1930 के दशक के मध्य में यूरोप में अपने प्रवास के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने न सिर्फ अपना इलाज करवाया बल्कि उन्होंने यूरोप में कई देशों की यात्राएँ भी कीं ताकि वो आज़ादी के संघर्ष को विदेशों में भी फैला सकें। साथ ही उन्होंने अपनी पुस्तक इंडियन स्ट्रगल (1920-1934) लिखी जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने बैन (निषेध) कर दिया। अपने इन कार्यों से सुभाष बाबू भारत के साथ-साथ दुनिया भर में मशहूर हो गए थे। इससे प्रभावित होकर मोहनदास करमचंद गांधी ने सुभाष चंद्र बोस को 1938 के कांग्रेस का राष्ट्राध्यक्ष घोषित कर दिया था। ध्यान रहे कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गांधी द्वारा सुभाष को राष्ट्राध्यक्ष बनाए जाने का विरोध किया था, मगर गांधी ने पटेल की आपत्ति को ख़ारिज कर दिया था। भारत लौटने पर नेताजी ने इसके लिए गांधी का आभार प्रकट किया।

हरिपुरा में हुए सालाना कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस का प्रथम अध्यक्षीय भाषण सुन गांधी की त्योरियाँ चढ़ गयी थीं। इसके बाद गांधी व सुभाष के सम्बन्ध कभी मधुर नहीं हो सके थे। 1939 के आते-आते गांधी को उनके बारे में व उनकी कार्यशैली के बारे में बोस द्वारा इंडियन स्ट्रगल में लिखित टिप्पणियों का पता चल गया था। वह तब और भी निराश हुए थे जब उन्हें किसी ने बॉम्बे में अंग्रेज़ों के गुप्तचर विभाग की फ़ाइल दिखाई जिसमें यह विवरण था कि कैसे सुभाष बाबू को जर्मनी और जापान के दूतों से मिलते हुए देखा गया था। अब तो गांधी ने निश्चय कर लिया था कि वो सुभाष को अगले साल कांग्रेस का राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनने देंगे। भले ही तब सुभाष ने, बतौर राष्ट्राध्यक्ष, देश का पहला राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन आयोजित किया हो या देश का पहला योजना आयोग बनाया हो (जिसका अध्यक्ष सुभाष ने जवाहरलाल नेहरू को बनाया था)।

Subhas Chandra Bose with Gandhi and Patel
मोहनदास करमचंद गांधी तथा वल्लभभाई पटेल के साथ सुभाष चन्द्र बोस

गांधी के पोते व देवदास गांधी के पुत्र राजमोहन गांधी ने पटेल पर लिखी जीवनी में उद्धृत किया है कि पटेल ने सुभाष बोस की क्षमता के बारे में अच्छी राय नहीं थी। 1937 में पटेल चाहते थे कि सभी प्रोविंसेस (प्रदेशों) में कांग्रेस को सरकार में बने रहना चाहिए मगर सुभाष की राय थी कि कांग्रेस को सरकार छोड़ देनी चाहिए और ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ देना चाहिए। यह सुझाव पटेल को अनुचित और मूर्खतापूर्ण लगता था। इसके साथ ही राजमोहन गांधी ने लिखा है कि पटेल को लगता था कि सुभाष बाबू गांधी की महत्ता को कम, लगभग नगण्य ही समझते थे।

1938 में भले ही सुभाष अध्यक्ष बन गए हों, राष्ट्राध्यक्ष के कार्यालय का पता कांग्रेस के नियम के हिसाब से उसके निवास के शहर में बनाए जाने के बजाय नेहरू के आनंद भवन इलाहबाद को ही कांग्रेस का मुख्यालय रखा गया। इससे कांग्रेस के कार्यों में देरी होने लगी क्योंकि अध्यक्ष के नाम की कई डाक या तो कलकत्ता भेजी ही नहीं जाती थी या फिर उन्हें आनन्द भवन इलाहबाद से होकर जाना पड़ता था। इस मुद्दे पर जे० बी० कृपलानी का सुभाष बाबू से मतभेद था। कृपलानी कांग्रेस के राष्ट्राध्यक्ष का कार्यालय मात्र 1 साल के लिए कलकत्ता नहीं लाना चाहते थे।

1939 में जब सारा संसार दूसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा था, तब सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस का एक ऐसा राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहते थे जो गर्म दल से हो और अंग्रेज़ों के बुरे दौर में उन पर हावी होकर देश को आज़ाद करवा सके। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन अपने सबसे कमज़ोर दौर में होगा और सिर्फ़ एक गरम दल (लेफ़्ट विंग) का उग्र नेता ही उनके घुटने टिकवा सकता है, यही सोचकर सुभाष या तो खुद पुनः राष्ट्राध्यक्ष बनना चाहते थे या अपनी विचारधारा वाले किसी अन्य को राष्ट्राध्यक्ष बनवाना चाहते थे। परन्तु अहिंसा के पुजारी गांधी को यह मंज़ूर नहीं था कि जिस ताक़त ने देश को ग़ुलाम बना रखा है उसकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया जाए। इसलिए वो नरम दल (राइट विंग) से किसी ऐसे को राष्ट्राध्यक्ष बनवाना चाहते थे जो उनके इशारे पर चले। इधर सुभाष चन्द्र बोस को यह मंज़ूर नहीं था।

कांग्रेस के संविधान के अनुसार कार्यकारिणी समिति को नाम भेजे जाने थे, एक ही नाम पहुँचने पर जिसका नाम भेजा जाता वह बिना लड़े एकमत से जीता हुआ माना जाता है। गांधी के आने के बाद से कार्यकारिणी समिति को सिर्फ़ गांधी द्वारा भेजा हुआ नाम ही मिलता था, कोई भी गांधी के खिलाफ जाकर अपना या किसी और का नाम प्रस्तावित नहीं करता था। वैसे भी गांधी की सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी।

हर बार की तरह इस बार भी गांधी पुनः कांग्रेस पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते थे। उनका सोचना था कि सुभाष जैसे प्रभावी नेता को हटाकर उन्हीं के टक्कर के किसी अन्य प्रभावशाली नेता को ही चुना जाए ताकि सभी प्रतिनिधिगण व जनता उनके फ़ैसले का विरोध करे। या तो वो ख़ुद मैदान में उतरते या सुभाष की ही तरह किसी अन्य प्रभावशाली मगर गांधीवादी नेता को चुनते। यही सोचकर गांधी ने नेहरू से सम्पर्क किया, जो यूरोप के दौरे पर थे। नेहरू ने चुनाव में लड़ने से मना कर दिया और सलाह दी कि अल्पसंख्यक कार्ड चलते हुए, मौलाना आज़ाद का नाम आगे आया।

Subhas Chandra Bose with C Rajagopalachari, Rajendra Prasad and Vallabhai Patel
चक्रवर्ती राजगोपालचारी, राजेंद्र प्रसाद एवम् वल्लभभाई पटेल के साथ सुभाष चन्द्र बोस

राजेंद्र प्रसाद के हिसाब से कांग्रेस में सुभाष चंद्र बोस द्वारा बिताए गए सभी वर्षों में उनके सभी कृत्य कांग्रेस की पुरानी परिपाटी के विपरीत थे। साथ ही राजेंद्र प्रसाद ने सुभाष चन्द्र बोस पर कांग्रेस के अंदर संकट उत्पन्न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि, “ऐसा लगता है कि सुभाष चंद्र बोस शुरू से ही स्वयं का [बतौर राष्ट्राध्यक्ष] अपना पुनर्निर्वाचन चाहते थे। उन्होंने कभी कांग्रेस की कार्यकरिणी समिति से कभी इसका ज़िक्र नहीं किया। यदि अभी भी उन्होंने यह सुझाव गांधीजी व हमारे समक्ष रखा होता तो इस पर विचार किया जा सकता था।”

परन्तु सुभाष चन्द्र बोस के सुझावों को शामिल करने का कभी अवसर ही नहीं आया। राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “जब हम गांधी से बारडोली में मिले तो हमने अनौपचारिक रूप से इस विषय पर पुनः चर्चा की थी जिसमें हम सबने मौलाना आज़ाद का नाम सर्वसम्मति से अनौपचारिक तौर पर सहमति जताई थी। हमने यह बात सुभाष चंद्र बोस को नहीं बताई थी और न ही कभी सुभाष के समक्ष इस मुद्दे को उठाया था। परन्तु हमने सुना था कि जहाँ भी सुभाष जाते हैं वो ख़ुद को पुनः निर्वाचित करवाए जाने की वकालत करते हैं।”

जब सुभाष चंद्र बोस ने कुछ प्रमुख कांग्रेस नेताओं को अपने पक्ष में कर चुनाव करवाए जाने व स्वयं को मत देने हेतु तैयार कर लिया, तब यह जानकर पटेल ने क्षुब्ध होते हुए राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखा कि “मैंने (पटेल ने) स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सुभाष अपने पुनः निर्वाचन के लिए इतना नीचे गिरकर ऐसी घटिया चालें चलेगा।”

सुभाष चंद्र बोस 1938-39 में गरम दल का प्रतिनिधित्व करते थे। सुभाष बाबू व इनके समर्थकों ने प्रचार में नरम दल पर अंग्रेजों से एक गुप्त समझौते का आरोप लगाया जिसके अनुसार केंद्र में वायसराय और आर्मी चीफ के नीचे भारतीयों का संघीय मन्त्रिमण्डल बनाकर कठपुतली सरकार बनाने का विवरण था और इसी समझौते के अनुसार मंत्रियों के नाम तक तय हो चुके थे।

सुभाष चंद्र बोस का प्रचार साम्राज्यवादी विरोध के ख़िलाफ़ समय के साथ तीवर होते प्रगतिशील संघर्ष से उपजे सुझावों, विचारधाराओं, समस्याओं और कार्यक्रमों की बात करता था। साथ ही सुभाष मानते थे कि अभी के राष्ट्राध्यक्ष के चुनाव प्रत्याशियों की नयी विचारधारा व कार्यक्रमों के मध्य होना चाहिए। वहीं शत-प्रतिशत गांधीवादी राजेंद्र प्रसाद का इससे उलट विचार था। राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, जे बी कृपालानी तथा कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के 4 अन्य सदस्यों ने यह साझा बयान जारी किया था कि, “राष्ट्राध्यक्ष के चुनावों को विचारधारा, कार्यक्रम व नीति के आधार पर लड़ा जाना ग़लत है क्योंकि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति व कार्यकारिणी समिति के साथ-साथ कांग्रेस के सभी अंग इन्हीं को आरम्भ से प्रतिपादित करते आ रहे हैं। साथ ही कांग्रेस का राष्ट्राध्यक्ष उस एक संवैधानिक प्रमुख की तरह है जो देश की एकता व अखंडता को चिन्हित करता है।”

गांधी ने मौलाना आज़ाद का नाम चुना था और खुद मौलाना आज़ाद ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार किया था, मगर बॉम्बे जाने के बाद मौलाना ने मना कर दिया। सम्भवतः उन्हें समझ आ गया था कि सुभाष ने अपना नाम वापस नहीं लिया है और ऐसी परिस्थिति में चुनाव होना अवश्यम्भावी है, जिसमें सुभाष के प्रताप के आगे वो नहीं टिक पाएँगे। और इसलिए उन्होंने चुनाव में सुभाष का सामना करने से बचने के लिए अपना नाम वापस ले लिया। इसके बाद गांधी ने जैसे-तैसे पट्टभि सीतारमैया का नाम दिया।

B Pattabhi Sitaramayya
भोगराजू पट्टभि सीतारमैया

सीतारमैया ने अपनी पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन नैशनल कांग्रेस वॉल्यूम द्वितीय (1935 से 1947) में लिखा, “सुभाष बाबू के पुनः राष्ट्राध्यक्ष बनने में कुछ भी गलत नहीं था। लेकिन गांधी चाहते थे कि साम्प्रदायिकता को नियंत्रित करने के लिए [अल्पसंख्यक समुदाय] से मौलाना आज़ाद का चुना जाना ही सही होगा। गांधी ने बारडोली से जाने से पहले मुझसे कहा था कि यदि मौलाना मना करते हैं तो वो ए ताज मेरे (सीतारमैया के) सर पर रखना चाहेंगे। तब तक मीडिया में राष्ट्राध्यक्ष बनने के लिए तीन प्रत्याशियों के नाम आ गए थे – सुभाष, मौलाना आज़ाद और सीतारमैया।”

जब मौलाना आज़ाद ने अपना नाम वापस ले लिया तो यह सीधे सुभाष चंद्र बोस और सीतारमैया के मध्य का ही चुनावी मुक़ाबला बन गया था। कम से कम इन दोनों में से एक के लिए यह टकराव ग़ैर-इरादतन और अप्रत्याशित था। (सीतारमैया ने यह अंतिम वाक्य अपने लिए ही लिखा था)। सीतारमैया ने चिंतित होकर गांधी से 24 जनवरी 1939 को मिलकर उनके समक्ष संशय ज़ाहिर किया। गांधी ने सीतारमैया को राजी कर, आख़िरकार, उन्हें अपना सिपहेसालार बनाकर चुनाव से चंद दिन पहले ही मैदान में उतार दिया था। सरदार पटेल ने पटना में मौजूद राजेंद्र प्रसाद को सीतारमैया को गांधी का उम्मीदवार बनाए जाने का समाचार तार के द्वारा दिया था।

गांधी की इच्छा के मद्दे-नज़र सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, व जे बी कृपालानी ने सुभाष से अध्यक्ष पद के चुनाव का फैसला वापस लेने का अनुरोध करते हुए कहा, “अभी तक कांग्रेस में बिना चुनावों के [गांधी की सलाह पर] एकमत से राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव होता आया है। सुभाष बाबू! आप एक नया उदहारण प्रस्तुत कर रहे हैं।” उन्होंने सुभाष चंद्र बोस से अपने निर्णय का पुनः अवलोकन करने का अनुरोध किया तथा कहा कि सीतारमैया को एक ही मत से चुने जाने दिया जाए।

सुभाष बाबू ने इस तर्क का खंडन करते हुए पटेल व कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के उनके साथियों से कहा कि उन्हें संगठित रुप से कांग्रेस में किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह गलत होगा।

बोस ने कहा, “यदि राष्ट्राध्यक्ष को प्रतिनिधि सदस्यों के द्वारा मत देकर चुना जाना है, न कि प्रभावशाली सदस्यों के द्वारा, तो क्या सरदार पटेल व अन्य सदस्य अपने व्हिप रद्द कर प्रतिनिधियों को उनकी पसंद के हिसाब से मत देने देंगे?”

सरदार पटेल ने एक सार्वजनिक बयान में कहा था कि “भले ही सुभाष चंद्र बोस जीत जाएँ, कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति उनकी नीतियों का पुनर्निरीक्षण करेगी और आवश्यकता हुई तो उन नीतियों को विटो से रद्द कर दिया जाएगा।

24 जनवरी 1939 को सुभाष चंद्र बोस ने सरदार पटेल को पत्र लिख कर अपील की, “मौलाना द्वारा अपना नाम वापस लिए जाने के बाद सीतारमैया को खड़ा करके कांग्रेस में दो गुट न बनाएँ।” मगर सरदार पटेल नहीं माने व अगले ही दिन नेहरू को पत्र लिख कर उनसे अनुरोध किया कि वो (नेहरू) सुभाष के विरुद्ध बयान जारी करें।

गांधी के कांग्रेस में पदार्पण के बाद, पहली बार किसी ने गांधी की सत्ता को चुनौती दी थी। इसलिए कांग्रेस में कई बरसों के बाद राष्ट्राध्यक्ष पद के लिए चुनावों की घोषणा हुई थी। 1939 का चुनाव जहाँ एक तरफ नरम दल (दक्षिणपंथ यानि राइट विंग) और गरम दल के मध्य सीधा युद्ध था, वहीं यह “गांधी बनाम सुभाष” नामक विचार्द्वन्द का श्रीगणेश था।

जहाँ सीतारमैया को गांधी प्रभाव के कारण 1,377 मत मिले वहीं सुभाष बाबू ने इससे 203 ज्यादा मत यानि 1,580 मत प्राप्त कर अपनी विजय सुनिश्चित की। इस नतीजे से गांधी बहुत आहत हुए व उन्होंने इसे खुद पर निजी हमला माना।

गांधी ने 31 जनवरी 1939 को बयान जारी किया कि “श्री सुभाष चंद्र बोस ने अपने प्रतिद्वंद्वी डॉ० सीतारमैया पर एक निर्णायक विजय प्राप्त की है। मुझे स्वीकार करना होगा कि शुरुआत से ही मैं निश्चित तौर पर उसके पुनर्निर्वाचन के कुछ ऐसे कारणों की वजह से विरुद्ध था जिनके बारे में अब मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता। मैं उसके घोषणापत्र के तथ्यों और तर्कों से सहमत नहीं हूँ। मेरा मानना है कि अपने साथियों के लिए उनके सन्दर्भ अनुचित और महत्त्वहीन हैं। क्योंकि मैंने मौलाना द्वारा अपना नाम वापस लिए जाने के बाद डॉक्टर सीतारमैया को नाम न वापस लेने देने के लिए ज़िम्मेदार हूँ, यह सीतारमैया से ज्यादा मेरी हार है।”

गांधी ने चुनावों में बोगस मतों के डाले जाने का भी अंदेशा जताया था। अपने समर्थकों को सन्देश देते हुए गांधी ने यह भी कहा था, “मुझे सुभाष की जीत पर ख़ुशी है। आख़िरकार सुभाष हमारे राष्ट्र के शत्रु नहीं है। उन्होंने इस राष्ट्र के लिए काफ़ी कष्ट उठाए हैं। उनके विचार से, उनकी नीति सबसे ज़्यादा अग्रवर्ती और विनयपूर्ण है। अल्पमत्त वाले उन्हें केवल शुभकामनाएँ ही दे सकते हैं।”

इसके बाद से ही गांधी व कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति में मौजूद तथाकथित गांधीवादी नेतागण, जिन्हें गांधीगण कहना उचित होगा, सुभाष से नाराज़ हो चले थे। कांग्रेस के उस समय के संविधान के हिसाब से न तो राष्ट्राध्यक्ष को हटाया जा सकता था और न ही प्रतिनिधियों के मतों को उलटाया जा सकता था। इसका मतलब यह था कि भले ही सुभाष जीत गए हों, वो राज नहीं कर सकते थे।

सुभाष चंद्र बोस के अप्रत्याशित रूप से जीतने के बाद सरदार पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र में लिखा था कि “सुभाष के साथ काम करना एकदम असम्भव होगा।”

राजेंद्र प्रसाद के लिए यह विचारधारा का ही मुद्दा था। उनका मानना था कि यह मुक़ाबला गांधी की विचारधारा में विश्वास रखने वालों और गांधी की विचारधारा में विश्वास न रखने वालों के मध्य था। राजेंद्र प्रसाद समेत अन्य गांधीगणों को संदेह था कि पहले से सोची गई सभी चीज़ें बिगड़ जाएँगी जब कांग्रेस का एक नया राष्ट्राध्यक्ष अपने ही कार्यक्रम स्वयं बनाएगा और पूरी संस्था को स्वयं ही चलाएगा।

राजेंद्र प्रसाद दुखी थे कि अपने समूह की पूरी मदद के बाद भी सीतारमैया द्वारा गांधी का प्रतिनिधित्व सही से न करवा पाने से ही नरम दल वाले गांधीगणों की हार हुई है। राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि “यदि मौलाना आज़ाद लड़ने हेतु खड़े होते तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि वो एक बड़े बहुमत से जीतकर वापस आते क्योंकि आम कांग्रेस कार्यकर्त्ता उनको पसंद करता और गांधीवादी कार्यक्रम को नहीं तोड़ता। परन्तु वर्तमान हालात में लोग सीतारमैया में गांधीजी का अक्स नहीं देख सके, जिससे सीतारमैया की हार हुई और सुभाष ने बड़ी जीत दर्ज की।”

31 जनवरी 1939 को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से ही फरवरी 1939 से सुभाष चंद्र बोस बीमार हो गए। उच्च ताप के ज्वर के साथ उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया था।

सुभाष चंद्र बोस ने जीतने के बाद यह मुद्दा उछाला की “वयस्क रक्षक” (old guard) यानि गांधी अंग्रेज़ों के साथ भारत में एक केंद्रीय संघीय ढाँचे के बारे में साज़िश रच रहे हैं। चुनाव से पहले नरम दल पर लगाए गए आरोप को सुभाष ने पुनः दोहराया कि इन लोगों ने केंद्र में बनने वाली अपनी सरकार के संभावित मंत्रियों की सूचि भी तैयार कर ली है।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि नेहरू ने 1946 में अंग्रेजों के अधीन ठीक ऐसी अंतरिम सरकार कांग्रेस और मुस्लिम लीग का गठबंधन कर बनाई थी व बतौर प्रधानमंत्री इस सरकार की आज़ादी तक अगुवाई की थी, जैसी सरकार बनाने की कोशिश करने सुभाष बाबू ने नरम दल पर 1939 में आरोप लगाया था।

जहाँ एक तरफ अंग्रेज़ों के किंग जॉर्ज के प्रति वफ़ादारी की शपथ न लेनी पड़े, मात्र इसीलिए सुभाष बाबू ने ICS जैसी राजशाही वाली नौकरी छोड़ दी थी, वहीं नेहरू व सभी मंत्रियों ने 1946 में अंग्रेज़ों के किंग जॉर्ज प्रति वफ़ादारी की शपथ लेकर ही अंतरिम सरकार का गठन किया था। (एम ओ मथाई की पुस्तक Reminiscences of Nehru Age) सनद रहे कि 1946 की सरकार के लगभग सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को 1947 में मिली आज़ादी के बाद लगभग उन्हीं पदों पर समाहित किया गया था।

1939 में सुभाष चन्द्र बोस का यह भी आरोप था कि क्योंकि गरम दल वाले गांधीवादी कार्यक्रम और संघीय साजिश की राह का रोड़ा थे इसलिए वो गरम दल से किसी को राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनने देना चाहते थे। उन्होंने घोषणा की थी कि “कांग्रेस में नरम दल और गरम दल के दोनों गुट अब एक दूसरे के ख़िलाफ़ हैं। उन्होंने यह माँग की थी कि अब कांग्रेस को अंग्रेजी हुकूमत को देश को पूर्णतया आज़ाद करने हेतु एक आखिरी चेतावनी दे देनी चाहिए।”

सुभाष बाबू ने अपनी आत्मकथा द इंडियन स्ट्रगल 1920-42 में लिखा, “कांग्रेस के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अंग्रेजों के साथ किसी भी तरह के समझौते के विरोध को मज़बूत करने हेतु मैंने भरसक प्रयत्न किए जिसकी वजह से वो गांधीगण चिढ़ गए थे जो बर्तानिया हुकूमत के साथ समझौता करना चाहते थे। गांधी व गांधीगण अपने संसदीय व मंत्रालय के कामों में किसी प्रकार का अड़ंगा नहीं चाहते थे।”

इसी समय कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति की बैठक वर्धा में होनी थी। सुभाष बाबू ने बीमार होने के कारण पटेल को तार भेजकर इस सभा को कांग्रेस के आगामी अधिवेशन के बाद रखने का आग्रह किया था। कार्यकारिणी का इस तरह का बरताव देखकर सुभाष बाबू ने सीधे गांधी जी से इस वर्तमान हालात के बारे में चर्चा करते हुए पत्र वयवहार किया। इसी दौरान एक तार भेजकर सुभाष बाबू ने गांधी से उनकी इच्छा के अनुसार कार्यकारिणी के सदस्यों को चुनने का अनुरोध किया, मगर गांधी ने कभी इसका उत्तर ही नहीं दिया।

जब कांग्रेस की कार्यकारिणी के वर्तमान सदस्यों को मालूम पड़ा कि सुभाष ने गांधी से कार्यकारिणी के सदस्यों को चुनने का आग्रह किया है तब उनकी नाराज़गी और बढ़ गई। वर्धा की मीटिंग से एक दिन पहले ही तब कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफ़ा दे दिया। सिर्फ़ सुभाष बाबू के बड़े भाई शरत चन्द्र बोस व जवाहर लाल नेहरू ने इस्तीफा नहीं दिया था। शरत चन्द्र बोस सुभाष का समर्थन करते जबकि नेहरू इस समय संशय में थे कि क्या करें?

राजेंद्र प्रसाद, कृपालानी व पटेल आदि गांधीगणों ने बयान जारी किया, “सुभाष बाबू ने [अंग्रेजों के अधीन] संघ की योजना के खिलाफ अपना विरोध जताया है। जबकि यह एक कांग्रेस नीति है जिस पर कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के लगभग सभी सदस्यों ने सहमति जताई है।”

राजेंद्र प्रसाद ने इस्तीफों का कारण देते हुए आत्मकथा में लिखा, “हमने राष्ट्राध्यक्ष से आँखें नहीं मिलाई और हमने सोचा कि बोस को स्वयं नियम बनाने चाहिएं क्योंकि अब भविष्य में उन्होंने व उनके समर्थकों ने ही कांग्रेस का काम चलाना है। और हम उसे कार्यकारिणी समिति में अपनी उपस्थिति से परेशान नहीं करना चाहते थे। साथ ही यह अनुचित होता जब हम सबके सामने सत्र में आधिकारिक प्रस्तावों का विरोध करते। हम बोस को मुक्त रूप से काम करने देना चाहते थे और चाहते थे कि उसे अपने नियम बनाने चाहिएं और अपनी कार्यकारिणी समिति अपने हिसाब से गठित करनी चाहिए। हमें लगा कि हमें लोकतांत्रिक वातावरण बनाए रखना चाहिए।”

जिसमें से सुभाष ने सिर्फ कृपलानी का ही इस्तीफा स्वीकार किया था तथा बाकी लोगों के इस्तीफे उन्होंने स्वीकार नहीं किए थे। बाकी बचे 2 सदस्यों में से एक जवाहरलाल नेहरू खुद थे, जिन्होंने बाद में सुभाष बाबू को लिखा था कि “वो (नेहरू) कुछ समझ नहीं पाए थे कि गांधी और सुभाष में से किसे चुनें?” त्रिपुरी अधिवेशन के बाद नेहरु ने भी अपना इस्तीफा बोस को भेज दिया था।

कांग्रेस का त्रिपुरी अधिवेशन

1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाष बाबू 104 डिग्री फ़ारेनहाइट के तेज बुखार से इतने बीमार हो गए थे कि डॉक्टर ने उन्हें त्रिपुरी जाने से मना कर दिया था। जिद्दी सुभाष को स्ट्रेचर पर लिटाकर एम्बुलेंस में अधिवेशन में लाना पड़ा। गांधी ने नाराजगी दिखाते हुए इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे और राजकोट के प्रिंसली स्टेट में मशहूर “राजकोट सत्याग्रह” में भाग लेने हेतु चले गए थेे। इस सत्याग्रह के दौरान 71 वर्षीय कस्तूरबा को राजकोट के राजा ने धर्मेंद्र पैलेस, ट्राम्बा में नजरबंद कर दिया था।

अधिवेशन सत्र में स्वागत समिति के अध्यक्ष सेठ गोविन्द दास ने अपने भाषण में कांग्रेस के आंतरिक कलह पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि, “जब हमारे सरों पर दूसरे विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे हों, तब हमें एकजुट होकर रहना चाहिए नाकि अपने नेताओं पर ऊँगली उठाकर उनके निर्णयों पर शक करना चाहिए।” देश-प्रदेश के कौने-कौने से आए लोगों ने इस अधिवेशन का गवाह बनने हेतु प्रस्तुत हुए थे और राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान में 52 हाथियों की रैली देखकर अभिभूत हुए थे मगर अफ़सोस यह था कि सुभाष चंद्र बोस राष्ट्राध्यक्ष बनकर भी बीमार होने के कारण इस अभूतपूर्व स्वागत रैली में सम्मान प्राप्त करने हेतु उपस्थित नहीं रह पाए थे।

गांधीवादियों ने सुभाष को कोई सहयोग नहीं दिया। अधिवेशन में और उसके बाद भी सुभाष ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की लेकिन गांधीवादियों ने उनकी एक न मानी। इसके उलट वो सुभाष बाबू का उपहास करने लगे। एक कांग्रेसी नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि, “क्या किसी ने देखा कि कहीं सुभाष चंद्र बोस ने बगल में प्याज तो नहीं छुपा रखा है?” वह भी तब जब सुभाष बाबू अधिवेशन के पहले दिन अध्यक्षीय भाषण देने में असमर्थ थे और सबके सामने मंच पर स्ट्रेचर पर लेटे हुए थे। उन्होंने मौलाना आज़ाद को इस कार्यक्रम का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था जिन्होंने सुभाष द्वारा लिखित में दिया हुआ भाषण पढ़ा था।

इस भाषण का मुख्य अंश था, “कांग्रेस को ब्रिटेन को 6 माह में देश छोड़ने की अंतिम चेतावनी देनी चाहिए और ऐसा ना कर पाने पर एक राष्ट्रवयापी “पूर्ण स्वराज्य” के लिए आंदोलन चलाया जाना चाहिए।” उनकी चेतावनी व सुझाव उस समय अनसुनी कर दी गयी।

राजेन्द्र प्रसाद जैसे बड़े गांधीगण की सोच के उलट पंडित गोविंद वल्लभ पंत ने एक प्रस्ताव पेश किया कि कांग्रेस और देश के समक्ष राष्ट्राध्यक्ष के चुनाव के दौरान प्रकट हुई साजिशों को देखते हुए,यह आवश्यक है कि कांग्रेस को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और अपनी सामान्य नीति घोषित करनी चाहिए जिसके अनुसार यह कांग्रेस उन मूलभूत नीतियों का दृढ़ता से पालन करती है जिन्होंने गांधी के दिशा-निर्देश में कांग्रेस के सभी कार्यक्रम चलाए हैं। साथ ही कांग्रेस की सर्वसम्मति से यही सलाह है कि इन नीतियों कोई कांट-छाट नहीं होनी चाहिए तथा इन्हें भविष्य में हमारा कार्यक्रम चलाना चाहिए। यह कांग्रेस उस कार्यकारिणी समिति में अपना विश्वास वयक्त करती है जिसने पिछले एक साल से काम किया है और इसके किसी भी सदस्य पर आक्षेप पर खेद जताती है।

आने वाले समय में जो विकट परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है, उसमें सिर्फ और सिर्फ गांधी ही कांग्रेस व देश का नेतृत्त्व कर विजय दिलवा सकते हैं। कांग्रेस इसको ध्यान में रखकर अनुरोध करती है कि राष्ट्राध्यक्ष को गांधी की सम्मति से ही कार्यकारिणी के सदस्यों को नामित करना चाहिए।

इसका मतलब यह था कि कांग्रेस का राष्ट्राध्यक्ष स्वयं के विवेकानुसार कोई फैसला करने के बजाए मोहनदास कर्मचन्द गांधी की सहमति से ही कोई भी कार्य करेगा। यह एक सोची समझी चाल थी जिससे गांधी सुभाष से हारकर भी जीत जाएँ। इस प्रस्ताव का सुभाष बाबू के समर्थकों ने, विशेषतया लेफ़्ट विंग के लोगों ने, विरोध किया। सुभाष के समर्थकों ने इस प्रस्ताव में कई बदलावों के लिए कहा और यह भी कहा कि जब तक सुभाष बाबू की तबियत ठीक नहीं हो जाती तब तक इस प्रस्ताव को स्थगित कर दिया जाए। मगर गांधीगणों ने उनकी एक न सुनी क्योंकि यह उन्हें उनका शक्तिप्रदर्शन का अवसर प्रतीत हो रहा था, जिससे वह सदन सुभाष समर्थक और सुभाष विरोधी दो खेमों में बंट गया। क्योंकि कांग्रेस में गुटबाजी बढ़ गयी थी इसलिए सुभाष बाबू ने मोहनदास गांधी को त्रिपुरी आने के दो तार भेजे मगर कोई लाभ नहीं हुआ।

सुभाष समर्थकों में सबसे बड़ा समूह जय प्रकाश नारायण की कम्युनिस्ट सोशलिस्ट पार्टी (CSP) का था, मगर जय प्रकाश नारायण, गांधी की अंग्रेजों को एक अंतिम चेतावनी देने के पक्ष में नहीं थी। वो नेहरु की तरह सोशलिस्ट थे और गांधी के बिना एक बड़े आन्दोलन के पक्ष में तो नहीं थे, कम से कम द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान। वो लोग इस मामले पर निष्पक्ष रहे और सुभाष बाबु के समर्थन में व इस पन्त प्रस्ताव के खिलाफ मत नहीं किया जिससे कि गोविन्द वल्लभ पन्त द्वारा प्रस्तुत विवादस्पद प्रस्ताव 135 विरोधी मतों के मुकाबले 218 मतों से जीत गया। अब सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव जीतकर भी हार गए थे।

सुभाष बाबू के बड़े भाई शरत चन्द्र बोस ने वल्लभभाई पटेल को पत्र लिख कर उन पर कांग्रेस के राष्ट्राध्यक्ष यानि सुभाष के खिलाफ एक अभियान चलाने का दोषी बताया। जब एक बार बोस ने पटेल को “अलोकतांत्रिक” बताया था, तब जवाब में पटेल ने कहा कि, “जंगल में शेर जन्म से पैदा होते हैं, चुनावों में जीतकर नहीं।”

त्रिपुरी अधिवेशन के बाद काफी समय तक सुभाष चंद्र बोस की तबियत खराब रही और वो कई माह बिस्तर पर रहे।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपने भतीजे अमिय नाथ बोस को लिखा, “मुझे निजी से रुप से किसी ने इतना नुकसान नहीं पहुँचाया है जितना मेरा नुकसान जवाहर लाल नेहरु ने किया है। यदि वह हमारे साथ होता तो हम बहुमत से जीतते। लेकिन त्रिपुरी में वो वयस्क रक्षक (ओल्ड गार्ड) के साथ थे। 12 दिग्गजों की गतिविधियों से ज्यादा नुकसान नेहरु ने मेरे खिलाफ प्रचार करके किया है।”

जवाहर लाल नेहरु की तरह अन्य सोशलिस्ट्स भी सुभाष बाबू के खिलाफ थे। जय प्रकाश नारायण ने उनका नेतृत्त्व करते हुए कहा, “हमारी पार्टी (CSP) ने सुभाष चन्द्र बोस के लिए मतदान दिया था, मगर हमने आरम्भ से ही कहा था कि हमारा मत लेफ़्ट विंग और राइट विंग के मध्य विवाद को ख़त्म करने के लिए नहीं है। हमने सीतारमैया के बजाय एक बेहतर उम्मीदवार चुनने के लिए ही सुभाष को चुना था। तब हमने यह कभी नहीं सोचा था कि इससे कांग्रेस में पड़ जाएगी। हम लोग न तो कांग्रेस में झगड़ा चाहते हैं और ना ही इसमें शामिल हैं। मुझे लगता है कि इस झगडे से बचा जा सकता था। हमने इस रोकने के लिए कई प्रयास किया, मगर हम सफल नहीं हो पाए।” जयप्रकाश नारायण ने आगे कहा, “हमने पहले सुभाष बाबू से बयान जारी कर स्थिति साफ़ करने के लिए कहा मगर उनके द्वारा दिया गया बयान संतोषजनक नहीं था। त्रिपुरी आकर हमने दूसरे पक्ष से भी बात की मगर कुछ नहीं हो पाया। हमारा मानना है कि गांधी की सहमति से कार्यकारिणी समिति नियुक्त करके ही कुछ हल निकाला जा सकता है।”

जब बिस्तर पकड़े हुए सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस को गुटबाजी से बचाने हेतु गांधी को निवेदन करते हुए एक पत्र भेजा कि, “आप कांग्रेस की आत्मा हो, आपके बिना कांग्रेस कुछ नहीं कर पाएगी। अभी द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन बहुत कमजोर है, हमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन जैसा एक बड़ा आन्दोलन चलाना चाहिए जिससे आज़ादी जल्दी मिल जाएगी।”

इस पर गांधी ने नाराज़ होकर जवाब भेजा कि, “सुभाष! तुम्हारे व मेरे रास्ते अलग-अलग हैं, बेहतर होगा कि हम दोनों अलग-अलग ही काम करें। मुझे वह आज़ादी नहीं चाहिए जिसकी कीमत ब्रिटेन की तबाही हो। भले ही ब्रिटेन का शासक वर्ग गलत हो मगर इस युद्ध में इसकी निरीह जनता को भी खतरा है। अभी ब्रिटेन को हमारी जरुरत पड़ सकती है, हम उसे मना नहीं कर सकते।

Subhas Chandra Bose after resignation from the post of Congress president
कांग्रेस का अध्यक्ष पद त्यागने के बाद सुभाष

यह पत्र पाकर अपना पक्ष रखने के लिए सुभाष बाबू ने अपने बड़े भाई शरत चन्द्र बोस को गांधी से मिलने भेजा, परन्तु गांधी नहीं माने। अब अख़बारों की मुख्य खबर थी कि कांग्रेस कौन चलाएगा गांधी या सुभाष? क्योंकि उस वक्त बिना गांधी के पूरे देश में चेतना नहीं आ सकती थी, सुभाष चंद्र बोस ने 1939 के अप्रैल में इस्तीफ़ा दे दिया जिसे गांधी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

उसी वर्ष जुलाई में कलकत्ता में एक नया राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया जिसमें कांग्रेस के (गांधी प्रदत्त) राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया। इस अधिवेशन का पहला फैसला सुभाष चंद्र बोस व उनके बड़े भाई शरत चन्द्र बोस का कांग्रेस से 3 साल के लिए निष्कासन था। इसके बाद कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया कि वो द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजी सरकार का हर संभव सहयोग करेगी।

सन्दर्भ

The forgottten rivalry between Patel and Bose

Crisis within the Congress and Preparations for a Final Assault (1939-42)

Collected Works of Sardar Vallabh Bhai Patel, VOL III and Sardar differed with Netaji over Congress policies

Subhas Chandra Bose and Congress Tripuri Session 1939

Wikipedia article, Interim Government of India

Reminiscences of the Nehru Age by MO Mathai

Historic Congress Session at (sic) Tripuri

Who was elected the President of Indian National Congress in the famous Tripuri Session of 1939?