आमतौर पर यह देखा जाता है कि एक गरीब सफाई योद्धा की मौत पर कोई रोने वाला भी नहीं होता। ले-देकर उसके घऱ वाले ही आंसू बहा लेते हैं। वह भी जब उन्हें जानकारी मिल जाये तब इनके मरने की खबरें एक दिन आने के बाद अगले दिन से ही कहीं दफन होने लगती हैं। इन बदनसीबों के मरने पर न कोई अफसोस जताता है,न ही ट्वीट करता है। कोई तथाकथित प्रगतिवादी मोमबत्ती परेड भी नहीं निकलता चूंकि मामला किसी बेसहारा गरीब की मौत से जुड़ा हैतो उसे रफा-दफा करना भी आसान होता है। इन गरीबों का न तो कोई सही नाम पता ठेकेदार के पास रहता है न वे घटना के बाद कुछ बताने का कष्ट करते हैं, अब तो शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब किसी सफाई योद्धा के सीवर के भीतर मरने की खबर न आती हो। कितना कष्टप्रद होता होगा जहरीली गैसों को पीकर तड़प–तड़प कर दम घुटने से मौत के घाट उतरना इनके लिए कोई मुआवजे की भी घोषणा नहीं करता। क्यों करेगाआखिर ये किसी के वोट बैंक भी नहीं हैं। सवाल यह भी है कि अभी तक दम घुटने से हो रही मौतों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहेजब देखो किसी भी भूखे-गरीब को सीवर की गन्दगी में उतार देते हैं, पापी किस्म के लोग कभी अपने बच्चों को भी उतार कर देखो सीवर की सफाई एक तकनीकी काम है, मजदूरों का काम हरगिज नहींI प्रशिक्षित लोगों को ही बूट, दस्ताने और आक्सीजन मास्क पहनकर ही सीवर में प्रशिक्षित सफाईकर्मी नीचे उतारे जाने चाहिए, परन्तु इसका शायद ही कहीं पालन किया जाता हो।

दिल्ली महानगर में और लगभग सभी शहरों में सीवरों की सफाई का सारा काम निजी ठेकेदारों के हाथों में है। ठेकेदार गरीब बेरोजगार नौजवानों से ही सीवरों की सफाई करवाते हैं। लगभग दो दशक पहले तकमात्र एक दिल्ली जल बोर्ड में ही 8 हजार स्थायी सीवर सफाई कर्मी थे। अब इनकी संख्या घटकर मात्र दो हजार के आसपास रह गई है। अब ठेकेदार इन गरीब नौजवानों को मौतके मुंह में सीधे बिना प्रशिक्षण और बिना किसी उपकरण (पीपीई यानी पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट) के धकेल रहे हैं। इन्हें आवश्यक उपकरण दिए बगैर ही सीवर सफाई के काम में लगा दिया जाता है। हालाँकि, ठेकेदार पीपीई का पूरा पैसा, जल बोर्ड से बसुलते तो पूरी तरह से हैं, ठेकेदार पैसा कमाने के फेर में मजदूरों की मौत का खेल जारी रखते हैं। इन्हें कोई कुछ कहने वाला भी नहीं है। सरकारी अफसरों के घूस के दर तय हैं, पैसा खिलाते रहो और मजदूरों को मारते रहो पर ये अनर्थ जारी नहीं रह सकता। सफाई मजदूरों को तो अब सरकारी पहल करके इनके वाजिब हक दिलवाने ही होंगे। इन्हें निजी या सरकारी क्षेत्र की जो भी एजेंसियां सीवर या सेप्टिक टैंकों की सफाई के काम के लिए रखती हैउन्हें सुनिश्चित करना होगा कि ये इस काम के लिए पहले से प्रशिक्षित हैं। इन्हें सीवर के भीतर सुरक्षा उपकरणों के साथ ही भेजा जाये। इसके साथ ही इनके कठोर काम को देखते हुए अतिरिक्त भत्ते और सुविधाएं भी मिलें।

केन्द्र और राज्य सरकारों के श्रम मंत्रालयों को चाहिए कि वे सीवर में घुसकर काम करने वाले सफाईकर्मियों के लिए तत्काल एक सेफ़्टी कोड भी लागू करे।इन सीवर के अन्दर कम करने वालों को स्किल्ड यानि कुशल कामगार का दर्जा दिया जाये निश्चित रूप से बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि राजधानी दिल्ली समेत सारे देश भर में सैकड़ों सफाईकर्मी मर रहे हैं। इनके मरने पर इंडिया गेट से लेकर बोट क्लब पर सन्नाटा है। कहीं विरोध में या अफसोस नहीं जताया जा रहा, धरना प्रदर्शन भी नहीं हो रहा है। ये अभागे सफाई कर्मी समाज के अंतिम पाएदान पर खड़े वे कमजोर इंसान हैं जिनकी चर्चा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी करते थे और जिसके लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” की कल्पना की थी जिसे मोदी जी साकार करने में लगे हैं, लेकिन, चोर अफसर और ठेकेदार उसे ध्वस्त कर रहे हैं।

अभी हाल ही मैंने एक सफाई कर्मी सेबात की थी। उसका नाम माने लाल था। वो राजधानी के ओखला क्षेत्र में सीवर सफाई का काम करता है। बता रहा था कि उन्हें नाक तक सीवर के भीतर डूब के काम करना पड़ता है। इस दौरान उनके पास कोई मास्क या दस्ताना तक नहीं होता। कई बार सीवर में काम करते वक्त उनकेमुँह में गंदा बदबूदार पानी चला जाता है। माने लाल को इस काम को करने के बदले में रोज मात्र 250 रुपये की दिहाड़ी मिलती है। यानि मात्र साढ़े सात हजार जबकि दिल्ली राजधानी क्षेत्र में अकुशल मजदूर की मजदूरी 13896 रूपये और कुशल मजदूर की मजदूरी 16858 रूपये 26 दिनों का है, चार दिन साप्ताहिक छुट्टी का अलग सेI अब यह चोरी चाहे सरकारी अफसर कर रहे हों या ठेकेदार उन्हें जेल जाना चाहिए या नहीं वह जानता है कि वह जो काम कर रहा हैउसके चलते उसके कई साथी मर चुके हैंपर वो अपने काम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। काम छोड़ेगातो उसके घर का राशन कहां से आएगायह समझ में नहीं आ रहा है कि जिन्हें सीवर को साफ करने के ठेके मिलते हैंवे बिना कायदे के  उपकरणों के बिना ही अपने मजदूरों को  कैसे काम पर लगा देते हैं। क्या इन ठेकेदारों पर किसी का नियंत्रण नहीं है?

अगर बात दिल्ली की हो तो देश की राजधानी होने के बावजूद यहां पर पिछले दो-तीन सालों के भीतर दर्जनों सफाई योद्धाअपनी जान गंवा बैठे हैं। परमजाल है किअरविंद केजरीवाल सरकार ने इन हादसों को रोकने के लिए कोई ठोस पहल की हो। क्या इन मौतों को रोकने के लिए भी केन्द्र सरकार अवरोध खड़े कर रही हैअरविंद केजरीवाल बात-बात पर केन्द्र सरकार पर दोषारोपण करते हैं कि वो (मोदी सरकार) उन्हें काम नहीं करने दे रही है। जल बोर्ड दिल्ली सरकार के अंतर्गत है। केजरीवाल आख़िरकार क्यों नहीं सुनिश्चित करते किसीवर की सफाई करने वालों को सुरक्षित उपकरण उपलब्ध कराए जातेक्या केजरीवाल ने सीवर सफाई के दौरान मरे परिवारों के संबंध में कभी सोचा हैशायद वे गरीब उनके वोटर नहीं हैं, वे पेट भरने देशभर के गरीब इलाकों से आकर दिल्ली की फुटपाथों या प्लेटफार्मों पर सोते हैं और दिल्ली के धनाढ्य लोगों की सेवा कर गुजारा करते हैं, केजरीवाल ने पिछले वर्ष दिल्ली में सीवर सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए मशीनें उपलब्ध कराने का वादा किया था। उन्होंने हाथ से सीवर व सेप्टिक टैंक की सफाई करने पर प्रतिबंध लगाने की भी घोषणा की थी। वे घोषणाएं करने में तो माहिर है ही लेकिन, वे  अपना वादा पूरा करना भूल गए। वे रोज एफएम रेडियों से लेकर अखबारों में अपनी कथित उपलब्धियों का बखान करते नहीं थकते। पर वे सफाई कर्मियों की अकाल मौतों को  रोकने के उपाय तलाश करने का वक्त नहीं निकाल पाते। क्यों बर्बाद करें अपना वक्त? वे गरीब उन्हें वोट तो दे नहीं सकते।

केजरीवाल ने 7 अगस्त, 2017 को लाजपत नगर में सीवर की सफाई के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया था। क्या उस हादसे के बाद सीवर सफाई के दौरान  मारे गए कर्मियों को भी 10-10 लाख रुपये का मुआवजा मिल गया हैसबको पता है कि  दिल्ली में दुर्घटनाग्रस्त मृतकों के परिजनों को मुआवाजा देने के संबंध में कोई स्पष्ट नीति नहीं है। तब केजरीवाल ने कहा, ‘एक हाई पॉवर कमिटी बनाई जाएगीजो यह सुनिश्चित करेगी कि सफाई कर्मचारियों की मौत जैसी घटना दोबारा न हो।‘  पर तब से अब तक राजधानी में अनेक सफाई कर्मी सीवर की सफाई करते हुए संसार कूच कर गएपर सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठी हुई है।

यह बात समझनी होगी कि सीवर सफाई का काम यूरोप और दूसरे विकसित देशों में भी हो रहा है। लेकिनवहां पर सफाई कर्मी मरते नहीं हैं क्योंकि वहां पर उन्हें आधुनिक यंत्र उपलब्ध करवाए जाते हैं। उन्हें सही ढंग से प्रशिक्षित भी किया जाता है! इसलिए वहां के सफाई कर्मी सुरक्षित रहते हैं। हमारे यहां सफाईकर्मी को मरने के लिए सीवर में भेज दिया जाता है।सीवर में होने वाले सफाई योद्धाओं की मौतों को रोकने का एक ही उपाय समझ आ रहा है कि देश भर के नगर निगमों को सख्त चेतावनी दी जाए कि अगर कोई अफसर किसी सफाईकर्मचारी को बगैर उचित उपकरणों के सीवर की सफाई करने उतारेगा तो उसे नौकरी से तुरंत बर्खास्त कर दिया जाएगा। यही नहींउसे जेल भी भेजा जायेगा और गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलाकर सजा भी होगी। सफाई कर्मी की मौत की स्थित में उस पर हत्या का केस चलेगा। यह तो मान ही लीजिए कि कठोर निर्णय लिए बगैर बात बनने वाली नहीं है।