बंगला प्रकरण— राजनाथ व कल्याण ने मारी बाजी

अखिलेश यादव ने भी राज्य संपत्ति विभाग को पत्र लिखकर दो साल की मोहलत मांगी है

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समाज जीवन में कई बार परित्याग करने वाले बाजी मार लेते हैं। समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है। जबकि भौतिक संसाधन को बचाने का प्रयास करने वाले पीछे रह जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगला प्रकरण में यही हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला आवंटन को संविधान की भावना के प्रतिकूल माना था। राजनाथ सिंह और कल्याण सिंह ने इस निर्णय का सम्मान किया। दूसरी तरफ तीन पूर्व मुख्यमंत्री बंगला बचाने के प्रयास में है। कोई कोर्ट गया। किसी ने बोर्ड बदलवा दिया। राजनीति में महत्वपूर्ण मुकाम हासिल करने और महान होने के बीच बड़ा अंतर होता है। समाज के लिए स्वेच्छा से त्याग करने वाले ही महापुरुष होते हैं। इतिहास उन्हें याद रखता है। लोग या उनके अनुयायी उनसे प्रेरणा लेते हैं। महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय, भीमराव आम्बेडकर, राम मनोहर लोहिया आदि सभी ने समाज के लिए त्याग किया। कांशीराम ने भी अपने समाज के लिए निजी सुविधाओं को त्याग दिया था। एक बार अपना घर छोड़ा तो पलट कर उधर देखा भी नहीं।

वर्तमान समय में भी कुछ अपवाद है, लेकिन आमतौर पर आज के नेता त्याग की उस भावना से प्रेरित नहीं हैं। इन्हें अपने और अपने परिजनों के भौतिक संसाधनों के प्रति गहरी आसक्ति या मोह होता है। अब तो लालबहादुर शास्त्री का जमाना भी नहीं रहा, जब उन्होंने विभागीय गलती की नैतिक जिम्मेदारी लेकर रेल मंत्री का पद छोड़ दिया था। अब जब तक कुर्सी पर न बन आये, उसे छोड़ने का मन नहीं होता। मतलब समाज और संविधान से प्राप्त तो बहुत कुछ होता है। धन, वैभव, समस्त भौतिक संसाधन, भारी सुरक्षा आदि। लेकिन समाज के लिए त्याग के अवसर नहीं मिलते। इस पूरे सन्दर्भ को सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश से जोड़ कर देखिए, जिसमें उसने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी बंगले खाली करने को कहा था। यदि इस समय उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार न होती तो इस संबन्ध में कोई समस्या नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने तो पिछली सरकार के समय भी आदेश दिया था। लेकिन तब विधानसभा ने बहुमत से उसका काट निकाल लिया था। लखनऊ में रहने वाले सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को इससे राहत मिली थी। लेकिन इस बार जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया, उस समय तक सरकार बदल चुकी थी। मुख्यमंत्री ने न्यायिक आदेश की अवहेलना संबन्धी कोई कदम नहीं उठाया। राज्य संपत्ति विभाग न्यायिक निर्देश के अनुरूप कार्य कर रहा था। इसी दौरान असलियत सामने आने लगी।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह ने निर्धारित अवधि में बंगला खाली करने का निर्णय लिया। राजनाथ सिंह भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। कल्याण सिंह राज्यपाल होने के कारण दलगत राजनीति से ऊपर हैं। लेकिन वह भी भाजपा की पृष्ठभूमि से हैं। इन दोनों नेताओं को भी उच्च श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है। इन्होंने एक बार भी सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय की काट निकालने का प्रयत्न नहीं किया। कल्याण और राजनाथ के किसी प्रतिनिधि ने इस संबन्ध में मुख्यमंत्री से कोई बात नहीं की। विचार इस बात पर भी होना चाहिए कि इस मसले पर भाजपा पृष्ठभूमि वाले नेताओं का आचरण एक जैसा क्यों था। इन्होंने न्यायपालिका के आदेश का पूरा सम्मान किया। दूसरी तरफ क्षेत्रीय पार्टियों का आचरण अलग तरीके का था।

उत्तर प्रदेश की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों के मुख्यमंत्री सरकारी बंगले के प्रति मोह में जकड़े दिखाई दिए। एक पूर्व मुख्यमंत्री वर्तमान मुख्यमंत्री से मिलने पहुंच गए। बताया गया कि वह फार्मूला बताने गए थे। जिससे न्यायपालिका के निर्णय पर अमल भी हो जाएगा और बंगला भी उनके पास बना रहे। बचाव का यह एक प्रयास था। दूसरे प्रयास में उनकी तरफ से राज्य संपत्ति विभाग को दो वर्ष की मोहलत का पत्र लिखा गया। दूसरी पूर्व मुख्यमंत्री ने आवास तो बदला, लेकिन इसी के साथ पहले वाले आवास की तख्ती भी बदल दी। पहली बार लोगों को पता चला कि यह तो यादगार स्मारक था। वह इसके एक कोने में केवल देखभाल के लिए रहती थीं। उनके प्रतिनिधि इस आशय की जानकारी देने मुख्यमंत्री के पास गए थे। मतलब सुप्रीम कोर्ट ने बंगला खाली करने का आदेश न दिया होता तो यह रहस्य उजागर ही नहीं होता। इतना ही नहीं, इस मसले को सीधे जन आन्दोलन से जोड़ दिया। यह कहा गया कि यदि खाली कराया गया तो स्थिति बदल सकती है। क्या यह माना जाए कि पार्टी के समर्थक केवल इसीलिए हैं। वह न्यायपालिका के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे, वह उस बंगला को बचाने के लिए संघर्ष करेंगे, जिसकी तरफ देखने तक की उन्हें इजाजत नहीं थी। यादगार स्मारक के रूप में इसका कब प्रयोग हुआ, कोई नहीं जानता।

यह प्रसंग केवल पूर्व मुख्यमंत्रियों तक सीमित नहीं है। अनेक लोग स्मारक के नाम पर भव्य सरकारी बंगलों पर काबिज हैं। स्मारक और आवास में बहुत अंतर होता है। स्मारक में किसी गृहस्थ का रहना वर्जित होता है। यह नैतिक और कानूनी रूप से भी गलत है। कुछ वर्ष पहले कोर्ट के निर्णय के बाद अजित सिंह को दिल्ली स्थित बंगला खाली करना पड़ा था। वह चौधरी चरण सिंह के नाम पर स्मारक बना कर सपरिवार उस भवन का सुख उठा रहे थे। इस प्रकार की प्रवृत्ति अनुचित है। सबसे बड़ी बात है, ऐसे लोगों में कोई भी आर्थिक रूप से कमजोर नहीं है। इनकी घोषित संपत्ति को देखते हुए सरकारी भवन का मोह अजीब लगता है। ये इस घोषित सम्पत्ति से भवन और स्मारक बनवा सकते हैं। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की ऐसे जुगाड़ों से प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती है। बंगला खाली न करना पड़े, इसलिए दूसरा बोर्ड लगवाना प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है। अखिलेश यादव ने भी राज्य संपत्ति विभाग को पत्र लिखकर दो साल की मोहलत मांगी है। जब मायावती यूपी की मुख्यमंत्री थीं, तो उनके बंगले के पास ही कांशीराम विश्राम स्थल हुआ करता था। बाद में इसको उन्होंने अपने बंगले से जोड़ लिया। मायावती ने अब दोनों आवासों को एक कर दिया। उत्तर प्रदेश के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगले की सुविधा देने वाला कानून सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए कहा कि पद छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री और आम आदमी में कोई फर्क नहीं रहता। ऐसे में उसे बंगले की विशेष सुविधा क्यों मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा पद छोड़ने के बाद बंगले में रहना संविधान के तहत नहीं है।

जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर भानुमति की बेंच ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री स्थायी तौर पर सरकारी आवास में नहीं रह सकते। सपा या बसपा की सरकार हो तो यों रास्ता निकल आता। अखिलेश सरकार ने पुराने कानून में संशोधन कर यूपी मिनिस्टर सैलरी अलॉटमेंट एंड फैसेलिटी अमेंडमेंट एक्ट 2016 विधानसभा से पास करा लिया था। इसमें सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास की सुविधा बहाल हो गई थी। इस बार योगी आदित्यनाथ की सरकार होने के कारण बात नहीं बनी। वह इस प्रकार की सुविधाओं के लिए समाजसेवा में नहीं आये हैं। वैसे भी न्यायपालिका के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए।

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