सपा-बसपा के साथ गठबंधन के कारण पश्चिमी यूपी में रालोद पुनर्जीवित

कैराना में सपा-बसपा समर्थित रालोद की जीत ने भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन बनाने के प्रयासों को बढ़ावा दिया

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लखनऊ — समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन के बाद राष्ट्रीय लोक दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार हासिल करना चाहता है जिसके लिए आगामी लोकसभा चुनाव में वह तीन सीटों पर जीत हासिल करने की कोशिश करेगा।

2014 में बागपत में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह की भाजपा के सत्यपाल सिंह से हार हुई थी। सत्यपाल ने चुनाव से ठीक पहले मुंबई पुलिस आयुक्त के पद से इस्तीफा दे दिया था। नतीजा कई लोगों के लिए अप्रत्याशित था क्योंकि अजीत सिंह 1999 से यह सीट कभी हारे नहीं थे।

उस हार को एक बड़े संकेत के रूप में देखा गया कि भाजपा किस तरह से प्रमुख जाट वोट को अपने पक्ष में कर रही थी। इस बार रालोद के पास सपा और बसपा की मदद से अपने प्रदर्शन में सुधार करके एक बदला लेने का मौका है। जाट वोट तो सुनिश्चित है ही, राजनैतिक विश्लेषक मंजुला उपाध्याय ने कहा।

आरएलडी नेताओं को पिछले साल कैराना लोकसभा उपचुनाव में अपने प्रदर्शन को दोहराने का भरोसा है। उपचुनाव में रालोद 2014 में भाजपा को मिले हुए जाट वोटों को वापस पाने में सफल रहे।

कैराना उपचुनाव के दौरान रालोद नेता जयंत चौधरी का जाटों के लिए नारा था ‘भाजपा की पूँछ नहीं, रालोद की मूछ बनो’। यह आह्वान एक हिट था। चौधरी अपने दादा चरण सिंह के नाम का आह्वान करने और जाटों को उनकी विरासत की याद दिलाने में सफल रहे, आरएलडी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा।

भाजपा सांसद हुकुम सिंह की मृत्यु के बाद कैराना उपचुनाव के दौरान आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन सुर्खियाँ बटोरने वाली लड़ाई में भाजपा को हराने में सफल रहीं।

रालोद प्रत्याशी तबस्सुम को कांग्रेस, सपा और बसपा का समर्थन प्राप्त था।

कैराना को तब बढ़ती बीजेपी के खिलाफ नई-नई विपक्षी एकता के लिए एक परीक्षण मैदान के रूप में देखा गया था। इस जीत ने भगवा पार्टी के खिलाफ एक महागठबंधन को रोकने के लिए विपक्ष के प्रयासों को बढ़ावा दिया।

सांख्यिकीय रूप से आरएलडी के प्रदर्शन में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद गिरावट देखी गई।

जब चरण सिंह की 1987 में मृत्यु हो गई तो भारतीय लोकदल के पास उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 83 विधायक थे। आगे यह संख्या घटती गई और 2017 के विधानसभा चुनावों में घटकर मात्र एक रह गई।

अजीत सिंह के नेतृत्व में रालोद का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2002 में हुआ था जब उसने भाजपा के साथ गठबंधन में 14 विधानसभा सीटें जीती थीं।

2009 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पांच सीटें जीतीं — फिर से भाजपा के साथ गठबंधन में। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान रालोद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और नौ विधानसभा सीटें जीतीं।

2014 के आम चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा क्योंकि यह मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ने में विफल रही और भाजपा इनके वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही।

2014 में लड़ी गई सात सीटों में से पार्टी ने सभी सीटें खो दीं। यहां तक कि पार्टी प्रमुख अजीत सिंह अपनी परंपरागत बागपत सीट पर तीसरे स्थान पर खिसक गए जबकि उनके बेटे जयंत चौधरी बॉलीवुड अभिनेता-राजनीतिज्ञ हेमा मालिनी से हार गए जिन्होंने मथुरा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था।

अमर सिंह, जया प्रदा और राकेश टिकैत सहित अन्य उम्मीदवार भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके और सभी हार गए।

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने कुल 403 सीटों में से 277 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल एक छपरौली सीट जीती थी।

सपा-बसपा के साथ गठबंधन करने के बाद आरएलडी बागपत, मुजफ्फरनगर और मथुरा सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

पार्टी प्रमुख अजीत सिंह के मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ने की संभावना है, लेकिन उनके बेटे जयंत पार्टी की पारंपरिक सीट बागपत से चुनाव लड़ेंगे।

आरएलडी की लोकसभा संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “इस बार समीकरण हमारे पक्ष में हैं। चाहे वोटर मुस्लिम हों, पिछड़े, दलित, जाट या कोई भी अन्य समुदाय, सभी हमारे पक्ष में हैं। किसान भुगतान न होने से नाराज हैं। गन्ना बकाया है।”

सपा एमएलसी राजपाल कश्यप ने गठबंधन सहयोगी के बारे में पूछे जाने पर कहा, “यह विचारधाराओं का गठबंधन है और यह सांप्रदायिक भाजपा को हराने में सफल होगा। हम गठबंधन के उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”