Sunday 23 January 2022
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लक्ष्मण को मूर्छित देख संजीवनी बूटी लेने चले हनुमान

पहले सुषैण वैद्य लक्ष्मण का इलाज करने से मना कर देते हैं लेकिन राम और विभीषण के आग्रह और समझाने पर वह इलाज करने के लिए तैयार हो जाते हैं

लंका युद्ध क्षेत्र में राम के द्वारा कुम्भकर्ण का वध होने से रावण काफी आहत होता है और विलाप करने लगता है, पिता को विलाप करता देख मेघनाद ( इंद्रजीत) क्रोधित होता है और राम-लक्ष्मण का वध करने की शपथ लेता है। वह युद्ध क्षेत्र में जाता है और राम-लक्ष्मण को युद्ध के लिए ललकारता है। इसके बाद वह नागपाश से दोनों भाईयों को बांध देता है, जिससे राम-लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। हालांकि पक्षीराज गरुड़ युद्ध क्षेत्र में आकर नागपाश तोड़ते हैं और राम – लक्ष्मण की जान बच जाती है।

यह खबर जब लंका में रावण और इंद्रजीत को मिलती है तो दोनों क्रोधित हो जाते हैं और इंद्रजीत फिर से रणभूमि में जाता है और राम-लक्ष्मण को युद्ध के लिए ललकारता है। इंद्रजीत की ललकार से नाराज लक्ष्मण युद्ध के लिए जाते हैं, लेकिन इंद्रजीत अपनी मायावी चाल से लक्ष्मण पर शक्ति वाण से प्रहार करता है जिससे वह घायल हो कर जमीन पर गिर जाते हैं।

लक्ष्मण को मूर्छित देखकर राम शोक में डूब जाते हैं और इलाज का उपाय ढूंढने के लिए कहते हैं। विभीषण के सुझाव के अनुसार, हनुमान सुषैण वैद्य को लेकर आते हैं। पहले सुषैण वैद्य लक्ष्मण का इलाज करने से मना कर देते हैं लेकिन राम और विभीषण के आग्रह और समझाने पर वह लक्ष्मण का इलाज करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

सुषैण वैद्य श्रीराम से कहते हैं कि अगर अपने भाई को जीवित देखना चाहते हैं तो इनके इलाज के लिए बिना समय गवाए हिमालय पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आइए। वैद्यराज के सुझाव पर हनुमान श्रीराम की आज्ञा लेकर संजीवनी बूटी के लिए निकल पड़ते हैं।

मूर्छित अवस्था से होश में आते ही लक्ष्मण मेघनाद-मेघनाद कहते हुए अपनी आंखें खोलते हैं और कहते हैं कि कहां है वह दुष्ट? और कहां हैं मेरे धनुष और वाण? इस पर भगवान श्रीराम कहते हैं, भैया लक्ष्मण आप रणभूमि में नहीं हैं। वह बताते हैं कि एक बहुत बड़ा संकट आया था, लेकिन संकट मोचन हनुमान की वजह से वह संकट टल गया है। सभी लोग लक्ष्मण के होश में आने से खुश हो जाते हैं।

सुषैण वैद्य हनुमान से उस पर्वत को उसी जगह रखने की आग्रह करते हैं ताकी सभी दिव्य औषधियां सुरक्षित रह सके। उधर अशोक वाटिका में भी सीता को भी लक्ष्मण के ठीक होने की सूचना मिलती है तो वह भी खुष हो जाती हैं। लेकिन जैसे ही लंका नरेश रावण को यह बात पता चलती है वह फिर क्रोधित हो उठता है।

वहीं मेघनाद अपने पिता रावण से हवन और यज्ञ करने की आज्ञा मांगता है, जिससे वह और भी बलवान हो जाए और अजेय रथ को प्राप्त कर सके। इंद्रजीत दोनों भाइयों के वध करने की शपथ लेता है।

इसी बीच राम को अपने छोटे भाई भरत के व्याकुलता के बारें में आभास होता है। इस पर लक्ष्मण राम से कहते हैं कि अगर मैं भरत की जगह होता तो मैं अपनी सेना लेकर लंका जाता, तभी राम कहते हैं कि लक्ष्मण भरत अपनी मर्यादा जानता है वह अयोध्या को ऐसे अकेला छोड़कर नहीं आ सकता है।

इसके बाद विभीषण, इंद्रजीत की शक्ति के बारें में बताते हैं और ये भी कहते हैं कि बलवान बनने के लिए इंद्रजीत ब्रह्मा जी की कड़ी आराधना कर रहा है और अगर उसकी पूजा सफल हो गई तो उसे दिव्य रथ प्राप्त हो जाएगा जो वह युद्ध में प्रयोग करेगा। विभीषण आगे कहते हैं कि इंद्रजीत को ब्रह्मा से वरदान प्राप्त है कि अगर वह अपनी तांत्रिक शक्तियों से अपनी कुल देवी की पूजा करता है तो उसे दिव्य रथ सहित अत्यधिक शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होंगे।

इंद्रजीत को यज्ञ करने से रोकने के लिए लक्ष्मण अपनी सेना के साथ यज्ञ में बाधा डालते हैं। इसके बाद युद्ध के लिए वह इंद्रजीत को ललकारते हैं। लक्ष्मण पर मायावी वाण छोड़ते हुए इंद्रजीत फिर मायावी शक्ति का प्रयोग करता है। परंतु इस बार लक्ष्मण पर किया गया हर वार विफल हो जाता है और यह देखकर इंद्रजीत अदृश्य हो जाता है।

राम की सौगंध से हनुमान उठ जाते हैं। हनुमान के होश में आते ही भरत अपना परिचय देते हुए कहते हैं हे रामभक्त आप कौन हैं। हनुमान अपना परिचय देते हुए, सारी बातें भरत को बताते हैं। वहीं भरत की बातें सुनकर हनुमान सोच में पड़ जाते हैं और उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

भरत हनुमान की बात सुनकर व्याकुल हो जाते हैं । उधर हनुमान को रणभूमि में विलंब होता देख सभी लोग निराश हो जाते हैं। तभी सूर्य उदय होने से पहले हनुमान संजीवनी बूटी के साथ लंका की रणभूमि में प्रवेश करते हैं। हनुमान को देखकर श्रीराम के साथ साथ विभीषण, जामवंत, सुग्रीव अंगद सहित सभी लोग खुश हो जाते हैं।

इसके बाद सुषैण वैद्य औषधियों से प्रार्थना करते हुए उन्हें चुनकर एक लेप बनाते हैं और मूर्छित लक्ष्मण को उसका घोल पिला देते हैं। थोड़ी देर बाद औषधियों का असर होते ही लक्ष्मण होश में आ जाते हैं।

कालनेमी का वध कर हनुमान श्रीराम का नाम लेकर फिर हिमालय की ओर निकल पड़ते हैं। रास्ते में कैलाश गिरी पर्वत पर विराजमान शंकर भगवान को प्रणाम करते हैं और फिर अपने मार्ग की ओर चल पड़ते हैं। हनुमान हिमालय पर्वत पर पहुंच जाते हैं जहां उन्हें चमकते हुए ढ़ेर सारी औषधियां दिखती हैं, जिसे देखकर वह आश्रर्य में पड़ जाते हैं। लेकिन हनुमान को देखते ही सारी दिव्य औषधियों की रोशनी बुझ जाती है।

गिरी पर्वत ‘कौन- कौन’ भयावह शब्द से गूंज उठता है। इस पर हनुमान कहते हैं, ” हे दिव्य औषधियों के रखवाले देवतागण मैं केसरी पुत्र हनुमान हूं, मैं सभी को नमन करता हूं ”। हनुमान आगे वहां आने का कारण बताते हैं। हनुमान के विनम्र निवेदन पर देवता प्रकट होते हैं और कहते हैं,” केसरी नंदन पवन पुत्र हनुमान हम आपके विनम्र स्वभाव से खुश हुए, आप इस पर्वत से जो चाहे ले जा सकते हैं।” हनुमान दिव्य औषधियों से जगमगाते हुए पर्वत को देखकर विचलित हो जाते हैं कौन सी- औषधी संजीवनी बूटी है। कोई उपाय नजर नहीं आता देख वह पर्वत को प्रणाम संपूर्ण पर्वत को उठाकर कर चल देते हैं।

रास्ते में उन्हें श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या नगरी दिखती है। हनुमान सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं। तभी अयोध्या नगरी के सेना की नजर आसमान में उड़ रहे हनुमान पर पड़ती है और वह राजकुमार भरत के पास जाते हैं और बताते हैं कि कोई महाकाल जीव पर्वत उठाये आसमान में उड़ रहा है। भरत बिना कुछ सोचे समझे हनुमान पर बाण पर चला देते हैं।

बाण लगते हैं हनुमान नीचे गिर जाते हैं और श्रीराम-श्रीराम कहने लगते हैं। भरत हनुमान की तरफ बढते हैं और पूछते हैं आप कौन हैं अपनी आंखें खोलिए? मुझे क्षमा करे राम भक्त मुझसे गलती हो गई। आप अपनी आंखें खोले, रामभक्त आपको राम की सौगंध है।

बैद्यराज की संजीवनी बूटी के सुझाव के बारें में जब राणव और इंद्रजीत को पता चलता है वह दोनों गुस्से में आ जाते हैं और हनुमान को हिमालय पर्वत पर पहुंचने से कैसे रोका जाए इसके बारें में सोचने लगते हैं। रावण कालनेमी नामक मायावी राक्षस के पास जाते हैं और हनुमान को रोकने के लिए कहते हैं।

रावण कालनेमी से कहते हैं कि तुम्हारे पास अद्भूत मायावी शक्तियां हैं, जिससे तुम हनुमान से भी तेज गति से इधर-उधर आ जा सकते हो, जाओ उसे रोक लो। इस पर कालनेमी कहता है कि हनुमान को कोई रोक नहीं सकता है क्योंकि हमारी मायावी शक्तियां उनके आगे बेकार हैं। वह अत्यंत बलवान और बुद्धिमान हैं फिरभी मैं कोशिश करुंगा।

इस पर रावण क्रोधित हो जाता है और चिल्लाते हुए कहता है कि तुम मेरे आगे मेरे शत्रु की प्रशंसा करते हो। कालनेमी डर जाता है।

कालनेमी रावण के कहने पर जाता है और रास्ते में एक ऋषि का वेश धारण कर हनुमान को अपनी मायाजाल में फंसा लेता है। हनुमान को प्यास लगती है और वह पानी पीने के लिए जैसे ही नदी में उतरते हैं, एक मगरमच्छ उनके पास आता और उन पर वार कर देता है।

हनुमान उस मगरमच्छ को मार देते हैं लेकिन तभी एक अप्सरा प्रकट होती है और बताती है वह शापित थी, आज उसे मुक्ति मिल गई। वह एक देवकन्या है लेकिन ऋषिमुनि के श्राप से यह वह मगरमच्छ बन गई थी। देवकन्या हनुमान को सावधान करते हुए कहती है कि आप उस कपटी ऋषि से सावधान हो जाए, वह रावण का भेजा हुआ मायावी राक्षस कालनेमी है जो आपको मारने के लिए आया है। हनुमान को जब ऋषि बने कालनेमी के बारें में पता चलता है तो वह उसे सबक सिखाने के लिए जाते हैं, दोनों में युद्ध होता है। हनुमान कालनेमी का वध कर देते हैं।

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