Friday 27 January 2023
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सफ़ाई ईमान है

जहाँ गंदगी है वहाँ सफ़ाई। क़ुदरत ने सफ़ाई को हर शै की फ़ितरत में शामिल कर दिया है। जानवर हो या इन्सान, परिंदे हों या पेड़-पौदे, नदियाँ हों या तालाब — सब अपने को साफ़ रखते हैं। जानवर रेत में लोट कर या नदी, नाले, तालाब में नहा कर साफ़ रहते हैं। चिड़ियाँ अपने पर कुरेद कर या एक दूसरे के पर कुरेद कर और पानी में नहा कर चमकती रहती हैं। पेड़ पौदे अपने पुराने पत्ते झाड़कर नए पत्ते उगा कर अपने को तर-ओ-ताज़ा रखते हैं। नदियाँ और तालाब ऊपर तैरने वाली गंदगी को लहरों के सहारे किनारे कर देती हैं और जो गंदगी पानी में घुल जाती है उसे नीचे बैठा कर मिट्टी का हिस्सा बना देती हैं या फिर बहा कर इस में मौजूद मुज़िर अजज़ा की शिद्दत को ख़त्म कर देती है।

इन्सान सफ़ाई के साथ गंदगी-ओ-कूड़ा पैदा करते हैं; तमाम मज़ाहिब ने इन्सानों को साफ़ रहने की नसीहत-ओ-तलक़ीन की है। बग़ैर सफ़ाई के किसी भी इबादत या पूजा का कोई तसव्वुर नहीं है। हमारे यहाँ नदियों को माँ कहा जाता है क्योंकि वो हमारी ज़िंदगी की किलीद हैं; गंदगी को साफ़ करती हैं, पीने और खेती के लिए पानी मुहय्या कराती हैं और ज़मीन को ज़रख़ेज़ बनाती हैं, वग़ैरा।

सफ़ाई में ख़ुद को साफ़ रखने के साथ पैदा होने वाली गंदगी और कूड़े को ठिकाने लगाना भी शामिल है। क़ुदरत ने माहौल को साफ़ रखने का जो इंतज़ाम किया है वो बल्ला-शुबा ग़ैरमामूली है, लेकिन सारी परेशानी इन्सानों के ज़रिए पैदा की हुई गंदगी से शुरू होती है। ये इतना बड़ा मसला बन गया है कि एक तरफ़ क़ुदरत के निज़ाम को चैलेंज कर रहा है तो दूसरी तरफ़ इन्सानी ज़िंदगी के लिए नित-नए ख़तरात पैदा हो रहे हैं। तमाम बड़े शहरों के बाहर कूड़े के पहाड़ इंतिज़ामिया का सर-दर्द बने हुए हैं। इस को ठिकाने लगाने की जो भी तदाबीर इख़तियार की जाती हैं — कुछ दिनों बाद वो ना काफ़ी साबित होती है; इस से हवा, पानी, ज़मीन और माहौल आलूदा हो रहा है। इन कूड़े के ढेरों में तरह-तरह की बीमारियों के जरासीम नशो नुमा पा कर शहरों को मुतास्सिर कर रहे हैं।

दुनिया में जिन बीमारियों ने तबाही मचाई वो एक से दूसरे को लगने वाली बीमारियां थीं, जैसे चेचक, ख़सरा, डावरिया (हैज़ा), टी बी, प्लेग (ताऊन), एडज़ या इबोला, वग़ैरा; ये बीमारियाँ खुले आसमान के नीचे रफ़ा हाजत करने और खाने पीने में सफ़ाई का ख़्याल न रखने से फैलती हैं। रेलगाड़ी में सफ़र के दौरान बैत उल-खुला का इस्तिमाल भी खुले में रफ़ा हाजत जैसा ही है क्योंकि इस से फुज़ला’ रेलवे लाइनों के बीच में पड़ा सड़ता रहता है।

भारत में आज भी 60 करोड़ लोग खुले में रफ़ा हाजत करते हैं यानी आधी आबादी खेत खलियान, झाड़ झंकाड़, पेड़ों की आड़, सड़क या रेलवे ट्रैक के किनारे सूरज की पहली किरण के साथ और शाम को आख़री किरण के बाद ज़रूरत से फ़ारिग़ होती नज़र आती है। इस में 30 करोड़ बच्चियाँ, लड़कीयां और औरतें भी शामिल हैं। वो इस डर से पानी कम पीती और खाना कम खाती हैं कि दिन के वक़्त रफ़ा हाजत के लिए जाना मुमकिन नहीं होता। इस से जहाँ उनके जिस्म में पानी की कमी हो जाती है वहीं किसी अनहोनी होने के इमकानात भी होते हैं। आम तौर पर ऐसी ख़वातीन ख़ून की कमी की शिकार होती हैं, जिस्म कमज़ोर होने की वजह से उन पर बीमारियों का असर जल्दी होता है और उनके बच्चे औसत से कम वज़न के होते हैं। कई मर्तबा उनके बच्चों की हमल में ठीक से नशो नुमा भी नहीं हो पाती। वो पैदा होने के बाद भी कमज़ोर रहते हैं या इसक़ात-ए-हमल का शिकार हो जाते हैं। ख़ून की कमी माँ और बच्चे दोनों की ज़िंदगी के लिए ख़तरनाक है। खुले में पड़ी ग़लाज़त पर मक्खियां बैठती हैं फिर यही मक्खियां खाने पीने की चीज़ों पर जा बैठती हैं — इस से बीमारी फैलती है।

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खुले में पड़ी ग़लाज़त पर मक्खियां बैठती हैं फिर यही मक्खियां खाने पीने की चीज़ों पर जा बैठती हैं — इस से बीमारी फैलती है

हाथों के ज़रीए भी बीमारी के जरासीम जिस्म में दाख़िल होते हैं; इसलिए डाक्टर फ़राग़त के बाद या खाने पीने की चीज़ों को छूने से पहले साबुन से हाथ होने की सलाह देते हैं। साबुन दस्तयाब ना होने की सूरत में राख या रेत से रगड़ कर हाथ साफ़ किए जा सकते हैं। सरकार घरों में बैत उल-ख़ला बनाने पर-ज़ोर दे रही है ताकि खुले में रफ़ा हाजत करना बंद हो। यूनाइटेड नेशन की तंज़ीम यूनीसेफ सरकार के मन्सूबा को कामयाब बनाने के लिए अपनी पूरी टीम के साथ सर-गर्म अमल है।

घर में बैत उल-ख़ला बनाने को लेकर समाज में कई तरीक़े की ग़लत-फ़हमियाँ पाई जाती हैं। कई लोगों का मानना है कि टॉयलेट में भूत रहते हैं, तो कई उस को घर गंदा करने वाला समझते हैं — इसलिए वो घर में बैत उल-ख़ला बनाने के बजाय खुले में रफ़ा हाजत को फ़ौक़ियत देते हैं।

ग्लोबल इंटरफ़ेथ वॉश अलायन्स (जीवा) के को चेयर और परमार्थ निकेतन के सदर स्वामी चिदानंद सरस्वती ने इस सोच को बदलने, मुल्क भर में बैत उल-ख़ला बनवाने और पानी, सफ़ाई और सेहत को अहमियत देने के लिए मज़हबी लीडरों और सहाफ़ीयों के साथ मिलकर मुहिम चलाने का फ़ैसला किया है। स्वामी जी ने ये जानकारी यूनिसेफ़, स्मैक फ़ाउंडेशन और जीवा के इश्तिराक से लखनऊ में मुनाक़िद होने वाले मज़हबी रहनुमा और ज़राए इबलाग़ के नुमाइंदों के पाँचवें इजलास में दी। उन्होंने कहा कि दहशतगर्दी, जंग, नक्सलवाद और फ़सादात में लोगों को मरने से रोकने की शायद हम कोशिश नहीं कर सकते, लेकिन सफ़ाई के ज़रीए लोगों को बचाने की कोशिश ज़रूर कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि 88% बीमारियाँ पानी की वजह से होती हैं। दुनिया में 600 करोड़ लोग मज़हब में यक़ीन रखते हैं वक़्त आगया है जब तमाम मज़ाहिब के लोग साथ मिलकर हैल्थ, हाई हाइजीन और सेनेट्री के लिए काम करें। उन्होंने कहा कि मंदिर तो बहुत बन गए अब टॉइलेट बनाने की ज़रूरत है। उन्होंने “वर्शिप टू वॉश” का नारा देते हुए कहा कि अब सफ़ाई का उकेर तन करने की ज़रूरत है। प्रसाद में पेड़े तो बहुत खा लिए अब पेड़ देने की ज़रूरत है ताकि माहौल साफ़ हो सके। उन्होंने कहा कि दान में सबसे बड़ा दान कूड़ेदान है जो हमें दान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज नमाज़ के साथ समाज को जोड़ने की ज़रूरत है।

इस मौक़े पर मौलाना कलबे सादिक़ ने कहा कि ज़िंदगी का हर शोबा आलूदा हो चुका है; यहाँ का धरम आलूदा, धरमगुरु आलूदा, पानी, दवाएँ, हवाएँ, यहाँ तक कि डाक्टर तक आलूदा हो चुके हैं। अब कहने का नहीं, काम करने का वक़्त है। उन्होंने कहा मज़हब हमारे मसाइल दूर करने आया है, बढ़ाने नहीं। मसाइल इस लिए पैदा हो गए हैं क्योंकि हम मज़हब की तशरीह अपनी मर्ज़ी और पसंद से करते हैं; अपना मज़हब ख़ुद ईजाद करते हैं और इसी को असल क़रार देते हैं। हम अपने दिल की नहीं बल्कि अल्लाह की बात मानें। उन्होंने पैग़ंबर इस्लाम की ज़िंदगी से मिसालें पेश करते हुए कहा कि नबी करीम किसी बात की नसीहत करने से पहले ख़ुद इस पर अमल करते थे। उन्होंने कहा कि अमल का असर लोग क़बूल करते हैं बातों का असर ज़्यादा नहीं होता। कलबे सादिक़ साहिब ने कहा कि मैं जिस मुहल्ला में रहता हूँ वो जौहरी मुहल्ला है लेकिन अब गोबरी मुहल्ला बन चुका है। उन्होंने कहा कि आज मैं अपने मोहल्ले से सफ़ाई का काम शुरू करने का अह्द करता हूँ। उन्होंने इस अज़म का भी इज़हार किया कि अब वो अपने साथ कूड़ेदान लेकर चलेंगे — इस से लोग ख़ुद बख़ुद आगे आकर सफ़ाई के काम में लगेंगे। उन्होंने मीडिया के लोगों को मुख़ातब करके कहा कि महात्मा और मीडिया दो ऐसी ताक़तें हैं अगर साथ आ जाएँ तो ये काम आसान हो जाएगा।

जैन मज़हबी रहनुमा और अहिंसा विश्व भारती के बानी आचार्य लोकेश मुनि ने जैन मज़हब के हवाले से कहा कि जिस्म सेहतमंद नहीं है तो धरम भी मुकम्मल नहीं हो सकता। मज़हबी रहनुमाओं को अपने प्रवचन में सफ़ाई पानी का तहफ़्फ़ुज़ और इजाबत घरों की तामीर की बात करनी चाहिए। वक़्त आ गया है जब ख़ानदान, स्कूल, मज़हबी मुक़ामात का आपस में रब्त बनाया जाये तभी ‘टेम्पल टू टॉयलेट’ की मुहिम कामयाब होगी और समाज से बुराइयाँ दूर होंगी।

बौद्ध मज़हबी रहनुमा सौ मेधा थेवर विजी ने महात्मा बुद्ध की तालीमात का ज़िक्र करते हुए बताया कि 2600 साल पहले बुद्ध ने समाज से अज्ञानता को दूर करने के लिए तालीम को आम करने पर ज़ोर दिया था। उन्होंने कहा कि बुद्ध ने सवाब (पुण्य) हासिल करने के लिए जो 8 काम बताए हैं उनमें एक टॉयलेट बनाना है।

महामंडलेश्वर स्वामी ईश्वर दास ने बताया कि हमने साबरमती के तट पर संकल्प किया था कि गुजरात के 108 गाँव में पानी, सफ़ाई और सैनिटेशन के लिए बेदारी मुहिम शुरू करेंगे; काम करने से मालूम हुआ कि एक हाथ में झाड़ू और दूसरे में माला होगी तभी स्वच्छता का काम पूरा होगा। उन्होंने कहा कि सैनिटेशन के बाद ही मेडिटेशन अच्छा होता है। माला फिराने से कई बार अंदर का कचरा रह जाता है, लेकिन जब महात्मा झाड़ू देते हैं तो ये कचरा भी साफ़ हो जाता है। उन्होंने बताया कि अवाम का इस काम में पूरा तआवुन मिल रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही इन 108 गाँवों की हालत में ग़ैरमामूली तबदीली आएगी।

इस्लामिक सैंटर आफ़ इंडिया के बानी मौलाना ख़ालिद रशीद फ़िरंगी महली ने कहा कि इस्लाम सेहत, सफ़ाई और रवादारी को बहुत अहमियत देता है। इस्लाम के मुताबिक़ सफ़ाई-ओ-पाकी ईमान का आधा हिस्सा है उन्होंने सफ़ाई पाकीज़गी, पानी का तहफ़्फ़ुज़ और माहौलियात की हिफ़ाज़त के लिए मज़हबी रहनुमाओं के आगे आने को मुबारक क़दम बताया।

स्मैक फ़ाउंडेशन के ट्रस्टी और सीवर सहाफ़ी राहुल देव ने मीडिया और महात्माओं के ज़रीए हेल्थ, हाइजीन और हार्मोनी की मुहिम को कामयाब बनाने के लिए रेज़ोल्यूशन पेश किया।

यूनीसेफ इंडिया की चीफ़ (एडवोकेसी एंड कम्यूनीकेशन) कैरोलीन ने यूनिसेफ़ के ज़रीया किए जानेवाले कामों से मीडिया के नुमाइंदों को वाक़िफ़ कराया। यूनिसेफ़ इंडिया की वाच की ज़िम्मेदार सौ कोटिस ने कहा कि हर बच्चे का हक़ है कि उसे साफ़ पानी, खाना और साफ़ माहौल मिले। हमें उसे यक़ीनी बनाना होगा अगर हम अपने बच्चों को महफ़ूज़ माहौल नहीं दे सकते तो ये हमारे समाज के लिए अफ़सोसनाक है। क्योंकि आलूदा माहौल बच्चों की सेहत के लिए ख़तरा पैदा करता है। यूनिसेफ़ की कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट सोनीया सरकार ने मीडिया को सरगर्म पाटनर बनाने के लिए यूनिसेफ़ की जानिब से की जाने वाली कोशिशों का हवाला देते हुए मीडिया के तआवुन का शुक्रिया अदा किया।

पानी, सफ़ाई, सेहत, सैनिटेशन और यकजहती की अहमीयत से किसी को इनकार नहीं; ज़रूरत इस बात की है कि अपने बच्चों के मुस्तक़बिल को सँवारने, उनकी जिस्मानी नशोदनुमा को बेहतर बनाने और सेहतमंद समाज की तशकील के लिए मज़हबी रहनुमाओं की इस कोशिश में उनका साथ दिया जाए क्योंकि इस से तरक़्क़ी के कई दरवाज़े खुलेंगे। साफ़, सेहतमंद और महफ़ूज़ माहौल होगा तो दवाओं पर होने वाला ख़र्च बचेगा — इससे समाज के कमज़ोर तबक़ात की हालत में सुधार आएगा। बस ज़रूरत इस बात की है कि मीडिया इस अहम काम में अपना मुसबत रोल अदा करे, पानी, सेहत, सफ़ाई, सैनिटरी और यकजहती से जुड़ी ख़बरों को अख़बारात-ओ-रसाइल या चैनल्ज़ में ज़्यादा जगह दी जाये। मन साफ़ होगा तभी ईमान मज़बूत होगा और ज़िंदगी ख़ुशगवार बनेगी।

संपादक की ओर सेयह लेख उर्दू शैली में लिखा गया है। यदि वर्तनी में आपको ‘त्रुटियाँ’ दिखें तो वे त्रुटियाँ नहीं बल्कि उन शब्दों को उर्दू में लिखने का ढंग है — जैसे, “पौधा” के स्थान पर “पौदा”। लेखक की अपनी शैली का आदर एवं इस लेख की प्रकृति का सम्मान करते हुए हमने विदेशज शब्दों को तुल्यार्थक तत्सम शब्दों में परिवर्तित नहीं किया। पाठकों से हमारा आग्रह है कि वे कठिन शब्दों का अर्थ Platt’s Dictionary से ढूंढ लें। कई शब्दों के अर्थ वाक्य के सन्दर्भ से भी स्पष्ट हो जाएंगे। समाचार या विचार माध्यमों में शब्दार्थ छापने का चलन नहीं है। हम आपकी असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हैं, परन्तु हम यह भी मानते हैं कि इस स्व-शिक्षण प्रक्रिया तथा अरबी व फ़ारसी मूल के शब्दों को देवनागरी में पढ़ने के अभ्यास से हिन्दी-उर्दू भाषा समूह का प्रचार-प्रसार सुगम होगा।

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Muzaffar Husain Ghazali
Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

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