Wednesday 7 December 2022
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राजनाथ सिंह द्वारा PoK वापस लेने का हुंकार, लेकिन क्या गिलगित-बाल्टिस्तान भारत-शासित हो सकता है?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार (27 अक्टूबर) को कहा कि भारत ने "उत्तर की ओर चलना बस अब शुरू ही किया है", और यात्रा तब समाप्त होगी जब "हम … शेष हिस्सों (पीओके), गिलगित और बाल्टिस्तान तक पहुंच जाएंगे"।  उन्होंने कहा कि इसके द्वारा 22 फरवरी 1994 को भारत की संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव लागू हो पाएगा।

गिलगित-बाल्टिस्तान क्या और कहाँ है?

गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान द्वारा प्रशासित सबसे उत्तरी क्षेत्र है जो पाकिस्तान को चीन से ज़मीन द्वारा जोड़ने का एकमात्र रास्ता है। इसके अंत में चीन का झिंजियांग राज्य की सीमा शुरू होती है। गिलगित-बाल्टिस्तान के पश्चिम में अफगानिस्तान है, इसके दक्षिण में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है, और पूर्व में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर है।

भारत के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान भारतीय क्षेत्र है, जम्मू और कश्मीर की पूर्व रियासत का हिस्सा है, जो स्वतंत्रता के बाद पूर्ण रूप से भारत में शामिल हो गया था पर आज़दी  के कुछ महीनों बाद से ही अवैध पाकिस्तानी क़ब्ज़े में रहा है। यह भारत के मानचित्र का वो हिस्सा है जिसे कई बार अंतरराष्ट्रीय आधिकारिक एवं निजी माध्यमों में भारत के भाग जैसा नहीं दिखाया जाता जिसपर भारत सरकार तथा भारी संख्या में भारत की जनता आपत्ति उठाती हैं।

गिलगित जम्मू और कश्मीर की रियासत का हिस्सा था, लेकिन इस पर सीधे अंग्रेजों का शासन था, जिन्होंने इसे 1935 में मुस्लिम बहुल राज्य के हिंदू शासक हरि सिंह से लीज पर लिया था।

सन 1947 के 22 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह द्वारा कश्मीर को भारत में विलय करवाने की अपील के बाद पाकिस्तानी सेना के साथ पश्तून आदिवासी मिलिशिया ने कश्मीर घाटी में प्रवेश किया और ऑपरेशन गुलमर्ग नामक एक योजना के तहत श्रीनगर की ओर कूच किया। रास्ते में बारामूला में लश्करों ने जमकर लूटपाट की।

हरि सिंह ने तुरंत 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर का भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। भारतीय सेना तब कश्मीर घाटी में उतरी और पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को पीछे धकेलने के लिए एक अभियान शुरू किया।

लेकिन गिलगित में क्या हो रहा था?

इसी बीच गिलगित में हरि सिंह के विरुद्ध विद्रोह छिड़ गया था। 1 नवंबर को गिलगित-बाल्टिस्तान की क्रांतिकारी परिषद नामक एक स्थानीय राजनीतिक संगठन ने गिलगित-बाल्टिस्तान के स्वतंत्र राज्य की घोषणा की।

नवंबर की 15 तारीख़ को इस समूह ने घोषणा की कि वह पाकिस्तान में शामिल हो रहा है। पाकिस्तान ने परिग्रहण को स्वीकार कर लिया और घोषणा की कि यह क्षेत्र फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन के तहत शासित होगा। यह एक क़ानून था जिसे बर्तानिया की हुकूमत ने उत्तर पश्चिम के अशांत आदिवासी क्षेत्रों पर नियंत्रण रखने के लिए प्रख्यापित किया था।

अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में गिलगित स्काउट्स नामक एक छोटी सी सेना खड़ी की थी। इसका काम गिलगित की रक्षा करना था। कहने को तो यह सेना महाराजा को संरक्षण प्रदान कर रही थी, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य गिलगित एजेंसी को प्रशासित करने में अंग्रेजों की मदद करना था क्योंकि यह प्रान्त उस समय सोवियत-ब्रिटिश ग्रेट गेम क्षेत्र की सीमा पर था।

अगस्त 1947 में अंग्रेजों द्वारा हरि सिंह को गिलगित लौटाए जाने के बाद महाराजा ने अपने प्रतिनिधि ब्रिगेडियर घनसार सिंह को गिलगित के राज्यपाल के रूप में भेजा। लेकिन विलियम अलेक्जेंडर ब्राउन नामक एक ब्रिटिश मेजर के नेतृत्व वाले गिलगित स्काउट्स इस निर्णय के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए।

फिर उसी साल 1 नवंबर को मेजर ब्राउन ने गवर्नर घनसार सिंह को सुरक्षात्मक हिरासत में ले लिया और अपने मुख्यालय पर पाकिस्तानी झंडा फहराया। गिलगित स्काउट्स तब बाल्टिस्तान पर कब्जा करने के लिए चले गए, जो उस समय लद्दाख का हिस्सा था और स्कार्दू, कारगिल और द्रास पर कब्जा कर लिया। पर भारतीय सेना ने अगस्त 1948 में कारगिल और द्रास को वापस ले लिया।

आगे 1 जनवरी 1949 के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम के बादअगले वर्ष अप्रैल में पाकिस्तान ने तथाकथित आज़ाद जम्मू और कश्मीर की कथित तात्कालिक सरकार के साथ एक समझौता किया ― अपनी रक्षा और विदेशी मामलों को संभालने के लिए। इन हिस्सों पर पाकिस्तानी सैनिकों का कब्जा था और अनियमित थे। समझौते के तहत तथाकथित एजेके सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन भी पाकिस्तान को सौंप दिया।

हालांकि भारत की तरह पाकिस्तान भी गिलगित-बाल्टिस्तान को कश्मीर का हिस्सा मानता है, इसकी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ से भिन्न हैं। PoK का अपना संविधान है जो पाकिस्तान के साथ अपनी शक्तियों और उनकी सीमाओं को निर्धारित करता है, लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान पर ज़्यादातर कार्यकारी क़ानूनी शासन लागू है। साल 2009 तक इस क्षेत्र को केवल उत्तरी क्षेत्र कहा जाता था।

इसे अपना वर्तमान नाम साल 2009 के गिलगित-बाल्टिस्तान (सशक्तिकरण और स्व-शासन) आदेश द्वारा मिला। इस आदेश के चलते उत्तरी क्षेत्र विधान परिषद (NALC) बदलकर विधान सभा बन गए। एनएएलसी एक निर्वाचित निकाय था, लेकिन कश्मीर मामलों और उत्तरी क्षेत्रों के मंत्री, जिन्होंने इस्लामाबाद से शासन किया था, के लिए एक सलाहकार भूमिका से अधिक नहीं था।  विधान सभा में केवल एक मामूली सुधार किया गया। इसमें 24 सीधे निर्वाचित सदस्य और नौ मनोनीत सदस्य हैं।

साल 2018 में तत्कालीन पीएमएल (एन) सरकार ने विधानसभा को दी गई सीमित शक्तियों को भी केंद्रीकृत करने का एक आदेश पारित किया जो कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के तहत योजना बनाई जा रही बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि और अन्य संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की आवश्यकता से जुड़ा हुआ है।

आदेश को चुनौती दी गई और 2019 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया और इमरान खान सरकार से इसे शासन सुधारों के साथ बदलने के लिए कहा। ऐसा नहीं किया गया।

इस बीच पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र को गिलगित-बाल्टिस्तान तक बढ़ा दिया और अगले विधान सभा चुनाव तक एक कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था की।

यहाँ पिछला चुनाव जुलाई 2015 में हुआ था और विधानसभा का पंच वर्षीय कार्यकाल जुलाई 2020 में समाप्त हुआ था। महामारी के कारण नया चुनाव नहीं हो सका।

फिर 1 नवंबर 2020 को तत्कालीन प्रधान मंत्री इमरान खान ने घोषणा की कि उनकी सरकार इस क्षेत्र को "अस्थायी प्रांतीय दर्जा" देगी।  यह अभी तक नहीं हुआ है, अगर आगे ऐसा होता है तो गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान का पाँचवा प्रदेश बन जाएगा।

भारत इन घटनाक्रमों को कैसे देखता है?

भारत की राय विषय पर स्पष्ट और सुसंगत रही है ― कि जम्मू और कश्मीर की पूरी पूर्व रियासत भारत की है। भारत ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का एक प्रांत बनाने की योजना पर आपत्ति जताई है और हाल के दिनों में कई बार कहा है कि वह यह भूभाग भारत का ही है।

साल 2020 के 11 मार्च को सरकार ने संसद को बताया कि भारत की 22 फरवरी 1994 को दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित संसद प्रस्ताव में प्रतिपादित सुसंगत और सैद्धांतिक मत यह है कि जम्मू व कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश भारत के अभिन्न अंग हैं और रहेंगे।"

भारत ने कहा कि "सरकार पाकिस्तान के अवैध और जबरन कब्जे वाले क्षेत्रों सहित भारत के क्षेत्रों में होने वाली सभी घटनाओं की निगरानी करती रहती है।"

गिलगित-बाल्टिस्तान में लोग क्या चाहते हैं?

गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग वर्षों से मांग कर रहे हैं कि इसे पाकिस्तान का हिस्सा बनाया जाए ताकि उन्हें वही संवैधानिक अधिकार मिले जो पाकिस्तानियों के पास हैं। ये लोग शारीरिक और सांस्कृतिक रूप से भारत से बहुत भिन्न हैं और इनका भारत से बहुत कम जुड़ाव है। कुछ लोगों ने पूर्व में पीओके के साथ विलय की मांग की थी, लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों का कश्मीर से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। वे कई ग़ैर-कश्मीरी जातियों से ताल्लुक रखते हैं, और विभिन्न भाषाएं बोलते हैं, इनमें से कोई भी कश्मीरी नहीं है।

अनुमानित 1.5 मिलियन गिलगित-बाल्टिस्तान निवासियों में से अधिकांश शिया हैं। शियाओं को निशाना बनाने वाले चरमपंथी सांप्रदायिक उग्रवादी समूहों और उनके प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर हुक्म चलाने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा है, लेकिन प्रमुख भावना यह है कि पाकिस्तानी संघ का हिस्सा बनने के बाद यह सब सुधर जाएगा। स्वतंत्रता के लिए एक छोटा सा आंदोलन है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत ही सीमित है।

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