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Friday 15 November 2019
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सिस्टर निवेदिता की शहीदों की माँ से मुलाकात — जो खो गई इतिहास में

एक माँ जिसके तीन बेटे थे, तीनों को अंग्रेजों ने मौत की सजा सुना दी थी. यह मौत नहीं थी. शहादत थी. कलकत्ता तक पहुँच रही थी सब ख़बरें. सब याद है सिस्टर निवेदिता को

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‘क्या कहूँगी जाकर उस माँ से, जिसके तीन बेटे थे और तीनों शहीद हो गए?’

सिस्टर निवेदिता शब्दों को इकठ्ठा कर रही थी, तरतीब दे रही थी। लेकिन कोई शब्द अपने खांचे में बैठने को तैयार नहीं था। आखिर कहेगी क्या सिस्टर निवेदिता?

‘आपके तीनों बेटों की मौत का हमें दुःख है या उनकी शहादत की ख़ुशी है?’

‘नहीं, नहीं। शहीदों की शहादत पर देश खुश हुआ करते हैं, माएं तो तब भी सूनी गोद का मातम मनाती हैं।’

तो फिर? क्या खामोश बैठी रहूंगी इतनी दूर से जाकर? स्वामी जी ने तो खास तौर पर उन्हें भेजा था एक माँ का दुःख कम करने के लिए। लेकिन कुछ भी कम कर सकता है क्या एक माँ का दुःख? जिसके तीन बेटे हों और तीनों को मौत की सजा सुना दी गई हो।

आज सिस्टर निवेदिता को लग रहा था जैसे उन्होंने अपनी क्षमता से बड़ी जिम्मेदारी उठा ली हो। इतना संशय तो तब भी नहीं था जब भारत आने की ठानी थी उन्होंने। तब भी नहीं जब वो आयरलैंड को हमेशा के लिए छोड़ रही थी। सब कुछ तो था उनके पास आयरलैंड में, अपना परिवार, अपना देश, अपना स्कूल, लेकिन एक झटके में सब छोड़ आई थी सिस्टर निवेदिता।

सब कुछ तो ठीक था सिस्टर निवेदिता की जिंदगी में। लेकिन जब स्वामी जी से मिली थी निवेदिता तो एक पल में फैसला लिया था उन्होंने और सब छोड़कर कोलकाता आ गई। लेकिन स्वामी जी से निवेदिता कहाँ मिली थीं? उनसे तो मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल मिली थी, निवेदिता का जन्म तो स्वामी विवेकानंद के हाथों हुआ था जब उन्होंने यह नाम दिया था मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल को। और उसके बाद सब बदल गया निवेदिता की जिंदगी में। एक नई जिंदगी शुरू करने में बहुत मुश्किलें आई थीं। लेकिन आज की इस मुश्किल के सामने सब मुश्किलें छोटी थीं।

एक माँ जिसके तीन बेटे थे, तीनों को अंग्रेजों ने मौत की सजा सुना दी थी। यह मौत नहीं थी। शहादत थी। कलकत्ता तक पहुँच रही थी सब ख़बरें। सब याद है सिस्टर निवेदिता को।

1886 के साल के अंतिम महीने थे वो। पूना शहर प्लेग की चपेट में था। हर घर में कोई न कोई बीमार था। केवल दो महीनो से भी कम समय में लगभग 700 लोग लील लिए थे इस बीमारी ने, सरकारी आंकड़ा 657 था उन दो महीनों का। जो मर गए थे उनके अलावा भी आधा शहर चपेट में आ गया था। बिना किसी उपयुक्त इलाज और रोकथाम के महामारी बढती जा रही थी। लेकिन अंग्रेज सरकार के कानों पर जूं क्यों रेंगती? आखिर यह उनके लिए कोई संकट थोड़े ही था। और जब अंग्रेज अफसरों के लिए संकट बना तो उनकी नींद भी टूटी।

पूना से पलायन कर रहे बहुत से परिवारों में से एक पूना कैंट में गया तो एक अंग्रेज सिपाही को प्लेग हो गया। सिपाही को समय रहते बचा लिया गया। लेकिन कारण की जांच अंग्रेज सरकार को पूना शहर में खींच लाई। जो सरकार 700 लोगों के मरने पर सोई हुई थी वह एक अंग्रेज सिपाही के बीमार भर होने पर जाग गई। तो क्या अब पूना शहर की मुसीबतों का अंत हो जायगा? क्या बीमारों को उचित इलाज मिल जाएगा? अब तो अंग्रेज इस बीमारी को मार ही भगायेंगे, क्योंकि संकट उनके लिए भी है।

लेकिन हुआ क्या? एक कमेटी बना दी गई, अंग्रेज अफसर वाल्टर चार्ल्स रैंड को चेयरमैन बनाकर। खैर यह भी अच्छा शगुन ही माना गया था क्योंकि कमेटी की जिम्मेदारी थी सबको इलाज देना। सब बाशिंदों का मेडिकल चेकअप करके सबको इलाज प्रदान करने का निर्देश दिया गया था कमेटी को। यहाँ तक कि चेकअप के लिए भी ख़ास हिदायत थी कि महिलाओं का चेकअप महिलाए ही करेंगी। सबको इलाज के दौरान अस्पताल में रखा जायगा। शहर में किसी के घर के अन्दर घुसने की इजाजत नहीं थी किसी अंग्रेज सिपाही को।

लेकिन सब हिदायतें कागजों पर लिखी भर रह गई, जब आईसीएस रैंड की अगुवाई में एक टीम पूना शहर में दाखिल हुई। सब सिपाही लोगों की टीम थी। एक भी तो डॉक्टर नहीं था टीम में। तो इलाज कैसे करेंगे? लेकिन वो इलाज करने कहाँ आये थे? उनका मकसद केवल इस बीमारी को कैंट तक न पहुँचने देना था। और तरीके भी नायब निकाले गए थे।

शहर में तमाम आवाजाही बंद कर दी गई थी। किसी भी घर में घुसकर सिपाही किसी का चेकअप करने के बहाने से किसी को भी कपड़े उतारने को मजबूर कर सकते थे, महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया था। घरों में कोई कीमती चीज सुरक्षित नहीं थी। चोरों से बचाव कर सकते थे लेकिन सिपाहियों से कौन बचाता? लाशों को जलाने और दफनाने के लिए सरकारी मंजूरी जरुरी थी। भले ही मंजूरी मिलने तक लाश सड़ जाये और उसके कारण और कितने ही लोगों में बीमारी फ़ैल जाए। परवाह किसे थी? परवाह तो बस इतनी थी कि प्लेग कैंट तक न पहुंचे। उसके लिए सबसे सस्ता तरीका यही निकाला गया था कि इस शहर की सीमाओं को सील करके तब तक इन्तजार किया जाए जब तक यहाँ का हर बाशिंदा मर न जाए। वाह!

इसी तरह चला एक महीना। मरने वालों की संख्या 2,000 से पार हो गई थी। लेकिन भला हो बाल गंगाधर तिलक और गोखले जी का जिन्होंने इसके बारे में अंग्रेज महारानी को लिखा। तब भी अंग्रेज सरकार ने जागने में लगभग एक महीना और लगा दिया। मरने वाले रोज मर रहे थे। केवल प्लेग से नहीं, एक महिला ने अंग्रेज सिपाहियों के द्वारा बलात्कार के बाद ख़ुदकुशी कर ली थी तो कई बाशिंदे घर की महिलाओं के सड़क पर चेकअप का विरोध करने पर गोलियों से भून दिए गए थे। समाज के पढ़े लिखे लोगों ने कमेटी के चेयरमैन के नाते आई।सी।एस। रैंड को न जाने कितनी बार लिखित शिकायतें सौंपी। लेकिन जिसके आदेश पर यह सब हो रहा था वह क्यों कोई एक्शन लेता? रैंड की अकेली जिम्मेदारी प्लेग को कैंट तक न पहुँचने देना थी और वो इसे बखूबी निभा रहा था।

किसी क्रांतिकारी के द्वारा ही तो खबर पहुंची थी सिस्टर निवेदिता तक। अंग्रेज सरकार जागी तो लोगों को इलाज भी मिला। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब मरने के कगार पर बैठे लोगों को भी इलाज से ज्यादा आई।सी।एस। रैंड पर कार्रवाई का इन्तजार था। वो नहीं हुई। उल्टा इस अंग्रेज अफसर की सुरक्षा बढ़ा दी गई। आखिर उसने अपना काम बखूबी जो किया था।

प्लेग तो ख़त्म हो गया था लेकिन एक बगावत शुरू हो गई थी पूना के अन्तःस्थल में। हर कोई बोझिल हवा में सांस ले रहा था। लग रहा था अगर कुछ नहीं किया गया तो जैसे शहर फट पड़ेगा। लेकिन करता कौन? हर जाना माना आदमी तो अपनी सामाजिक छवि के बन्धनों के कारण केवल विरोध भर कर पा रहा था जिस से अंग्रेज सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

तब सामने आये थे चापेकर बंधु। तीन भाई। दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर। साधारण परिवार के साधारण लोग। लेकिन संस्कार साधारण नहीं थे उनके। पिता भजन कीर्तन करते थे तो तीनों भाई पिता की भजन मंडली में संगीत साधना और भक्ति साधना में समय बिताते थे। भगवान के अलावा किसी के सामने झुकना नहीं आता था। तो अब कैसे झुक जाते? आई।सी।एस। रैंड के इस अत्याचार के आगे। और अंग्रेज सरकार भी तो इस अफसर को उसकी गलतियों के लिए दण्डित करने की बजाय पुरुस्कृत कर रही थी।

चापेकर भाइयों के साथ मिशन में एक और मित्र ने आने की इच्छा जाहिर की। अभी स्कूल में ही तो पढ़ रहा था वह! लेकिन मना नहीं कर पाए चापेकर भाई। तीन महीने तक लगातार मेहनत के बाद भी रैंड की सुरक्षा व्यवस्था में एक छेद तक ढूँढने में सफलता नहीं मिली थी चापेकर भाइयों को। लेकिन सुलगते शहर की छाती पर बदले की शीतल फुहार डालने का जो प्रण लिया था उसे कैसे छोड़ देते। तीनों भाई लगातार आई।सी।एस। रैंड की परछाई बने रहे। बस एक मौका मिले।

मौका मिला। 22 जून 1897 को। रानी विक्टोरिया की ताजपोशी की गोल्डन जुबली थी। गणेशखिंड रोड (आज का सेनापति बापट रोड) से जाने वाला था रैंड। बालकृष्ण और वासुदेव को जिम्मेदारी मिली थी रैंड को खत्म करने की। जब गवर्नर हाउस से निकला रैंड तो दामोदर की निगाहें टिकी हुई थी उस की बग्घी पर। पीले बंगले के पीछे छिपे बालकृष्ण और वासुदेव इन्तजार कर रहे थे अपने शिकार का। बस दामोदर के इशारे की देर थी। “गोंड्या आला रे” यही तो इशारा था।

‘धांय! धांय!’

दो गोलियां चली। दो शरीर गिरे। आईसीएस रैंड और उसका सुरक्षा अधिकारी लेफ्टिनेंट आयेर्स्ट। मौके पर ही मर गया था सुरक्षा अधिकारी और रैंड ने मरने में 11 दिन लगा दिए। 03 जुलाई 1897 को पूरा हुआ पुणे का बदला। रैंड की आखिरी सांस के साथ। दामोदर हरि ने गर्व के साथ जिम्मेदारी ली थी इस काण्ड की और अप्रैल 1898 में फांसी पर झूल गए। लेकिन बाकी दोनों भाइयों को नहीं पकड़ पाई थी पुलिस। उनका स्वतंत्रता संग्राम अभी जारी था, वे युद्ध के मैदान में थे। अंततः एक साथी की मुखबिरी की भेंट चढ़े और मई 1899 में फांसी पर। लेकिन एक शिकन भी नहीं थी किसी के चेहरे पर।

एक ही परिवार के तीन सदस्य। तीनों भाई। तो क्या बीतेगी माँ पर। और आज सिस्टर निवेदिता को मिली थी उनके दर्द पर मरहम लगाने की जिम्मेदारी। लेकिन सिस्टर निवेदिता पहली बार खुद को कमजोर महसूस कर रही थी। कैसे निभाएंगी वो ये जिम्मेदारी?

घर की दहलीज पर कदम रखा तो शरीर कांप रहा था सिस्टर निवेदिता का। सामने चूल्हे में आग जला रही थी एक औरत। उम्र से अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि यही है वह वीर प्रसूता माँ। द्वारका। सिस्टर निवेदिता के चेहरे को देखकर चौंकी थी द्वारका माँ। एक अंग्रेज औरत? लेकिन सूती सफ़ेद साडी ने चुगली कर दी थी कि यह भी कोई भारत के लिए लड़ने वाली आत्मा ही है। पैर तो छुए निवेदिता ने लेकिन कुछ कह नहीं पाई सांत्वना के लिए।

द्वारका माँ भी कहाँ कुछ बोली थी। बस हाथ पकड़ कर चौके में ही बिठा लिया था। कुछ देर तक भयानक ख़ामोशी फैली रही दोनों के बीच। बस अपना परिचय दे पाई थी सिस्टर निवेदिता “स्वामी विवेकानंद की शिष्य हूँ।” और कोई परिचय बचा भी तो नहीं था। यह भी नहीं कह पाई कि स्वामी विवेकानंद ने अपनी सांत्वना भेजी हैं। किस काम की थी स्वामी जी की सांत्वना इस बूढी माँ के।

आलू की सब्जी मिट्टी के बर्तन में आई और द्वारका माँ ने इशारा किया तो चुपचाप खाने लगी सिस्टर निवेदिता।
“दामोदर और बालकृष्ण को बहुत पसंद थी आलू की पानी वाली सब्जी।”

दो आंसू लुढ़क गए द्वारका माँ की आँखों से। सिस्टर निवेदिता उसी दर्द में बह गई। बस गले लग गई द्वारका माँ से। और क्या सांत्वना देती एक माँ को? हिचकियों में रोने लगी थी द्वारका माँ। परिवार के तीन जवान सदस्य चले गए थे। कितनी अकेली हो गई थी वो। अकेलापन रोने भी तो नहीं देता था।

“माँ! आप दुःख न करें। आप के बेटे देश के लिए…” चलते समय बात भी पूरी नहीं कर पा रही थी सिस्टर निवेदिता।

द्वारका माँ ने अपने हाथ में ले ली थी बातचीत की डोरी “स्वामी जी से कहना मैं बहुत रोती हूँ। लेकिन मेरे रोने का कारण केवल यह है कि मुझे पता नहीं था कि मेरे तीनों बेटे देश के लिए जान देंगे। पता होता तो मैं सात बेटे पैदा करती। तीन ही बेटे थे। बस उतना ही योगदान दे पाई। काश! सात होते।”

हौसला देने आई थी सिस्टर निवेदिता। हौसला लेकर वापस चली थी।

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Satish Sharmahttp://thesatishsharma.com/
Chartered accountant, independent columnist in newspapers, former editor of Awaz Aapki, activist in Anna Andolan, based in Roorkee

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