निशीथ काल पूजा का समय रात के 12 बजकर 9 मिनट से 1 बजकर 1 मिनट तक अर्थात 51 मिनट की अवधि के लिए

14 तारीख़ को महा शिवरात्रि प्राण समय सुबह 7 बजकर 5 मिनट से दोपहर के 3 बजकर 21 मिनट तक

रात के प्रथम प्रहर की पूजा का समय शाम के  6 बजकर 6 मिनट से रात के 9 बजकर 21 मिनट तक

रात के द्वितीय प्रहर की पूजा का समय रात के 12 बजकर 21 मिनट से 35 मिनट तक

रात के तृतीय प्रहर की पूजा का समय रात के 12 बजकर 35 मिनट से 3 बजकर 50 मिनट तक

रात के चतुर्थ प्रहर की पूजा का समय रात के 3 बजकर 50 मिनट से सुबह के 7 बजकर 5 मिनट तक

चतुर्दशी तिथि का आरम्भ 13 फरवरी की रात के 10 बजकर 34 मिनट पर हुआ

चतुर्दशी तिथि का अंत 15 फरवरी की रात के 12 बजकर ४६ मिनट पर होगा

शिवरात्रि भगवान् शिव एवं माँ पार्वती के मिलन का त्यौहार है। दक्षिण भारत में माघ के कृष्णपक्ष के चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। परन्तु शेष भारत में फाल्गुन की मासिक शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं। यह अंतर इसलिए है क्योंकि चन्द्र की गति के आधार पर बनाए गए मासों के नाम उत्तर व दक्षिण भारत में भिन्न हैं। फिर भी उत्तर और दक्षिण भारत में एक ही समय महाशिवरात्रि मनाई जाती है।

सिर्फ़ News पर पहले महाशिवरात्रि की पूजा, इसके लिए व्रत इत्यादि के बारे में लिखा जा चुका है। पाश्चात्य की तिथि को ध्यान में रखते हुए हम आज प्रेम प्रसंग में शिव की महिमा का एक आख्यान आपके सम्मुख रखते हैं। ईश्वर की अनन्य भक्ति के साथ हमने आगे की पंक्तियों में “भगवान्”, “देवी” या “माता” का प्रयोग नहीं किया है।

युगों तक वैराग्य, युगों तक प्रेम

संसार के प्रति शिव की उदासीनता को देखकर चिंतित ब्रह्मा ने विष्णु से इस विषय में विमर्श किया कि महादेव के विवाह की व्यवस्था करनी चाहिए। इसी सन्दर्भ में उन्होंने अपने पुत्र दक्ष की पुत्री सती के साथ शिव के विवाह का प्रस्ताव रखा।

उधर सती बचपन से ही शिव की अनन्य भक्त थीं। जब उनकी आयु विवाह के योग्य हो गई तब इस बंधन में बंधने के जितने प्रस्ताव आए, उन्होंने सभी पात्रों को ठुकरा दिया। फिर वह शिव के ध्यान में मग्न हो गईं। उन्होंने अन्न-जल तक त्याग दिया और केवल पत्तों के आहार पर जीवित रहीं। इस चरम साधना से प्रसन्न हो जब बाबा भोलेनाथ सती के सामने प्रकट हुए तो सती ने उनसे अपने मन की बात कहनी चाही। पर शिव तो अंतर्यामी हैं। उन्होंने सती के बिना कुछ कहे ही ब्रह्मा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

हम यहाँ दक्ष यज्ञ और तांडव के प्रकरणों तक नहीं जाएंगे बल्कि शिव-प्रेम के आख्यान तक इस लेख को सीमित रखेंगे। इसलिए अब हम युगों के उपरांत शिव-पार्वती मिलन के अध्याय पर पहुँचते हैं। इस बीच यह बताना आवश्यक है कि सती का अगला जन्म उमा के रूप में हुआ था, परन्तु उमा को शिव पहचान नहीं पाए थे हालांकि उमा को सती के रूप में शिव को प्राप्त करना याद था।

जब सती के शरीर का 52 भागों में खंडन हो गया तब महादेव तांडव का समापन कर समाधिस्थ हो गए और युगों तक उसी अवस्था में रहे। उनके इस ब्रह्मचर्य का लाभ उठाते हुए तारकासुर ने पूरे संसार में अपने अत्याचार का साम्राज्य स्थापित कर लिया क्योंकि उसे पता था कि उसका वध केवल शिवपुत्र ही कर सकते थे पर शिव उस समय विवाह करने की अवस्था में नहीं थे। देवी-देवताओं ने एक बार फिर इस पर सोच-विचार किया कि शिव का विवाह किस नारी से करवाया जाए क्योंकि विकट समस्या यह थी कि शिवपुत्र के जन्म के लिए शिववीर्य की आवश्यकता थी जिसे धारण करने की क्षमता पूरे संसार में केवल शक्ति को ही थी। यह सोच विधाता ने शक्ति का पार्वती के रूप में इस युग में पदार्पण करवाया।

पार्वती पर्वत की पुत्री थीं। “पर्वत” शब्द से ही “पार्वती” शब्द बना है। सती की तरह ही पार्वती बचपन से ही शिव को समर्पित थीं। वे उस गुफा में लगातार जाती थीं जहाँ शिव ध्यान में मग्न थे। परन्तु बहुत अनुनय-विनय के पश्चात् भी शिव का ध्यान भग्न नहीं हुआ। पार्वती ने महादेव को फलाहार भी करवाना चाहा किन्तु शिव ने उनकी ओर ध्यान तक नहीं दिया। इसका उचित कारण जो भी हो, पार्वती को लगा कि वे कुरूप हैं इसलिए महादेव प्रसन्न नहीं हो रहे हैं। फिर क्या था? पार्वती भी सती की तरह घनघोर तपस्या में तल्लीन हो गईं। घोर तप से प्रसन्न हो ब्रह्मा प्रकट हुए तो पार्वती ने उनसे असीमित सौंदर्य का वर माँगा। अद्भुत सुन्दरता की अधिकारिणी के रूप में इस बार जब पार्वती शिव के सम्मुख आईं तो भोलेनाथ मंत्रमुग्ध हो गए।

शिव के अस्तित्त्व में दो ही स्वरूप चक्रवात परिवर्तित होते हुए आते हैं। या तो वे वैरागी होते हैं या समर्पित। नारी के साथ उनका मिलन होता भी है तो शक्ति के किसी नए जन्म के रूप के साथ ही होता है। एक समय एक से अधिक नारी का संस्पर्श उनके अस्तित्त्व में नहीं है। बल्कि अलग-अलग युगों में भी वे केवल शक्ति को ही समर्पित हैं। दुर्गा, काली, सती, उमा, पार्वती सब शक्ति के ही रूप हैं। और माता में महादेव इस प्रकार रम जाते हैं कि मिलन के समय यदि भृगु पधारें तो भी ऋषिवर को अनदेखा कर देते हैं। बल्कि तत्कालीन शालीनता को छोड़ वे भृगु से अपना असंतोष भी व्यक्त करते हैं। इससे कुपित हो भृगु न केवल यह कहते हैं कि शिव देवों में श्रेष्ठ नहीं हैं बल्कि वे भगवान् शंकर को यह श्राप भी देते हैं कि पृथ्वी पर उनकी पूजा योनी में समाविष्ट लिंग के रूप में ही होगी। पर सम्मान प्रेम के आड़े आए, यह शिव को स्वीकार्य नहीं। बाबा भोलेनाथ का समाज या तो युगों-युगों तक एक महाशून्य रहता है या फिर जब वे संसार के प्रति विमुख नहीं रहते तब वे माँ शक्ति के प्रेम में लीन होते हैं; माता के आगे उनके लिए किसी का आदर, कोई सम्मान या महापंडितों द्वारा दी गई प्रतिष्ठा तुच्छ है।

इसी भावना के साथ मैं आज अपना ज्योतिषशास्त्र का स्तम्भ सिर्फ़ News पर शुरू कर रहा हूँ। आज मैं ने प्रेम से सम्बंधित प्रश्नों के ही उत्तर दिए हैं।