Friday 17 September 2021
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Sunanda Pushkar Demands Justice

Paavani Bhakta
Chief Editorial Consultant, Sirf , commentator on socio-political issues

As a woman who lives in India, who is as free to receive justice as a man is in this country, imagine my dismay when I hear that Shashi Tharoor has been discharged by a Delhi Court in his late wife’s, the Sunanda Pushkar death case. By a lady special judge no less.

Where are all her friends? All the ones who at that time, albeit reluctantly and in some cases only to the police, laid bare their opinion that Sunanda was disturbed, traumatised and harassed by her husband’s alleged extramarital affair with Pakistani journalist Mehr Tarar. As it was also let out by them that she intended to divulge at a press conference, the truth about the IPL controversy where Tharoor had allegedly misused his ministerial position to ask for a free stake of Rs 700 million in the company Rendezvous Sports World, and that Sunanda was acting just as a proxy for him. She said she was tired of carrying his sins and crimes for him.

Some hours later, on 17 January 2014, she was found dead in her room at the Leela Palace hotel in New Delhi. Tharoor claimed to have found her body when she did not wake up from her sleep in the evening. The body was recovered by Delhi Police and sent for postmortem. And that’s when the story really began.

Initially, she had supposedly committed suicide. Later the cause of death became unnatural as there were several injury marks on her body. The autopsy said she had died of a drug overdose, from where an was ordered to ascertain whether it was murder or suicide. The answers were unsure — was it homicidal, suicidal or accidental?

Eventually, a medical team declared that she died of poisoning.

Then came the Delhi Police’s report that she had been murdered and an FIR was filed in January 2015. In May 2018, Tharoor was charged with abetment to suicide of his wife and marital cruelty under sections 306 and 498A of the Indian Penal Code. He refuted all charges.

Controversy deepened when AIIMS doctor Sudhir Gupta claimed that he was pressured to give a false report in the case. Tharoor’s domestic help alleged that the couple constantly fought and that she had, days before her death, threatened to expose Tharoor and that he would be ‘finished’ after. There was obvious family-fuelled conjecture that the lady suffered from a debilitating disease that required constant medication and that the recovery was not that good. But doctors at KIMS Hospital Trivandrum who had examined her less than a week before her death said that Sunanda had no serious health problems. The whole of Page 3 society of Lutyen’s Delhi kept talking of how there had been trouble in paradise a long time coming. There is an entire trail on social media that glares back with the same facts.

And yet on the 18th of August 2021, this man goes scot-free? Why? Under whose instructions? What is the game being played here? Why has the case been allowed to flounder and the been allowed to roam free regardless?

There are instances where trial courts tend to give such judgments that result in a serious miscarriage of justice. Obviously, that is exactly what has happened here. But now the Delhi Police needs to step up its game. An appeal can, should and must be filed against the judgement. Rumour has it that it may not happen. That this case, like many others, may die a natural death and the secrets may well lie cremated with the late Sunanda Pushkar.

I certainly hope not. Sunanda Pushkar was an emancipated woman. She lived on her own terms, unfortunately, did not die by them. Gregarious, successful, beautiful and shrewdly intelligent, she was a woman you could love or hate, but ignore you certainly could not. Her mistake may have been marriage to the wrong man and be dictated to by people other than herself. Not a crime by any standards and hence she needs to be heard from wherever she is. Her family needs closure, this country needs not to see another murder be covered up by interested, invested parties. Leave alone the fact that there is a quagmire of related crime that lies underfoot that should be uncovered.

Justice for Sunanda Pushkar is the call of the hour. Let us ensure that her death does not go unpunished.

सुनंदा पुष्कर को इंसाफ चाहिए

शशि थरूर बरी हो गए। एक और हत्याकांड पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। हम ऐसा नहीं होने दें।

भारत में रहने वाली एक महिला भी न्याय पाने के लिए उतनी ही स्वतंत्र है जितने इस देश के पुरुष। मेरी निराशा की कल्पना कीजिए जब मैंने सुना कि दिल्ली की एक अदालत ने शशि थरूर को उनकी दिवंगत पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में बरी कर दिया है। वह भी किसी विशेष न्यायाधीश द्वारा जो खुद एक महिला हैं। कहां हैं उनके सारे दोस्त? वे सभी जिन्होंने अनिच्छा से और कुछ ने तो केवल पुलिस के सामने ही सही बताया तो था कि सुनंदा अपने पति के पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के साथ कथित विवाहेतर संबंध से परेशान, आहत और दुखी थीं। उन्होने यह भी बताया था कि सुनंदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आईपीएल विवाद की पूरी पोल-पट्टी खोलना चाहती थीं कि कैसे थरूर ने कथित तौर पर अपने मंत्री पद का दुरुपयोग करके रॉन्डेवू स्पोर्ट्स वर्ल्ड कंपनी में 70 करोड़ की मुफ्त हिस्सेदारी पाने की कोशिश की थी और सुनंदा तो उनके लिए बस एक प्रॉक्सी के रूप में काम कर रही थीं। उन्होंने यह भी बताया था कि थरूर के पापों और अपराधों का बोझ उठाते-उठाते सुनंदा थक चुकी थीं।

शुरू में ऐसा लग रहा था कि उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। बाद में मौत की वजह अस्वाभाविक लगने लगी क्योंकि उनके शरीर पर चोट के कई निशान थे। शव परीक्षण (ऑटोप्सी) में कहा गया कि उनकी मौत ड्रग ओवरडोज या नींद की दवा के जरूरत से ज्यादा सेवन के कारण हुई थी। इसके बाद यह पता लगाने के लिए जांच के आदेश दिए गए कि यह हत्या थी या आत्महत्या. तब पक्के तौर पर बताना मुश्किल था कि यह हत्या थी, या आत्महत्या या फिर आकस्मिक मौत? अंततः, एक मेडिकल टीम ने स्पष्ट किया कि उनकी मौत जहर से हुई है।

फिर दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट आई कि उनकी हत्या की गई थी और जनवरी 2015 में एक प्राथमिकी दर्ज की गई। मई 2018 में थरूर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 498 ए के तहत अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने और वैवाहिक क्रूरता के आरोप लगाए गए थे। थरूर ने सभी आरोपों का खंडन किया था।
विवाद तब और गहरा गया जब एम्स के डॉक्टर सुधीर गुप्ता ने दावा किया कि उन पर मामले में झूठी रिपोर्ट देने का दबाव डाला गया। थरूर की घरेलू नौकरानी ने बताया था कि पति-पत्नी में आए दिन झगड़े होते रहते थे और सुनंदा ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले थरूर को बेनकाब करने की धमकी दी थी और कहा था कि इसके बाद थरूर का सारा खेल ‘खत्म’ हो जाएगा। एक अफवाह उड़ाई गई कि सुनंदा किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित थीं जिसके लिए उन्हें निरंतर दवा लेनी होती थी और उनकी सेहत में संतोषजनक सुधार नहीं हो रहा था। लेकिन उनकी मृत्यु से एक सप्ताह से भी कम समय पहले उनकी जांच करने वाले तिरुवनंतपुरम के केआईएमएस अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि सुनंदा को कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं थी। लुटियन की दिल्ली की पूरी पेज 3 सोसायटी में यह खुसफुसाहट होती रही कि कैसे लंबे समय के बाद उनकी जन्नत में मुसीबत ने दस्तक दी है। सोशल मीडिया पर भी इसी तरह के कथ्य छाए रहे।

और फिर भी 18 अगस्त 2021 को यह व्यक्ति बरी हो जाता है! क्यों? किसके निर्देश पर? यहां क्या खेल खेला जा रहा है? क्यों इस मामले की लीपापोती हुई और दोषी को आजाद होने का मौका दिया गया?

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ट्रायल कोर्ट ने ऐसे फैसले दिए हैं जिनमें न्याय का गला घोंटा गया है। जाहिर है यहां भी ठीक वैसा ही हुआ है। लेकिन अब दिल्ली पुलिस को और सक्रियता दिखाने की जरूरत है। फैसले के खिलाफ अपील दायर की जा सकती है और ऐसा होना ही चाहिए। लेकिन अफवाहें हैं कि यह नहीं होने जा रहा। कई अन्य मुकदमों की तरह इसकी भी एक स्वाभाविक मौत हो जाएगी और सारे रहस्य दिवंगत सुनंदा पुष्कर के साथ ही खत्म हो जाएंगे।

मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसा नहीं होगा। सुनंदा पुष्कर एक स्वतंत्र महिला थीं। उन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी। दुर्भाग्य से मौत के मामले में वह उतनी खुशकिस्मत नहीं रहीं। मिलनसार, सफल, सुंदर और बुद्धिमान, वह एक ऐसी महिला थीं जिसे आप प्यार या फिर नफरत कर सकते थे, लेकिन अनदेखा तो बिल्कुल नहीं कर सकते थे। हो सकता है कि उनसे एक गलत आदमी से शादी की भूल हो गई हो और वह अपनी मर्जी की जिंदगी न जीकर किसी के हुक्म पर चल रही हों। फिर भी इसे किसी भी लिहाज से अपराध नहीं माना जा सकता और इसलिए वह जहां कहीं भी हैं, उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। इस देश को दोषियों को एक और हत्या पर पर्दा डालने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। यहां केवल एक अपराध नहीं हुआ है, इसकी आड़ में कई अपराधों को ढंकने की कोशिश हुई है। सारे भेद खुलने चाहिए।

सुनंदा पुष्कर के लिए न्याय समय की मांग है। आइए हम सुनिश्चित करें कि उनके कातिल बचने न पाएं।

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