मानवशास्त्र में कहा गया है कि सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर होता है। ऐसी ही एक सभ्यता सोनघाटी सभ्यता भी है, जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। संरक्षण के अभाव में इस सभ्यता के अवशेष भी अब धीरे धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। सोन के किनारे लगभग सौ किलोमीटर की लंबाई में फैली ये सभ्यता आज अपनी उपेक्षा की कहानी कह रही है। जारोदाग, बांदू, अकबरपुर, तुंबा (वनसती), तिलौथू (तुतला), डेहरी-ऑन-सोन, लेरुआ, घरी, अर्जुन बिगहा में पाए गए प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य इस बात के प्रमाण हैं, जो वक्त के थपेड़ों में उपेक्षा की मार सह रहे हैं। विंध्य पर्वत श्रृंखला के आखिरी छोर डेहरी-ऑन-सोन (बिहार) में और हिमालय की तलहटी में स्थित नगीना में भी प्रारंभिक शिवलिंग वाले झारखंडी मंदिरों का होना इस बात की कहानी कहता है कि हजारों किलोमीटर का यह भारतीय भूभाग बौद्धकाल से भी बहुत पहले से नागवंशियों की शैव-संस्कृति का केेंद्र रहा है।

यहीं से शिवलिंग स्वरूप की पूजा का प्रसार दूसरे देशों में भी प्रवासी सभ्यता के साथ प्रसारित होता गया। इन स्थानों का गहन पुरातात्विक सर्वेक्षण करने पर निश्चित रूप से मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न कालखंडों का क्रमबद्ध स्थानीय इतिहास उजागर हो सकता है। जिससे प्राचीन बिहार के प्रागैतिहासिक काल के हजारों साल पहले का प्रामाणिक इतिहास सामने लाया जा सकता है। समाज में जागरूकता और जानकारी के अभाव में समय बीतने के साथ बिखरी पड़ी धरोहरें या तो नष्ट होती रही हैं या फिर पुरा सामग्री का अवैध व्यवसाय करने वाले तस्कर गिरोहों द्वारा चुराई जाती रही हैं। 20वीं सदी के अंतिम दशक के उत्तरार्द्ध में अविभाजित बिहार में सोनघाटी पुरातत्व परिषद ने सोन नदी के किनारे उसके पूर्वी तट (अब झारखंड) पर और फिर पश्चिमी तट (बिहार के रोहतास जिला) पर आरंभिक निरीक्षण कर अनेक पुरातात्विक स्थलों-सामग्रियों की खोज की थी। पुरातत्व परिषद ने स्वतंत्र एवं स्वैच्छिक स्तर पर तुंबा, लेरुआ, घरी, अर्जुन बिगहा, अमरा तालाब (करवंदिया) में बिखरे अमूल्य धरोहरों को चिह्रित करने का काम किया था। इन स्थलों से प्राप्त अनेक पुरातात्विक सामग्री सोनघाटी पुरातत्व परिषद के संरक्षण में अर्जुन बिगहा के माइक्रो संग्रहालय में रखी गई हैं।

इन पुरा सामग्रियों में पत्थर की कुदाल, मृण्यमूर्ति (टेराकोटा), मनके आदि कई हजार साल पुराने प्रागैतिहासिक सभ्यता काल के प्रमाण हैं, तो रिंग-वेल, लंबी-चौड़ी हस्तछाप ईंट, विचित्र प्रस्तरमूर्ति इस बात के साक्ष्य हैं कि ये स्थल हजारों साल पहले नगर सभ्यता का जीवंत रूप था। ये सारे साक्ष्य इसके हजारों साल पुराने जीवन की कहानी कहते हैं। इन स्थानों पर पड़ी पुरातात्विक महत्व की सामग्रियां मौसम व वक्त की मार से हवा-पानी-मिट्टी में मिलकर लगातार नष्ट हो रही हैं। इनके संरक्षण की ओर न तो सरकार या प्रशासन का ध्यान है और न ही जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देने की फुर्सत है। यदि इस पूरे क्षेत्र में समग्र रूप से उत्खनन का काम किया जाये और उससे निकले परिणाम को नव-वैज्ञानिक खोज से जोड़ा जाए, तो बिहार और भारत के इतिहास में ही नहीं, विश्व के मानव सभ्यता इतिहास में भी नया और अहम अध्याय जुड़ सकता है। सोन नदी के अंचल में रोहतास, औरंगाबाद और कैमूर जिले में इस तरह के अनेकों पुरातात्विक प्रमाण बिखरे पड़े हैं। जरूरत इन सबको संरक्षित कर समग्र अध्ययन करने की है ताकि नई दृष्टि और स्थानीय संदर्भ के साथ मानव सभ्यता के इतिहास में एक नये अध्याय का समावेश किया जा सके।

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