Sunday 19 September 2021
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जया की जय-जयकार करती तलैवी

बनाने वालों ने समझदारी से इसे ‘सिनेमा से सीएम’ तक सीमित रखा जबकि सीएम बनने के बाद के जयललिता उर्फ़ जया के ‘कारनामे’ किसी से छुपे नहीं हैं

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हालांकि बहुत जगह चुस्त एडिटिंग का अभाव खलता है और लगता है कि कई सीन काफी खींच दिए गए, यह भी एक सच है कि पूरी फ़िल्म में एक भी सीन ऐसा नहीं है जिसे छोड़ कर आप बाहर जा सकें

लगभग डेढ़ दशक तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता (जया) की जीवन-यात्रा से भला कौन परिचित नहीं? जो परिचित नहीं, उनके लिए ही तो बनाई गई है यह फ़िल्मतलैवी — एक स्वाभिमानी लड़की जो संघर्ष करके स्टार अभिनेत्री बनी, अभिनेता से राजनेता बने एमजी रामचंद्रन से अपनी नज़दीकियों के चलते वह राजनीति में आई और उनकी मृत्यु के बाद करोड़ों लोगों का प्यार पाकर उनकी राजनीतिक वारिस भी बनी।

हिन्दी वालों के लिए दक्षिण भारतीय नेताओं-अभिनेताओं की कहानियां अनसुनी, अनजानी भले होती हों लेकिन यह तो उन्हें भी पता है कि वहां के लोग जब किसी को सिर पर बिठाते हैं तो उसे देवी-देवता का दर्जा दे देते हैं। यह फ़िल्म दिखाती है कि एमजीआर (फिल्म में एमजेआर) और जयललिता (फिल्म की जया) ऐसे ही दो व्यक्ति थे। फ़िल्म की शुरुआत उस (सच्ची) घटना से होती है जब जया को भरी विधानसभा में अपमानित किया गया था और उसने क़सम खाई थी कि अब इस सभा में मुख्यमंत्री बन कर ही लौटेगी।

अपने यहाँ राजनेताओं की निष्पक्ष बायोपिक बनाने का चलन नहीं है। वजह स्पष्ट है कि कुछ ‘ऐसा-वैसा’ दिखाया तो फिर फ़िल्म और उसे बनाने वालों की ख़ैर नहीं। यह फ़िल्म भी ‘ऐसा-वैसा’ दिखाने से बचती है और इसीलिए जया का प्रशस्ति-गान करती ही दिखाई देती है। बनाने वालों ने बड़ी ही समझदारी से इसे ‘सिनेमा से सीएम’ तक सीमित रखा जबकि मुख्यमंत्री बनने के बाद के जयललिता के ‘कारनामे’ भी किसी से छुपे नहीं हैं।

बावजूद इसके, यह एक सधी हुई कहानी पर बनी फ़िल्म है। विजयेंद्र प्रसाद ने अपनी स्क्रिप्ट में जया के जीवन के प्रमुख हिस्सों को कोलाज की शक्ल में पेश किया है जिसके चलते यह शुरू से ही बांध लेती है। हालांकि बहुत जगह चुस्त एडिटिंग का अभाव खलता है और लगता है कि कई सीन काफी खींच दिए गए, यह भी एक सच है कि पूरी फ़िल्म में एक भी सीन ऐसा नहीं है जिसे छोड़ कर आप बाहर जा सकें। रजत अरोड़ा के संवाद कहीं बहुत प्रभावी हैं तो कहीं एकदम हल्के।

एएल विजय का निर्देशन असरदार है। वह दृश्यों को प्रभावी ढंग से गढ़ पाते हैं और कलाकारों से उनका बेहतरीन काम भी निकलवा पाते हैं। सच यह भी है कि अदाकारी ही इस फिल्म का सबसे मज़बूत पक्ष है। कंगना रानौत ने एक बार फिर अपने अभिनय का दम दिखाया है। जया के किरदार के अलग-अलग तेवरों को वह बखूबी पकड़ती हैं। एमजीआर बने अरविंद स्वामी (‘रोजा’ और ‘बॉम्बे’ वाले) ने उत्कृष्ट काम किया। राज अर्जुन का काम भी बेहद प्रभावी और प्रशंसनीय रहा। अपनी मौजूदगी भर से वह असर छोड़ते हैं। एक अर्से बाद भाग्यश्री और मधु को देखना सुखद लगा। गाने अच्छे हैं और कैमरावर्क उम्दा।

कहीं-कहीं विद्या बालन वाली द डर्टी पिक्चर की याद दिलाती यह फिल्म देखी जानी चाहिए। राजनीति की फिसलन भरी सीढ़ियों पर संभल कर चलती, चढ़ती एक नायिका की कहानी को जानना ज़रूरी है। और हां, तलैवी तमिल भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है नेता या नेत्री। फ़िल्म के शुरू में थिएटर के पर्दे पर हिन्दी भाषा में कास्टिंग लिख कर सुखद अहसास देने वालों को अपनी फिल्म के लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त नाम क्यों नहीं मिला?

दीपक दुआ

Reporting fromमुंबई

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