18.8 C
New Delhi
Tuesday 28 January 2020

शबरीमला पर सेक्युलर क़ानून थोपना अन्याय है

अय्यप्पा स्वामी समुदाय विशेष के इष्ट देव हैं जिनके नियमों को बदलने का अधिकार अन्य समुदायों को नहीं है; धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आस्थाओं का विखंडन न हो

Columnist

Sonali Misra
Sonali Misrahttps://www.sirfnews.com
स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार, उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं प्रकाशित हुआ है और शिवाजी पर उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य है; उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है

News

First RSS sainik school begins process of admission

The Rajju Bhaiya Sainik Vidya Mandir situated in Bulandshahr of Uttar Pradesh will follow the curricula set by the Central Board of Secondary Education

Transgender judge moves SC against exclusion from NRC

Most from the transgender community in Assam remained out of the NRC for not having pre-1971 documents necessary for inclusion in the list

PFI paid Sibal, other lawyers to fight for anti-CAA activists: ED

Clarifying his position after being named as a beneficiary lawyer, advocate-cum-senior INC politician Kapil Sibal denied any link with PFI

Subscribe to our newsletter

Get our latest reports and articles via email

- Advertisement -

पिछले सप्ताह शबरीमला (Sabarimala का सटीक उच्चारण) मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर निर्णय आना था और वह निर्णय बहुप्रतीक्षित था लेकिन उसे सात-सदस्यीय पीठ के हवाले कर दिया गया। यह निर्णय इस बात को लेकर होना है कि क्या स्त्रियों को शबरीमला मंदिर में प्रवेश करना चाहिए। कुछ कथित एक्टिविस्ट मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं। यहाँ पर एक प्रश्न अधिक मुखर होकर पूछा जा सकता है कि क्या इन कथित एक्टिविस्ट की आस्था उस मंदिर में है?

वर्ष 2018 में आए निर्णय के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने यह कहा था कि उक्त मंदिर में एक विशेष उम्र की स्त्रियों के प्रवेश पर लगी रोक संविधान की धारा 14 का उल्लंघन है। यह उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि बिना किसी भेदभाव के सभी को मंदिर में पूजा की अनुमति मिलनी चाहिए।

ये शब्द “बिना किसी भेदभाव के” सुनने में बहुत अच्छा लगता है, परन्तु मंदिर या आस्था के किसी भी केंद्र के लिए यह शब्द नहीं है। यह कहा जाता है कि प्रभु की नज़र में सब बराबर हैं, लेकिन पूजा पद्धति के आधार पर हमारा समाज समुदायों में बंटा हुआ है और किसी एक समुदाय को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि अन्य किसी समुदाय पर अपनी मान्यताएं थोप दे। यदि किसी व्यक्ति की आस्था ही उस केंद्र में नहीं है तो वह कैसे और क्यों उस मंदिर में प्रवेश पाना चाहता है यह समझ से परे है।

आस्था पर तब तक प्रश्न नहीं उठाए जा सकते या न्यायिक प्राधिकरण को कोई निर्णय लेने का अधिकार सिद्ध नहीं होता जब तक किसी व्यक्ति के प्राणों को या समाज को कोई हानि नहीं हो रही हो। हर संस्थान के अपने नियम और क़ायदे होते हैं जो उस संस्थान के स्वामी के विश्वासों के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। जो उनका आदर करना चाहेगा, वह उस संस्थान में जाएगा और जिसे उन नियमों से समस्या होगी वह स्वयं को उस संस्थान से पृथक कर लेगा।

ऐसा ही कुछ इस मंदिर विशेष के साथ है। भगवान् अयप्पा के कई मंदिर हैं जिनमें हर आयु वर्ग की स्त्रियाँ जाती हैं, भगवान अयप्पा की पूजा करती हैं। परन्तु शबरीमला के साथ ऐसा नहीं है। क्या शबरीमला मंदिर में प्रवेश न करने से स्त्रियों के साथ कोई अपराध हो रहा है? नहीं। क्या यह कोई सामाजिक बुराई है? नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं है। फिर ऐसा क्या है जिसके कारण इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर इतना विवाद है?

जो स्त्रियाँ मंदिर में जाना चाहती हैं, क्या वे वाक़ई उस मंदिर में आस्था रखती हैं? या यह महज़ प्रसिद्धि हासिल करने की ओछी हरकत है? और क्या यह उस स्थान की विशेष परम्परा के कारण तो नहीं है? अयप्पा की पूजा में मासिक धर्म वाली उम्र की स्त्रियों के प्रवेश को लेकर जो प्रतिबन्ध है वह मात्र उसी मंदिर तक ही सीमित है — क्योंकि यहाँ अय्यप्पा देव ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं जबकि उन्हीं के अन्य मंदिरों में वे संसार धर्म निभा रहे हैं — और इसे विविधता के रूप में देखा जाना चाहिए न कि भेदभाव के रूप में क्योंकि इसी भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पर पुरुषों का प्रवेश वर्जित है।

यह वर्जना आराधना-विशेष के कारण है, न कि किसी भेदभाव के कारण। केरल के अट्टुकल मंदिर में महिलाएँ ही पूजा कर सकती हैं। यहां पुरुष नहीं जा सकते।

जिस प्रकार शबरीमला मंदिर में यह नियम है कि मासिक धर्म की आयु वाली स्त्रियाँ मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती हैं तो वहीं एक ऐसा भी मंदिर है जहाँ पर केवल मासिक धर्म वाली स्त्रियाँ ही प्रवेश कर सकती हैं जैसे असम का कामाख्या देवी का मंदिर।

जब भी किसी देवी या देवता का मंदिर स्थापित होता है तो वह किसी मनोरंजन या क्रान्ति का स्थान न होकर उस देवी या देवता के अनुसार बनाए गए नियमों का मंदिर होता है। वह नियम उस देव या देवी के स्वभाव या प्रवृत्ति के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं।

तो इसे सनातन की विविधता कह सकते हैं, यह भेदभाव नहीं है जैसा आम तौर पर मस्जिदों में दिखता है। या कुछ मुस्लिम समुदायों में लड़कियों का खतना! यह भेदभाव है और अत्याचार है। शबरीमला का मुद्दा दहेज़ प्रथा या अकस्मात् तीन बार तलाक जैसा मुद्दा नहीं है, यह आस्था का मुद्दा है, यह देवता के स्वभाव का मुद्दा है।

जो सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय आया जिसके अंतर्गत इस विषय को बड़ी बेंच को सौंप दिया गया, यह अयप्पा के भक्तों की एक आंशिक विजय तो हो सकती है परन्तु पुराने निर्णय को स्थगित न किया जाना अयप्पा भक्तों के साथ अन्याय है। इस निर्णय की आड़ लेकर अब केरल सरकार उनकी आस्था पर प्रहार करने से यदि न चूके तो अय्यप्पा स्वामी के भक्तों की बहुतायत के चलते चुनावों में प्रतिकूल परिणाम से भय इसका कारण हो सकता है, पर स्वयं को प्रगतिशील दिखाने के लिए कम्युनिस्ट सरकार आस्था को आगे भी नहीं ठुकराएगी, ऐसा मानकर चलना मूर्खता होगी।

यहाँ यह बात ध्यान में रखनी होगी कि केवल शबरीमला में ही अयप्पा को ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, अयप्पा के शेष मंदिरों में यह प्रतिबन्ध नहीं है अत: वहां पर स्त्रियों का प्रवेश वर्जित नहीं है। समय आ गया है कि प्रगतिशीलता एवं धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आस्थाओं का विखंडन न हो, यह ध्यान रखा जाए!

- Advertisement -
- Advertisement -

Science & Technology

- Advertisement -

Appeal

Dear Sirf News subscriber,

वंदेमातरम्!

We started this media venture with a resolve to offer our readers, listeners and viewers content they were not getting from mainstream media: Truth not coloured by political correctness. We waited for a while as some alternatives arrived. But with dismay, we observed that the wannabe substitutes were merely reacting to the news supplied by conventional journalists; they did not have reporters of their own. As a result, the agenda kept being set by the old guard.

To know first hand what is happening in different parts of the country and the world, we need to have reporters posted in all those locations: at least one in every state of India and 15-20 correspondents to cover the Union ministries, national political parties and institutions; at least one in the capital of every important country. Since mass communication schools teach journalism in a certain way that maintains the status quo, we need to spend on fresh training of our recruits, too.

Other costs involve the salaries of desk staff (from sub-editors up to the chief editor), server fee, agencies' charges and office maintenance.

To protect our independence, we do not seek fund from government or the corporate sector. The choice, therefore, is only you. Please help us stay in the business of serving you unadulterated information and well-informed opinions.

Please click on the button "Support Sirf News" below and donate an amount you can afford. Your contribution will be acknowledged and sincerely appreciated.

जय हिन्द!

Leave a Reply

More Articles Like This

- Advertisement -

For fearless journalism

%d bloggers like this: