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Recusal by SC judges not in spirit of यतो धर्मस्ततो जयः

भारतीय व्यवस्था में recuse करने का तात्पर्य हुआ कि जज ने 'पञ्च परमेश्वर' के सिद्धांत से स्वयं को अलग कर मानसिक रूप से निष्पक्षता निभाने में अपने आप को असमर्थ पाया

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यह विषय संवेदनशील है और महत्त्वपूर्ण भी। हमारे लोकतंत्र की सुन्दरता इसी बात पर निर्भर है कि हमारी न्यायपालिका उन तीन स्तंभों में से एक है जिन पर हमारा संविधान और हमारी व्यवस्था निर्भर है — कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। सभी स्तंभ निष्पक्षता से और ईमानदारी से अपना काम करे और एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों का अतिक्रमण न करे। Encroachment of jurisdiction न हो ऐसी अपेक्षा संविधान की है। विभिन्न धाराओं/articles में इसका उल्लेख है। उन धाराओं पर चर्चा हम किसी और कार्यक्रम में करेंगे। चूंकि ये तीनों स्तंभ अपने-अपने कार्यक्षेत्र में निष्पक्षता से काम करने को अपेक्षित हैं, इसी नाते कार्यपालिका का किसी भी और क्षेत्र की तरह राजनयीकरण होता है और कई ऐसे विषय आते हैं जिस कारण कार्यपद्धति की आलोचना और टीका-टिप्पणी होने लगती है और तुरंत मामले को न्यायपालिका के समक्ष रख दिया जाता है। अब न्यायपालिका के सामने जो मामले आते हैं, वे अगर सीधे कार्यपालिका या विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं तो न्यायपालिका से यह अपेक्षित है कि बहुत ही संयमित और संतुलित तरीके से उन चीज़ों को देखें। लेकिन जैसा कि मैंने कई बार कहा है कि judicial activism कई बार judicial overreach बन जाता है और जहां उन्हें संयम और नियंत्रण में रहना चाहिए, वहाँ जज थोड़े से डिग जाते हैं तो व्यवस्था में असंतुलन का खतरा रहता है।

लेकिन दूसरी तरफ न्यायपालिका के बारे में हमारी अवधारणा में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारा तंत्र बर्तानिया के Westminster system पर आधारित है और ब्रिटिश प्रभाव के कारण न्यायपालिका उसी दृष्टिकोण से चीज़ों को देखती है और काम करने की कोशिश करती है। इसी के तहत जब बंगाल से आए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने अपने आप को recuse कर दिया तो इसपर विचलित होने के बजाय मन में एक जिज्ञासा सी बनती है। इन्होंने अपने आपको recuse क्यों किया? क्या conflict of interest की बात थी?

Recuse शब्द लैटिन के recūsāre से आया है जिसका अर्थ होता है “to oppose”। यह प्रथा वादी और प्रतिवादी की ओर से शुरू हुई जब उन्हें किसी जज की निष्पक्षता पर संदेह हुआ। उस समय यह किसी जज को वादी या प्रतिवादी की आपत्ति के कारण हटाने की प्रक्रिया थी। बाद में जजों ने स्वयं को केसेज़ से हटाने की प्रथा शुरू की। यह एक परंपरा सी बन गई। इसमें कोई जज अपने आप को निष्पक्षता के मानदंड पर खरे उतरते हुए दिखने के लिए अपने आप को recuse करते हैं।

मुझे इस प्रक्रिया से आपत्ति इसलिए है क्योंकि recusal हमारी भारतीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। यदि बंगाल के दो केसेज़ की बात करें तो दोनों मामले बंगाल के थे और दोनों जज भी बंगाल से ही आते हैं। इसके तार NJAC से जुड़े हैं। मैं हमेशा कहता हूँ की जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता कम है। कई तरीकों से जजों की नियुक्ति होती है जैसे आरक्षण से, जातिगत आधार पर, भाई-भतीजावाद से आदि। NJAC शायद इसी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। चूँकि यह नियुक्ति के बारे में था, इसका नाम रखा गया National Judicial Appointments Commission लेकिन लोग उसे National Judicial Accountability Commission भी बोलते हैं क्योंकि यह पारदर्शिता के बारे में भी है। यह कार्यपालिका की और से संसद में एक सर्वसम्मति से लाया गया बिल था, उसपर लम्बी चर्चा भी हुई थी। लेकिन दुर्भाग्य से सुप्रीम कोर्ट ने शायद यह माना की यह उनके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण होगा। उन्होंने एक संविधान पीठ की घोषणा की जहाँ विषय पर चर्चा करके NJAC को निरस्त कर दिया गया। अब कम पारदर्शिता के तहत की गई नियुक्तियों पर राजनीति का आरोप लगना स्वाभाविक है।

बंगाल के मामले में शायद उन जजों को लगा होगा कि वे भी बंगाल से ही आते हैं, इसलिए उन्हें मामलों से हट जाना चाहिए। यहाँ उन्होंने स्वयं को निष्पक्ष दिखाने की भले ही कोशिश की हो, मैं उनके निर्णय से असहमत हूँ। यह भारतीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ है। भारत की न्याय व्यवस्था के सन्दर्भ में प्रेमचंद के ‘पञ्च परमेश्वर’ को याद कीजिए। कोई व्यक्ति जब पञ्च बन जाता है तो साथ ही वह परमेश्वर हो जाता है। समाज के जिन भागों से जज आते हैं और यदि वे पहले सफल वकील भी रहे हों तो बहुत सारे केसेज़ के साथ उनका जुड़ाव हो सकता है, लेकिन जज बन जाने के बाद उनसे अपेक्षित है कि वे अपने अतीत के पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाएँ। यदि वे पुराने पूर्वाग्रहों से अब भी लिप्त हैं, तभी recusal की स्थिति बनेगी। भारतीय व्यवस्था में recuse करने का अर्थ हुआ कि जज ने स्वयं को ‘पञ्च परमेश्वर’ के सिद्धांत से अलग कर लिया यानि जज होने के बावजूद मानसिक रूप से वे स्वयं को निष्पक्ष नहीं मानते। आप केवल केस क्यों, किसी विचारधारा से भी जुड़े हो सकते हैं, लेकिन आप कैसे कह सकते हैं कि उस कारण निष्पक्ष नहीं रहे? यदि एक विषय पर उनकी निष्पक्षता पर संदेह हो तो कई और विषयों पर भी उनकी निष्पक्षता पर संदेह की संभावना रहती है। हमारे समाज की हर इकाई एक दूसरे से ऐसी जुड़ी हुई है कि कोई व्यक्ति पूर्णतया एक द्वीप की तरह अन्य लोगों से अलग नहीं हो सकता। कोई जज किसीका रिश्तेदार है, किसी को जानने वाला है, तो क्या conflict of interest से कोई जज कभी बच सकता है? यदि कोई जज ‘पञ्च परमेश्वर’ के सिद्धांत को न माने तो वह हमेशा निष्पक्षता के विषय पर दुविधा में रहेगा। जब किसी केस में पक्षपात स्पष्ट रूप से दिखने लगता है तब जज अपने आप को recuse करता है, लेकिन ऐसा करते हुए वह मान रहा है कि वह ‘पञ्च परमेश्वर’ के सिद्धांत को नहीं मानता। अतः यह प्रथा भारतीय समाज और व्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं है।

इसपर एक राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए कि कोई व्यक्ति जब जज बन जाता है तो उससे क्या-क्या अपेक्षाएँ होती हैं? कोई तभी जज बने जब वह स्वयं को हर केस के लिए निष्पक्ष समझे। यदि करियर में कभी उसे लगे कि किसी केस में वह निष्पक्षता का निर्वहन नहीं कर पाएगा तो उसे न्यायाधीश बनना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। Conflict of interest की स्थिति केवल किसी स्पष्ट मामले में नहीं बल्कि अनेक मामलों में बन सकती है। न्यायाधीश बनते समय लिए गए शपथ का भार उठाने के लिए क्या व्यक्ति की अंदरूनी नैतिक क्षमता है?

यहाँ यह समझना अति आवश्यक है कि 19वीं सदी से चली आ रही ब्रिटिश प्रथा भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।

NJAC कोई प्रस्ताव नहीं था बल्कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित कानून था। उसको सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा निरस्त करना उस समय की एक बहुत बड़ी घटना थी। कार्यपालिका जब बहुत बलशाली हो जाती है तो कई बार न्यायपालिका के निर्णयों को भी बदल देती है जैसे कि शाह बानो के मामले में किया गया था। उस केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया था। लेकिन तत्कालीन सरकार ने अपने बाहुबल का प्रयोग कर तुष्टिकरण की राजनीति के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के उत्तम निर्णय को निरस्त कर दिया। अतः कार्यपालिका और विधायिका में भी यह क्षमता होती है कि वह न्यायपालिका के किसी फैसले को पलट दे, लेकिन वह एक बहुत ही अशोभनीय स्थिति है, जिससे बचना चाहिए। यह लोकतंत्र के एक स्तंभ द्वारा दूसरे स्तंभ पर प्रभुत्व स्थापित करने की मानसिकता को उजागर करता है। इससे बचे रहने से ही संविधान की और प्रजातंत्र की सुन्दरता कायम रहेगी।

जहां तक contempt of court से बचने का सवाल है, समाज में न्यायपालिका को अभी भी अन्य स्तंभों और संस्थाओं की अपेक्षा बेहतर दृष्टि से देखा जाता है, sacrosanct माना जाता है। यदि लोग न्यायपालिका के बारे में कोई बात ठीक न लगने पर भी अपनी प्रतिक्रियाओं में संयम बरतते हैं तो यह एक स्वस्थ परंपरा है। न्यायपालिका के किसी भी निर्णय से एक पक्ष की जीत और दूसरे पक्ष की हार होती है। ऐसे में यदि हारा हुआ पक्ष आलोचनात्मक रवैया अपना ले तो एक अस्वस्थ परंपरा की शुरुआत होगी। संवैधानिक आधार पर न्यायपालिका की बनी व्यवस्था को इससे ठोकर लगेगी। किसी फैसले के सभी पहलुओं पर विचार करके ही उसपर कुछ कहा जाए क्योंकि राजनीतिक क्षेत्र की तरह असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हुए भी कार्यपालिका के निर्णयों के विरोध करने की ग़लत परंपरा तो चल ही रही है और वैसी अस्वस्थ परंपरा से न्यायपालिका पर दाग़ नहीं लगाना चाहिए। इससे न्यायपालिका को बचाने की ज़रूरत है। हर व्यक्ति इसपर चर्चा न करे। कोई ऐसा व्यक्ति जिसे विषय की समझ हो, वह इसपर संयमित और संतुलित रूप से अपने विचार रख सकता है। यह एक tightrope walk है।

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