालाकी से एक तरफ़ छुपे हुए उस मुस्लिम बच्चे को बाहर निकालती है। क्या वह मुस्लिम बच्चा कायर है? नहीं, वह भारत की बहुसंख्यक घृणा से भरी हिंदू जनता के त्यौहार से डरा हुआ एक मासूम पीड़ित अल्पसंख्यक व्यक्ति है। वह इन हिन्दुओं के अत्याचार के विरुद्ध अकेला कर भी क्या सकता है?

उसका मज़हब और दीन गंगा-जमुनी तहज़ीब वाली तमाम बकवास से ऊपर है। सबसे पहले उसकी नमाज़ है और साफ़ और बेदाग कपड़ों के साथ पढ़ी गई नमाज़ है, बाक़ी सब तहज़ीब, भाईचारा, अमन इत्यादि जैसा कचरा उसके बाद में आता है। और देखिए, वह होली के दिन नमाज़ पढ़ने बाहर निकला है, कितनी हिम्मत की बात है!

तो इस मुस्लिम बच्चे को उसकी मस्जिद तक हमारी साहसी वामपंथी लिबरल सामाजिक न्याय की योद्धा लड़की लेकर जाती है, और जब वह मस्जिद के अंदर जाने लगता है, तब उससे पहले वह लड़की उससे पूछती है कि क्या वह नमाज़ पढ़ने के बाद होली खेलना चाहेगा? अर्थात उसकी मज़हबी आस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता, बल्कि उससे आज्ञा ली जा सकती है कि क्या वह इस गंगा जमुनी तहजीब को अपनी दया का पात्र बनाना चाहेगा?

और वह बच्चा इसके लिए सहर्ष तैयार हो जाता है क्योंकि वह सांप्रदायिक उन्मादी हिंदुत्व वादियों की तरह बहुसंस्कृतिवाद एवं गंगा जमुनी तहजीब के विरोध में नहीं है! इस प्रकार यह विज्ञापन सिद्ध कर देता है कि यह गंगा-जमुनी तहज़ीब काफ़िर हिंदुओं के लिए तो अनिवार्यतः पालन योग्य दीनी हुक्म है जबकि एक मुस्लिम के लिए केवल एक विकल्प है जिसे वह माने या ना माने उसकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है। और इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा हीरो बनकर कौन उभरता है? भारत के साहसी वामपंथी लिबरल सामाजिक न्याय योद्धाओं की प्रतीक, वह बहादुर बच्ची!

क्या आपको हैरत हो रही है कि कुछ ही पलों में एक विज्ञापन इतने गहरे, कुटिल और धूर्त वामपंथी एजेंडे की इतनी जटिल तहें कैसे समेट सकता है? कम समय में बड़ा सन्देश दे देना ― यही कारण है कि एक 90 सेकेंड के विज्ञापन को बनाने में कई बार 2 घंटे की फ़िल्म बनाने से अधिक पैसा ख़र्च किया जाता है।

और हम सब इस बीच में कहां खड़े हैं, जिनके दिमागों में वामपंथी एजेंडे का कुत्सित ज़हर वही कंपनियां भर रही हैं जो हमें अपना माल बेच कर हमसे ही अपना मुनाफ़ा कमाती हैं? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने का दायित्व मैं आप पर छोड़ता हूँ। धन्यवाद।

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