Wednesday 1 February 2023
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PoliticsIndiaसुपर पावरफुल राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया

सुपर पावरफुल राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया

भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह के मार्फत वसुंधरा को नेता प्रतिपक्ष पद से हटवाकर गुलाब चंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया था

नई दिल्ली— राजस्थान व दिल्ली में इन दिनों चर्चा है कि वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान की मुख्यमंत्री अपने दम पर हुई हैं। वह जब पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं, तब भी उनको हटाने की बहुत कोशिश हुई थी। इस बार भी बहुत कोशिश हो रही है। उनको हटाने की मुहिम चलाने वाले एक किरोड़ी लाल मीणा नाराज होकर 2013 के विधानसभा चुनाव के पहले अलग पार्टी बना लिए थे। लेकिन चुनाव में जमीन पर आ गए। अलग कोई अस्तित्व बनता नहीं देखकर कुछ माह पहले वापस भाजपा में आ गए। वह जिस वसुंधरा को बर्बाद करने की शपथ खाकर अलग हुए थे, उन्हीं को प्रणाम करके बीती ताहि बिसार दे का आग्रह कर, उनकी कृपा से राज्यसभा संसद बने।

इसी तरह से घनश्याम तिवाड़ी भी बहुत समय से वसुंधरा को भाजपा से निकलवाने, मुख्यमंत्री पद से हटवाने के लिए लगे हुए थे। जब उन्होंने देख लिया कि सुपर पावरफुल मोदी व शाह के राज में भी वसुंधरा का बाल बांका नहीं हो रहा है, तो वह खुद पार्टी छोड़ कर चले गए| अपने बेटे से अलग पार्टी बनवा कर उसके सर्वेसर्वा हो गए हैं। उन्होंने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है। चर्चा है कि उनका इस्तीफा वैसे ही पड़ा हुआ है, शाह ने मंजूर नहीं किया है। इसके पहले राज्य में जब अशोक गहलोत की सरकार थी ,तो वसुंधरा राजे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थीं। घनश्याम तिवाड़ी तथा उनको प्रश्रय देने वाले संघ के कुछ पदाधिकारियों व गुलाबचंद कटारिया, किरोड़ी मल मीणा ने वसुंधरा के विरूद्ध अभियान चलाया था।

भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह के मार्फत वसुंधरा को नेता प्रतिपक्ष पद से हटवाकर गुलाब चंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया था। इससे नाराज वसुंधरा ने विधानसभा जाना बंद कर दिया। जब उनको वापस फिर नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया तब विधानसभा गईं। केन्द्र सत्ता व आला कमान के सामने उसके बाद अब अड़ी थीं बसुंधरा और इस बार भी अपनी मनवा कर रहीं। मालूम हो कि कुछ माह पहले राज्य में हुए दो लोकसभा व एक विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशियों के हारने के बाद, भाजपा प्रमुख अमित शाह ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विश्वासपात्र अशोक परनामी को 18 अप्रैल 2018 को राज्य भाजपा अध्यक्ष पद से हटा दिया और केन्द्र में राज्यमंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को उनकी जगह अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर दी गई। लेकिन वसुंधरा के विरोध के कारण, लगभग ढाई माह बीत जाने पर भी शेखावत को अध्यक्ष पद का प्रभार नहीं दिलवा सके।

हालांकि इसके लिए शाह ने वसुंधरा व अन्य नेताओं को दिल्ली बुलाकर कई बार बैठक की। तरह- तरह से दबाव बनाया गया। लेकिन वसुंधरा ने शेखावत के नाम पर सहमति नहीं दी। वसुंधरा ने अपने विश्वासपात्र श्रीचंदकृपलानी का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे चलाया। उसको शाह ने नकार दिया। उसके बाद न शाह का न वसुंधरा का, बीच का रास्ता निकालने के लिए राज्यसभा सांसद, अन्य पिछड़ी जाति के माली मदनलाल सैनी का नाम आगे किया गया। इस पर वसुंधरा राजी हो गईं। मदनलाल सैनी पार्टी के सरल-सहज कार्यकर्ता हैं। दांव-पेंच वाले नहीं हैं। वसुंधरा के विरूद्ध किसी के दबाव में कुछ नहीं करेंगे। वसुंधरा की बात नहीं काटेंगे। कहा जाता है कि राज्य में वसुंधरा की जो पकड़ व हैसियत है, उसके चलते शाह व मोदी को उस नाम को आगे बढ़ाना पड़ा जिस पर वसुंधरा की सहमति हो सके।

इस बारे में राजस्थान भाजपा के एक नेता का कहना है कि सच्चाई यह है कि राजस्थान भाजपा में वसुंधरा का कोई तोड़ नहीं है। उनको हटाकर भाजपा राजस्थान में जीत नहीं सकती। चाहे भाजपा के सुपर पावरफुल कितना भी दम लगा दें ,माइनस वसुंधरा राज्य में विधान सभा नहीं जीत सकते। वजह भी है। वसुंधरा की शादी भरतपुर राजपरिवार में हुई है। जो जाट हैं। राज्य में जाट मतदाता 13% हैं। जो राज्य के 34.34% ओवीसी में से सबसे अधिक हैं। जाट एकजुट होकर वसुंधरा को वोट देते हैं। राज्य में राजपूत मतदाता 8% हैं। वसुंधरा की मां विजया राजे सिंधिया राजपूत थीं।

इसके चलते राजपूत भी इनको मानते हैं। ब्राम्हण मतदाता 7% हैं। इनमें 50% से अधिक ब्राम्हण मतदाता, विशेषकर महिलायें वसुंधरा के प्रभाव में हैं। 8.2% वैश्य / मारवाड़ी मतदाता हैं। इनमें लगभग 70% वसुंधरा से खुश हैं। ओबीसी व अनुसूचित जाति , अनसूचित जनजाति की महिलायें भी वसुंधरा की मुरीद हैं। ये सब वोट वसुंधरा को राजस्थान में अन्य भाजपा नेताओं से बहुत आगे खड़ा कर देता है। यही वजह है कि वसुंधरा राज्य से लेकर केन्द्र तक के किसी हुक्मरान के दबाव में न तो पहले आईं, न ही अब आ रही हैं। इसके कारण उनको मुख्यमंत्री पद से हटवाने, भाजपा में किनारे लगाने के लिए हर तरह का उपक्रम कर रहे नेता व उनके आका कुछ कर नहीं पा रहे हैं, मन मसोसकर रह जा रहे हैं।

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