एक बंगाली बाबू ट्रांसफर होकर रानीखेत पहुंचते हैं। वहां आबादी बहुत कम थी। चारों ओर जंगल और पहाड़ थे। सैनिक छावनी के लिए वहां जो नया दफ्तर खुला, उसमें उनकी नियुक्ति हुई थी। तंबू में दफ्तर था। वही निवास भी था। काम-काज कुछ ज्यादा नहीं था। छावनी की योजना का निरीक्षण और पत्र व्यवहार ही कार्य था। एक दिन वे सिपाहियों के साथ पहाड़ी के निर्जन रास्ते से जा रहे थे कि उन्हें सुनाई पड़ा कि कोई उनको पुकार रहा है। पलट कर देखा कि पहाड़ पर एक संन्यासी खड़े हैं। उन्हें बुला रहे हैं। अभी वे कुछ सोच सकें, उससे पहले ही वह संन्यासी उनके सामने आकर खड़ा हो गया। कहा-‘मुझे मालूम था कि तुम इसी रास्ते से जाओगे। अपने आॅफिस का काम पूरा कर मेरी कुटिया में आओ। प्रतीक्षा करूंगा।’ यह 1868 के दिसंबर माह की बात है।

जिस संन्यासी का यहां उल्लेख हुआ है, वे कौन थे? इसे कोई नहीं जानता। उनकी आकृति भी लोककथा का विषय है। एक ही चित्र मिलता है। वह भी रेखाचित्र है। कल्पना से बनाई गई आकृति। आज भारत और दुनिया में जहां भी क्रिया योग के साधक हैं, वे उन्हें महाअवतार बाबा कहते हैं। यह अलौकिक नाम नहीं, नामांतर है। संज्ञा नहीं, विशेषण है। वे ही पहाड़ से उतरकर बंगाली बाबू के रास्ते में खड़े थे। है न यह विचित्र घटना। पर सच है। इसके बारे में सबसे पहले योगानंद परमहंस ने अपनी जीवनी में उल्लेख किया। इससे देश-दुनिया में बात फैल गई। लोग जानने को आतुर हुए। जिनके रास्ते में महाअवतार बाबा आए, वे थे-श्यामाचरण लाहिड़ी। वे अपने ठिकाने पर पहुंचे। वह एक तंबू था। सोचने लगे कि आखिर संन्यासी ने उनको कैसे जाना और खोजा। इतना तो वे जानते ही थे कि गुरु ही वास्तव में शिष्य को खुद खोजता है। मन में असमंजस था कि संन्यासी की कुटिया में जाएं या नहीं। थोड़ी देर ही लगी। वे संन्यासी के दर्शन के लिए पहाड़ चढ़ने लगे। तब उनकी उम्र 40 साल थी। वे गृहस्थ थे। परिवार बनारस में था। अज्ञात आकर्षण से वे पहाड़ के दुर्गम रास्ते पर खिंचते चले गए।

ऐसे अवसर पर जैसा होता है, वही हुआ। जब पहुंचे, तो विस्मय और जिज्ञासा उनकी आंखों में तैर रही थी। संन्यासी ने कहा-‘मैंने ही तुम्हें बुलाया। क्या तुम मुझे पहचान रहे हो?’ तब श्यामाचरण के चेहरे पर अपहचान का भाव था। वे जड़वत उनके सामने खड़े थे। तभी संन्यासी ने उन्हें स्पर्श किया। उससे ही शुरू हुआ श्यामाचरण में रूपातंरण। उन्हें सब कुछ याद आया। पुराण पुरुष योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी की जीवनी में उल्लेख आया है कि ‘श्यामाचरण के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उन्हें अपने पूर्व जन्म के साधनामय जीवन की याद आ जाती है। उनकी समझ में आ गया कि ये महामुनि ही उनके पूर्व जन्म के गुरु हैं।’ श्यामाचरण ने बनारस में साधु-संन्यासीगण को देखा था। उनको संन्यासी जीवन की जानकारी थी। इसलिए वे नए मिले संन्यासी के संबंध में जब तक संदेह रहित नहीं हो गए, तब तक समर्पण नहीं किया। उनसे वहां लंबी बातचीत की। दस दिन बाद दीक्षा ली। यह घटना 1868 की है। दिसंबर मास की। वे रानीखेत के लिए बनारस से 27 नवंबर, 1868 को निकले थे।

यह बात 150 साल पहले की है। तब जंगल बहुत घना रहा होगा। आज की तरह सड़कें नहीं होंगी। पहाड़ के लिए पैदल के मार्ग होंगे। इस समय वहां पहुंचने के लिए यही जानना काफी है कि वह स्थान अल्मोड़ा जिले में है। तलहटी में स्थित द्वारहाट से वहां पहुंचने का रास्ता है। इन दिनों द्वारहाट में योगदा सत्संग का यंत्रीकृत केंद्र भी चलता है, जहां देश-विदेश के साधक आपको मिल जाएंगे। महाअवतार बाबा और श्यामाचरण लाहिड़ी की भेंट कुकुछिना गांव के सात पहाड़ पर हुई थी। वे सात पहाड़ आज भी खड़े हैं। उस अलौकिक कथा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। वे दूर से दिखते हैं। उनमें जो सातवां है, वह सबसे ऊंचा है। उसके शिखर पर एक पठार है। जहां पगडंडियों से अपने पांव चलकर ऊंची चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। तब कहीं जाकर उस आनंददायी पठार के दर्शन होते हैं। वहां एक कुटिया है। एक अन्य स्थान भी है। जो खंडहर का दृश्य उपस्थित करता है। यह देखकर अफसोस की हूक भी मन में उठती है। इसलिए कि ऐसा स्थान, जिसका स्मरण दुनिया भर में किया जाता हो, वह अब तक धरोहर क्यों नहीं बना? उसे सुरक्षित और संरक्षित क्यों नहीं किया गया?

अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर के प्रति ऐसी अक्षम्य उदासनीता किस प्रकार के मानसिक प्रमाद का द्योतक है? यह असंभव सा लगता है कि राज्य सरकार को उस स्थान के विश्वव्यापी महत्व का पता न हो। वह पहाड़ रानीखेत से करीब 20-22 किलोमीटर दूर है। उस क्षेत्र की पर्वत शृंखला को द्रोणगिरि पर्वत के नाम से भी जानते हैं। पर बोलचाल में वह सात पहाड़ ही कहलाता है।

कुकुछिना गांव का नामकरण वहां के लोगों ने कब किया। यह अज्ञात सा है। जो नाम पड़ा, वह चला ही आ रहा है। उसके इतिहास को थोड़ा खरोचने और खोजने से तुरंत पता चलता है कि उस क्षेत्र में कभी कौरवों की सेना आई थी। ठहरी थी। उन्हें अज्ञातवास में रह रहे पांडवों की तलाश थी। इसीलिए गांव वालों ने कौरव सेना को अपनी बोली में कुकुछिना कर दिया। कहना यह है कि वह पूरा क्षेत्र महाभारतकालीन है। वहां पहुंचते ही कोई व्यक्ति अपने को लंबे इतिहास की यात्रा से जुड़ा हुआ पा सकता है। उसे स्मृतियों में सिर्फ गहरे उतर जाना है। उन्हीं स्मृतियों का एक बिंदु है सात पहाड़ का वह स्थान, जहां दीक्षित होकर श्यामाचरण लाहिड़ी पहाड़ से उतरे। महाअवतार बाबा ने उन्हें क्रिया योग की दीक्षा दी। उससे ‘भारत की आध्यात्म-साधना का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ।’

कथा क्रम में ही इस घटना का बार-बार उल्लेख आता है। श्यामाचरण लाहिड़ी रोज अपने आॅफिस का काम पूरा करते थे। उसके बाद गुरु के पास जाकर उनकी देख-रेख में साधना करते थे। कुछ ही दिनों की साधना के पश्चात पूर्व जन्म की संचित योग विभूति का उनमें विकास होने लगा। उसके बिंब उनके ध्यान नेत्र में उभरने लगे। कथा यह भी है कि श्यामाचरण अपने गुरु के सान्निध्य में ही रहना चाहते थे कि एक दिन महाअवतार बाबा ने उनसे कहा कि तुम्हें घर लौट जाना होगा। उनका कहा हुआ इस तरह है-‘तुम्हें गृहस्थ रहकर कठोर साधना का एक आदर्श स्थापित करना है। लोग तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं। उन सभी सद्गृहस्थों को मुक्ति का मार्ग दिखाओगे। इसलिए तुम्हें उनके जीवन में सहज, सरल, आडंबरहीन एवं अल्प समय में ही फलदायी इस योग सधाना का मार्ग प्रशस्त करना होगा।’ यह गुरु का आदेश था। श्यामाचरण लाहिड़ी नहीं चाहते थे कि लौटें, पर आदेश माना। एक भरी-पूरी लहराती नदी की तरह ही वे क्रिया योग की साधना का समस्त तत्व लेकर बनारस लौटे। यह बात है, 15 जनवरी, 1869 की। इस प्रसंग से दो बातें निकलती हैं। महाअवतार बाबा चाहते और उचित समझते तो श्यामाचरण लाहिड़ी को पहले भी बुला लेते। उन्हें दीक्षित करते। लेकिन उन्होंने प्रतीक्षा की। क्यों की? यही जानने और गहरे उतरकर समझने की बात है।

इस बारे में विपुल साहित्य उपलब्ध है। अनेक पुस्तकों में यह प्रसंग विस्तार से वर्णित है। उससे जो कुछ सार निकलता है, वह यह है कि महाअवतार बाबा ने क्रिया योग के पुन: अवतरण के लिए श्यामाचरण लाहिड़ी को पात्र बनाया। जो लुप्त-सुप्त हो गया था, उसे खोजा और जगाया। श्यामाचरण लाहिड़ी उनके साक्षात प्रतिनिधि बने। गौर करने की बात यह है कि एक गृहस्थ को उन्होंने चुना। वह जिसने पिछले जन्म में साधना की थी, लेकिन अधूरी रह गई थी। इससे पुनर्जन्म का सिद्धांत भी स्थापित होता है। संन्यासी नहीं, गृहस्थ ही समाज को बनाता है। एक गृहस्थ क्रिया योगी हो तो समाज में निष्काम भाव की स्थापना और चलन को गति मिल सकती है। यही श्यामाचरण लाहिड़ी ने कर दिखाया। इसीलिए उन्हें योगी लाहिड़ी महाशय के रूप में याद किया जाता है।

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