Sunday 24 October 2021
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पनडुब्बियाँ भारत की आवश्यकता — न्युक्लियाई व कई सारी

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अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हाल ही में अनावरण किए गए AUKUS त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते में मुख्यतः इस बात पर बल दिया गया है कि कैनबरा को परमाणु-संचालित पनडुब्बियाँ चाहिएँ। यह स्पष्ट रूप से भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन के समुद्री युद्ध का मुक़ाबला करने के उद्देश्य से है। वास्तव में चीन पर नज़र जमाए रखने के साथ-साथ आने वाले दशकों के सामरिक-सैन्य शक्ति प्रदर्शन नौसैनिक शक्ति पर आधारित होंगे जिसमें पनडुब्बियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। पनडुब्बियाँ अपनी लंबी दूरी, शांत विचरण, अचूक निशाने और बल प्रक्षेपण क्षमताओं को देखते हुए विषम सैन्य परिदृश्यों में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। स्मरण हो कि 1971 के युद्ध में मूलतः भारतीय नेवी की अरब सागर पर हरकत के कारण रावलपिंडी से दुश्मन की सेना तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान तक सैनिक, बारूद और असला नहीं पहुँचा पाई। परमाणु पनडुब्बियों के साथ इन कारकों को और गुणा किया जाता है, जिससे नेवी लंबी परिचालन अवधि की क्षमता प्राप्त करती है। यही कारण है कि बीजिंग की सैन्य धमकी का ख़ामियाज़ा भुगतने वाले सिंगापुर और इंडोनेशिया से लेकर जापान और ताइवान तक के देश चीनी आक्रमण का मुक़ाबला करने के लिए तेज़ी से पनडुब्बियों को शामिल कर रहे हैं। निराशाजनक रूप से, भारत के पानी के नीचे के बेड़े में अपेक्षित ताक़त की कमी बरक़रार है और इस चिंता से कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है कि उच्च समुद्र ही एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ भारत चीन को उसके प्राकृतिक भौगोलिक लाभों के मद्देनज़र रोक सकता है। आज भारतीय नौसेना के पास 12 पुरानी डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियाँ हैं, जिनमें से केवल आधी ही किसी भी समय युद्ध में उतारने की स्थिति में होती हैं। इसके अतिरिक्त बल ने छह अनुमानित फ्रेंच स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में से केवल तीन को शामिल किया है और परमाणु-वारहेड युक्त बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ केवल एक परमाणु शक्ति वाली पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत है। इसके विपरीत चीन के पास पहले से ही 350 युद्धपोतों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है, जिसमें 50 पारंपरिक और 10 परमाणु पनडुब्बी शामिल हैं। जब तक नौसैनिक कौशल में इस अंतर को जल्दी से कम नहीं किया जाता है, तब तक नई दिल्ली हिंद महासागर पर हावी होने की बीजिंग की महत्त्वाकांक्षा का जवाब देने में असमर्थ साबित होगी। संयोग से रक्षा अधिग्रहण परिषद ने जून में छह नई पारंपरिक गोपनीय पनडुब्बियों के निर्माण के लिए परियोजना P-75I के लिए मंज़ूरी दी थी जब इसे नवंबर 2007 में आवश्यकतानुरूप स्वीकृति दी गई थी। योजना के अनुसार भारत के पास कम से कम 18 पारंपरिक पनडुब्बियाँ, छह परमाणु हमला पनडुब्बियाँ और चार परमाणु पनडुब्बी परमाणु मिसाइलों के साथ होनी चाहिएँ। देश उस लक्ष्य के क़रीब कहीं नहीं हैं। यदि भारत को क्वाड और उसकी इंडो-पैसिफिक महत्वाकांक्षाओं पर बात करनी है तो रक्षा नौकरशाही को और चुस्त होना पड़ेगा।

हाल ही में हुए फ़्रांस से साथ बहुआयामी समझौते के तहत भारत में सुरक्षा की तैयारी को एक नई दिशा मिली है। यहाँ ध्यान देने वाले दो विषय हैं। पहला यह कि हालांकि रूस पर हमारी निर्भरता कम हो गई है, कई अस्त्र-शस्त्र रूस के अमेरिकी साज़-ओ-सामान से बेहतर माने जाते हैं। दूसरा यह कि फ़्रांस AUKUS त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते से नाराज़ है क्योंकि जिस समय वह ऑस्ट्रेलिया से अपनी पनडुब्बियाँ बेचने के लिए वार्ता कर रहा था, उसी समय अमेरिका ने अपने NATO सहयोगी से विश्वासघात किया और अपना महंगा माल बेच आया। जो बाइडन सरकार के साथ स्कॉट मॉरिसन सरकार के व्यवसाय से यह निष्कर्ष बिल्कुल नहीं निकालना चाहिए कि डेमोक्रैट्स चीन के उतने ही बड़े दुश्मन हैं जितने कि रिपब्लिकन्स। अमेरिका के तंत्र पर हथियार बनाने वाली कम्पनियाँ हमेशा हावी रहती हैं और उन्हीं बनियों के दबाव में यह डील हुई है। ऐसे में आहत फ़्रांस अन्य देशों को बेहतर प्रौद्योगिकी के सामान उत्पादन लाइसंस के साथ निर्यात करने को तत्पर होगा। इसका लाभ भारत को उठाना चाहिए। वायु सेना में पर्याप्त युद्धविमान की कमी की बात करते-करते राफ़ाल देश को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार सरकार पर जल सेना की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु दबाव बनाए रखने पर सकारात्मक परिणाम दृष्टिगोचर होंगे।

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