त्रिपुरा में अप्रत्याशित हार के बाद माकपा नेता वृंदा करात जी पत्रकारों के बीच कह रही थी कि धन बल के सहारे भाजपा को राज्य में सफलता मिली। मतलब वामपंथी नेता अपनी हार के कारणों की समीक्षा करने के लिए तैयार तक नहीं हैं। वे खुल्लमखुल्ला जनादेश का अपमान करने पर तुली हुई हैं।

हमारे वामपंथी भाई यह मत भूलें कि अगर धन की ताक़त से ही चुनाव जीते जाते तो फिर इस देश में सिर्फ़ करोड़पति-अरबपति ही चुनाव जीत पाते। दरअसल त्रिपुरा में बौद्धिकता के अहंकार में चूर वामपंथ और धकोसलापंथ की हार है। सिर्फ़ जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में भाषण देने से चुनाव मैदान नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए जनता के बीच में काम करना होता है। जनता के सुख-दुख में शामिल होना पड़ता है। किसी भी राज्य में पैर जमाने के लिए लंबी मशक्कत करनी होती है। आप कन्हैया ‘आजादी’ कुमार सरीखे नेताओं के बल पर आगे नहीं बढ़ सकते। देश को कोसने से आपको वोट नहीं मिलते।

विलुप्त होने की वजह

त्रिपुरा में पिछले 25 सालों से लगातार लेफ्ट की सरकार थी। उसे उस दल ने शिकस्त दे दी जिसके पास पिछले चुनाव में मात्र 2 फ़ीसद से भी कम वोट का शेयर था। लेफ्ट की सीटों की संख्या 59 से घटकर 16 रह गई है। करात से लेकर येचुरी सरीखे तमाम अंग्रेज़ीदां नेताओं को समझना होगा कि वे क्यों विलुप्त होते जा रहे हैं? इसके पीछे सिर्फ़ एंटी इनकंबेसी वाला कारण ही नहीं हो सकता। इनके येचुरी तथा करात सरीखे नेता अब केवल कैंडिल मार्च निकाल सकते हैं। कोई प्रभावी जन आन्दोलन तो इनके बस का अब तो रहा ही नहीं। इसीलिए अब इन्हें जनता तेज़ी से ख़ारिज करती जा रही है।

वैसे देश ने इनका असली चेहरा पहली बार देखा था 1962 में चीन से जंग के वक्त। तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने राजधानी के बारा टूटी इलाक़े में चीन के समर्थन में एक सभा तक आयोजित करने की हिमायत की थी — हालांकि वहां पर मौजूद लोगों ने तब आयोजकों को अच्छी तरह पीट दिया था।

इसके अलावा वामदलों के अधिकतर राज्यों में सिकुड़ने का एक अहम कारण यह भी रहा कि इनके गैर जिम्मेदाराना हरकतों से छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद होती रही हैं। इसके चलते वामपंथी ट्रेड यूनियन आंदोलन कमज़ोर पड़ गया और वाम नेता दूसरे किसी मुद्दे पर कोई विशेष छाप भी नहीं छोड़ सके। इन्होंने संगठन के स्तर पर भी कोई ज़मीनी काम नहीं किया, सिवाय इसके कि फ़र्ज़ी एन.जी.ओ. बनाकर सरकारी योजनाओं का पैसा कांग्रेस के सहयोग से भरपूर लूटा और हर तरह की मौज-मस्ती करने में अपना समय और लूट के धन का अपव्यय किया।

एक ख़बरिया टीवी चैनल पर एक लेफ्ट नेता बड़ी ही मासूमियत के साथ कह रहे थे कि 44 फ़ीसद मतों के साथ आज भी माकपा त्रिपुरा में सबसे बड़ी पार्टी है। वे प्रश्न पूछते हैं कि हम कहां हारे, हारी तो कांग्रेस है? उसे पिछली बार के 36 फ़ीसद की तुलना में सिर्फ 2 फ़ीसद मत मिले हैं। ज़ाहिर है कि ये वामपंथी कभी भी सीखने वाले नहीं है। शायद इसीलिए इनका इस देश में नामलेवा तक भी नहीं रहेगा

अब तो ये वामपंथी मात्र केरल में ही रह गए हैं। ये अब जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के अलावा किसी भी जगह के नौजवानों को अपनी तरफ़ नहीं खींच पा रहे हैं। माकपा के कुल सदस्यों में मात्र 6.5 फ़ीसद ही 25 साल से कम उम्र के रह गए हैं। माकपा का नेतृत्व तो बुज़ुर्गों से भरा पड़ा है। नेतृत्व में नौजवान तो नाममात्र के ही हैं। माकपा की एक ताज़ा रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि माकपा की विशाखापट्नम में 2015 में हुये अधिवेशन में 727 नुमांइदों ने भाग लिया। उनमें सिर्फ़ दो ही 35 साल से कम उम्र के थे। यानी माकपा से अब नौजवानों का मोहभंग होता जा रहा है। अब माकपा और पश्चिम बंगाल की ही बात कर लीजिए। बंगाल पर माकपा ने 1977 से लेकर 2011 लगातार 34 वर्षों तक राज किया। ज्योति बसु लंबे समय तक माकपा के नेतृत्व वाली वाम सरकार के अति प्रभावशाली मुख्यमंत्री थे। पर अब बंगाल में भी माकपा लोकसभा और राज्य सभा के चुनाव बार-बार हार रही है।

सेना पर भी सवाल

बीते दशकों से वाम दलों का नेतृत्व जन भावनाओं से पूरी तरह से हटकर अपनी रही रहाई लाइन ही ले रहा है। जब सारा देश भारतीय सेना के पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक पर गर्व कर रहा था तब वाम दल कह रहे थे कि सरकार सफ़ेद झूठ बोल रही है। वे संसद में और संसद के बाहर भी भारत सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक का साक्ष्य मांग रहे थे। वैसे तो वामदल अपने को ग़रीब-गुरबा के हितों का सबसे मुखर प्रवक्ता बताते हैं। अपने मुँह मियां मिट्ठू बनते रहते हैं I आखिर इन्होंने कब हाल के वर्षों में महंगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी जैसे सवालों पर कोई आंदोलन छेड़ा है?

कितनी करते दलितों की चिंता

सच माने तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वामपंथी दलों के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। ये प्राइवेट सेक्टर में दलितों के लिए नौकरियों में पद आरक्षित करने की मांग करते रहते हैं। पर आपको इनके पोलितब्यूरो में शायद ही कोई दलित मिले। वहां तो सब के सब सवर्ण जातियों के नेता हैं। एक बार इस संबंध में प्रकाश करात से जब किसी पत्रकार द्वारा पूछा गया तो उनके पसीने छूटने लगे। अभी तक तो माकपा के शिखर पर ब्राहमण, कायस्थ और दूसरी ऊंची जातियों के नेता ही शिखर पर रहे हैं।

माकपा की गतिविधियों पर लंबे समय से नज़र रखने वाले कहते हैं कि हालांकि माकपा “जाति तोड़ों” की बात करती है, ख़ुद माकपा में सिर्फ़ ऊंची जातियाँ ही छाई रही हैं। करात और येचुरी क्यों माकपा की पोलितब्यूरो में दलितों और पिछड़ों के लिए जगह आरक्षित नहीं करवाते? इनके इन्हीं दोहरे मापदंडों के कारण इनकी हर तरफ़ से ज़मीन खिसक चुकी है। इनके नेताओं का जनता से सीधा संपर्क-संबंध समाप्त हो चुका है।

एक ऐसा भी दौर रहा जब लेफ्ट दलों के पास हरकिशन सिंह सुरजीत, भोगेन्द्र झा, अमृत श्रीपाद डाण्गे, इंद्रजीत गुप्त, चतुरानन मिश्र, रामावतार शास्त्री, सोमनाथ चटर्जी, भूपेश गुप्त जैसे जन नेता थे। ये सही अर्थ में जनता के बीच काम करते थे। ये अपने ढंग से ईमानदार जनसेवक नेता थे। जनता इनकी विचारधारा से सहमत या असहमत होते हुए भी इनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। पर अब वो पीढ़ी जा चुकी है।मौजूदा लेफ्ट दलों के नेता सुनिश्चित कर रहे हैं कि ये इतिहास के पन्नों तक में ही रह जाएं।

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