ये भजंति च तं प्रीत्या शक्तीशं शंकरं सदा।।
तस्मै शक्तित्रयं शंभुः स ददाति सदाव्ययम्।।
तस्यैव भजनाज्जीवो मृत्युं जयति निर्भयः।।
तस्मान्मृत्युंजयन्नाम प्रसिद्धम्भुवनत्रये।।

— शिवपुराण, रुद्रसंहिता, अध्याय 28

जो लोग सदा प्रेमपूर्वक शक्ति के स्वामी भगवान शंकर का भजन करते हैं, उन्हें भगवान शम्भु प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति — ये तीनों अक्षय शक्तियाँ प्रदान करते है। भगवान शिव के भजन से ही जीव मृत्यु को जीत लेता और निर्भय हो जाता है। इसलिये तीनो लोकों में उनका ‘मृत्युंजय’ नाम प्रसिद्ध है। उन्हीं के अनुग्रह से विष्णु विष्णुत्व को, ब्रह्मा ब्रह्मत्व को और देवता देवत्व को प्राप्त हुए है।

महाशिवपुराण के रुद्रसंहिता, सतीखण्ड के 38वे अध्याय में शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजय विद्या के प्रवर्तक शुक्राचार्य दधीचि को महामृत्युंजय मंत्र का उपदेश देते हैं।

त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम्। त्रिमंडलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्।।

त्र्यम्बकं यजामहे” हम त्रिलोकी के पिता, तीन नेत्र वाले, तीनों मण्डलों (सूर्य, सोम और अग्नि) के पिता तथा तीनो गुणों (सत्व, रज तम) के स्वामी महेश्वर का पूजन करते हैं।

त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः। त्रिदिवस्य त्रिबाहोश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।।
त्रिदेवस्य महादेवस्सुगंधि पुष्टिवर्द्धनम्। सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणेषु कृतौ यथा।।
इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च। पुष्पे सुगंधिवत्सूरस्सुगंधिममरेश्वरः।।

जो त्रितत्व (आत्मतत्व, विद्यातत्व और शिवतत्व) त्रिवह्नि (आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि) तथा पृथ्वी, जल और तेज इन तीनों भूतों के एवं जो त्रिदिव (स्वर्ग) त्रिबाहु तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनो देवताओं के महान ईश्वर महादेव जी हैं। “सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्” जैसे फूलों में उत्तम गंध होती है, उसी प्रकार भगवान शिव सम्पूर्ण भूतों में, तीनो गुणों में, समस्त कृत्यों में, इंद्रियों में, अन्यान्न देवो में और गणों में उनके प्रकाशक सारभूत आत्मा के रूप में व्याप्त हैं, अतएव सम्पूर्ण सुगंधयुक्त एवम सम्पूर्ण देवताओं के ईश्वर हैं।

पुष्टिश्च प्रकृतेर्यस्मात्पुरुषाद्वै द्विजोत्तम। महदादिविशेषांतविकल्पश्चापि सुव्रत।।
विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने। इन्द्रियस्य च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्द्धनः।।

जिन महापुरुष से प्रकृति की पुष्टि होती है, महत तत्त्व से लिकर विशेष पर्यन्त विकल्प के जो स्वरुप हैं, जो विष्णु, पितामह, मुनिगणों एवं इंद्रियोंसहित समस्त देवताओं की पुष्टि का वर्धन करते हैं, इसीलिए वे ही पुष्टिवर्धन हैं।

तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसापि वा। स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च प्रजापते।।

वे देव रूद्र अमृतस्वरूप हैं। जो पुण्यकर्म से, तपस्या से, स्वाध्याय से, योग से अथवा ध्यान से उनकी आराधना करता है, उसे वे प्राप्त हो जाते हैं।

सत्येनान्येन सूक्ष्माग्रान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्। वंधमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः।।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात्” जिस प्रकार ककड़ी का पौधा अपने फल से स्वयं ही लता को बंधन में बाँधे रखता है और पाक जाने पर स्वयं ही उसे बन्धन से मुक्त कर देता है, ठीक उसी प्रकार बन्धमोक्षकारी प्रभु सदाशिव अपने सत्य से जगत के समस्त प्राणियों को मृत्यु के पाशरूप सूक्ष्म बंधन से छुड़ा देते हैं।

मृतसंजीवनीमन्त्रो मम सर्वोत्तमः स्मृतः। एवं जपपरः प्रीत्या नियमेन शिवं स्मरन्।।

यह मृतसंजीवनी मंत्र है, जो मेरे मत से सर्वोत्तम है, हे दधीचि! आप मेरे द्वारा दिए गए इस मंत्र का शिवध्यानपरायण होकर नियम से जप कीजिये।

जप्त्वा हुत्वाभिमंत्र्यैव जलं पिब दिवानिशम्। शिवस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं क्वचित्।।

जप और हवन भी इसी मन्त्र से करें और इसी मन्त्र से अभिमंत्रित दिन और रात में जल भी पीजिये तथा शिव-विग्रह के पास स्थित हो उन्हीं का ध्यान करते रहिये, इससे कभी मृत्यु का भय नहीं रहता।

कृत्वा न्यासादिकं सर्वं संपूज्य विधिवच्छिवम्। संविधायेदं निर्व्यग्रश्शंकरं भक्तवत्सलम्।।

सब न्यास आदि करके विधिवत शिव की पूजा करके व्यग्रतारहित हो भक्तवत्सल सदाशिव का ध्यान करें।

ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि यथा ध्यात्वा जपन्मनुम्। सिद्ध मन्त्रो भवेद्धीमान् यावच्छंभुप्रभावतः।।

अब मैं सदाशिव का ध्यान बता रहा हूँ, जिसके अनुसार उनका ध्यान करके मंत्रजप करना चाहिए। इस प्रकार (जप करने से) बुद्धिमान पुरुष भगवान् शिव के प्रभाव से उस मन्त्र को सिद्ध कर लेता है।

हस्तांभोजयुगस्थकुंभयुगलादुद्धृत्यतोयं शिरस्सिंचंतं करयोर्युगेन दधतं स्वांकेभकुंभौ करौ।।
अक्षस्रङ्मृगहस्तमंबुजगतं मूर्द्धस्थचन्द्रस्रवत्पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युंजयम्।।