तो क्या हुआ अगर The Tashkent Files राजनैतिक फ़िल्म है?

परज़ानिया, फ़िराक़, शाहिद, हैदर जैसी हर फ़िल्म एक विशुद्ध राजनैतिक उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म है; और The Tashkent Files उसी सिलसिले की एक अगली कड़ी भर है

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The Tashkent Files

Film review: पूरी ज़िम्मेदारी से कह रहा हूँ, PM Narendra Modi जैसी वाहियात फ़िल्म लोकसभा चुनाव 2019 में नरेन्द्र मोदी का जितना बंटाधार कर सकती थी, उसका 1,000 गुना ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस का The Tashkent Files कर गुज़रेगी। लेकिन विपक्षी दल तथा उनके रणनीतिकार इस बात के आँकलन में व्यापक धोखे के शिकार हो गए और ग़लत फ़िल्म की रिलीज़ रुकवाने के लिए राशन-पानी लेकर सवार हो गए।

फ़िल्म में कोई बड़ा सुपरस्टार (अक्षय-अजय-आमिर-सलमान जैसा कोई ‘बिकाऊ सुपरस्टार’) भले ही नहीं है, कलाकार सब एक से एक धुरंधर हैं — नसीरुद्दीन शाह, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक से लेकर राजेश शर्मा, प्रकाश बेलावड़ी, विश्व मोहन बडोला, मंदिरा बेदी और लंबे अरसे बाद दिखीं पल्लवी जोशी तक। और अंत में 80 के दशक में ‘ग़रीबों के देवता’ रहे मिथुन चक्रवर्ती एक बार फिर से साबित करते हैं कि नॉन-कमर्शियल भूमिकाओं में भी वे बार-बार नेशनल अवॉर्ड यूँ ही कैसे झटक लाते रहे हैं।

The Tashkent Files की ख़ूबियाँ

फ़िल्म के पीछे की गई रिसर्च बेहद ही सशक्त है; मैंने इससे पहले किसी भी हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म में आधिकारिक दस्तावेज़ों, पुस्तक अंशों, दुर्लभ आर्काइव खंगाल कर इकट्ठा किए गए साक्षात्कारों तथा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रमों की वीडियो क्लिप्स का ऐसा इस्तेमाल नहीं देखा जो इसे निश्चित रूप से एक डॉक्युमेंट्री फ़िल्म का फ़ील देता है। किसी ने मुझे बताया था कि विवेक अग्निहोत्री इस विषय पर पिछले 8-10 सालों से शोध कर रहे थे, और जिस बारीकी से एक मंजे हुए वक़ील की तरह इस फ़िल्म के माध्यम से वे सिलसिलेवार तरीक़े से चीज़ें पेश करते हैं, उसे देख कर यह बहुत असंभाव्य नहीं लगता। तथ्यों, अवधारणाओं और सन्देहों के कसे हुए ताने-बाने से बुनी गई यह फ़िल्म अपनी समग्रता में एक पक्ष को ठोस तरीक़े से रखती है।

लेकिन फ़िल्म चूँकि भारतीय राजनीति के इतिहास की एक बेहद सनसनीख़ेज़ घटना — द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु — की परतें खोलने का इरादा रखती है, इसलिए इसके कलेवर में एक भावनात्मक रूखापन और खुरदराहट आ जाते हैं जो इसे देखते वक़्त एक समय के बाद माहौल को भारी और बोझिल बना देता है।

इस जैसी फ़िल्मों को लागत और थिएटर दोनों ही ज़्यादा नहीं मिलते, इसलिए इसकी प्रोडक्शन वैल्यूज़ में वह कमियाँ साफ़ दिखाई देती हैं। विशेष रूप से संगीत इसका बहुत ही कमज़ोर है, और वे गाने न भी होते तो कोई ख़ास नुक़सान नहीं होता। लेकिन मेरे लिए यह देखना काफ़ी विचित्र था कि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद उसकी स्क्रीन पर दी जा रही जानकारियों का स्क्रोल देखने के लिए भी सिनेमा हॉल में सभी दर्शक जमे रहे। जब क्रेडिट्स आना शुरू हुए तभी थिएटर खाली होना शुरू हुआ।

लेकिन इन तमाम ख़ूबियों-कमियों के बावजूद यह कहना बिल्कुल भी ईमानदार नहीं होगा कि यह फ़िल्म किसी राजनैतिक उद्देश्य को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई है। The Tashkent Files अपनी संरचना में ही एक राजनैतिक फ़िल्म है और इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न तीखे होते हुए भी एक पक्ष विशेष की ओर ही उंगलियाँ उठाते हैं। साथ ही इसकी रिलीज़ का समय भी अपने आप में काफ़ी कुछ कहता है। लेकिन इस क़िस्म की फ़िल्म बनाना न तो इस देश में कोई नई बात है और न ही पहली बार की गई कोई शुरुआत। कुछ ही उदाहरण पेश करूँ तो परज़ानिया, फ़िराक़, शाहिद, हैदर जैसी हर फ़िल्म एक विशुद्ध राजनैतिक उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म होती है; और The Tashkent Files भी उसी सिलसिले की एक अगली कड़ी भर है जो न पहली होगी और न ही आख़िरी।

  1. जो इसे प्रोपेगैंडा फ़िल्म मानते हैं उन्हें आक्रोश को भी प्रोपेगैंडा फ़िल्म मानना होगा, परज़ानिया को भी, शाहिद को भी, हैदर को भी, उड़ता पंजाब को भी, और 12 ऑस्कर जीतने वाली गांधी को भी।
  2. चूँकि यह फ़िल्म एक राजनैतिक स्टैंड रखती है, इसलिए इसके राजनैतिक स्टैंड से इत्तफ़ाक़ रखना या न रखना हर इंसान का अपना निजी हक़ है। लेकिन जब आप एक फ़िल्म समीक्षक के तौर पर किसी फ़िल्म को परख रहे होते हैं तब उसके मंतव्य से अधिक उसकी एक कलाकृति के रूप में संरचना तथा क्राफ़्ट का मूल्यांकन करते हैं। मसलन बहुत से लोगों की हैदर के राजनैतिक मंतव्य से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके बेहद उम्दा क्राफ़्ट को कोई भी ख़ारिज नहीं कर सकता।
  3. इसीलिए, यदि The Tashkent Files की राजनीति के प्रति किसी फ़िल्म समीक्षक का विरोध है तो वह एक बिल्कुल अलग बात है, लेकिन सिर्फ़ उस विरोध के कारण इसके क्राफ़्ट को भी कोई फ़िल्म समीक्षक एक या आधा स्टार दे रहा है तो कहना पड़ेगा कि यह उस फ़िल्म समीक्षक की अपने कर्तव्य के प्रति बेईमानी है।

अंत में, अपनी निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अंत तक फ़िल्म बनाना एक बेहद मुश्किल काम है। लेकिन फ़िल्म बनाने से भी मुश्किल काम अगर कोई है, तो वह है हर प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सर्वथा निरपेक्ष भाव से किसी भी फ़िल्म के कंटेंट और क्राफ़्ट का निष्पक्ष मूल्यांकन करना।

जिस दिन आप यह पाएँ कि किसी फ़िल्म की समीक्षा करते समय आपके अंदर का इंसान आपके अंदर के समीक्षक पर हावी हो जाता है, उस दिन यह काम करना छोड़ देना चाहिए। फ़िल्म समीक्षा करना बिल्कुल किसी मरीज़ का सर्जिकल ऑपरेशन करने जैसा है, जिसमें निजी भावनाओं और पसंद-नापसंद या प्रेम-घृणा के लिए नहीं बल्कि वस्तुनिष्ठ आँकलन और सटीक तथा सार्थक चीरफाड़ की दरकार होती है। जो ऐसा निष्पक्ष, संतुलित तथा वस्तुनिष्ठ रवैया ख़ुद में न ला सकें, उन्हें फ़िल्मों का नीम हक़ीम बनने की बजाय फ़िल्म इंडस्ट्री के किसी विभाग में कम्पाउंडर बन जाना चाहिए।