क्यों राहुल गांधी को अकेले करनी पड़ी कैलाश यात्रा [व्यंग्य]

राहुल गांधी ने कांग्रेस में अपने सलाहकारों से लेकर महागठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं तक, सभी से साथ चलने का आग्रह किया। किसकी क्या मजबूरी रही जानिए इस लेख से।

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चिरयुवा नेता व काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी का कर्नाटक में दिया हुआ वह वक्तव्य तो आपको याद ही होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि वो एक सच्चे शिवभक्त हैं, और कर्नाटक चुनाव के उपरांत कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा पर जाएंगे। हुआ यूँ कि दिल्ली से हुबली जाते हुए गांधी के विमान में कुछ तकनीकी ख़राबी आ गई, जिसके फलस्वरूप वह तेजी से नीचे की ओर जाने लगा। ऐसे में प्रायः लोगों को नानी याद आती है, पर क्योंकि चुनाव नजदीक थे और वे कुछ समय पहले ही इटली से लौट कर आए थे, इस वस्तुस्थिति में उन्होंने भगवान शंकर को याद करना उचित समझा।

अपनी चुनावी सभा में उन्होंने कैलाश की पावन यात्रा पर जाने की अपनी मन की बात भी बता दी। उन्होंने कहा कि उनका विमान गिरते-गिरते 8,000 फीट नीचे आ गया था। हालांकि उन्होंने यह पुष्टि नहीं की कि उन्होंने 8,000 फीट की ऊँचाई को कैसे नापा। पर किसी कार्यकर्ता ने उनसे पूछा भी नहीं क्योंकि सभी मान कर चलते हैं कि राहुल को जो लिखकर दिया जाता है, जो वो वैसे का वैसा पढ़ देते हैं, इसमें उनका न तो कोई विचार होता है, न दोष। फिर गांधी ने कहा, “मैं कार्यकर्ताओं की अनुमति से 10-15 दिन का अवकाश लेकर कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाना चाहता हूँ।” यह सुनकर कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ता भावुक हो गए क्योंकि 70 वर्षों से नेहरू-गांधी परिवार ने कभी कोई काम कार्यकर्ताओं की अनुमति तो दूर, सहमति तक लेकर नहीं किया। यह पहली बार था जब कार्यकर्ताओं से कोई अनुमति ली जा रही थी, तो उन्होंने सहर्ष दे दी।

अनुमति लेकर श्री गांधी यात्रा पर निकल गए। हालांकि वो कैलाश की जगह अमेरिका की यात्रा पर निकले, पर ऐसा संभवतः इसलिए हुआ कि उन्हें अनुमान ही नहीं था कि कैलाश पर्वत अमेरिका नहीं, तिब्बत में है। कारण दिया गया कि वे अपनी माता का उपचार कराने के लिए गए हैं। भारत को एम्स जैसे आयुर्विज्ञान संस्थान देने का दम भरने वाली काँग्रेस की विश्वसनीयता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि उनके अध्यक्ष अपनी माता को उपचार के लिए विदेश लेकर जाने में अधिक विश्वास रखते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि गांधी अपना वचन भूल गए। उनका कहना है कि वो विदेश मंत्रालय की अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उधर मंत्रालय का कहना था कि उनके पास ऐसा कोई आवेदन गांधी की ओर से आया ही नहीं।

इसपर पलटवार करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता, जो भारत से अधिक समय पाकिस्तान में बिताते हैं, ने कहा, “गांधी आवेदन करने क्यों जाएं? सांसद चुनाव की उम्मीदवारी से लेकर काँग्रेस अध्यक्ष के पद तक सब कुछ उन्हें बिना आवेदन के ही अपने परिवार के नाम पर मिला है। यह तो केवल एक यात्रा भर है।” मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ काँग्रेस नेता, जो आतंकवादियों के प्रति अपने आदर भाव के लिए जाने जाते हैं, कहते हैं, “इस सरकार के शासन में देश का लोकतंत्र खतरे में है। गांधी — जो अपने प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तावित कानून को सार्वजनिक मंच से फाड़ दिया करते थे — उन्हें भी सरकार से अनुमति लेनी पड़ रही है। इससे अधिक लोकतंत्र को खतरा और क्या होगा?”

खोजबीन करने पर हमें कुछ नए तथ्य हाथ लगे जो मीडिया तक नहीं पहुंचे थे। दरअस्ल गांधी ने यह तीर्थयात्रा पहले ही शुरू कर दी थी, पर सुरक्षा कारणों से उसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया था। गांधी अपनी तीर्थयात्रा को लेकर बहुत उत्साहित थे। उन्हें यह जानकर बहुत हर्ष हुआ कि तीर्थस्थल में उन्हें कुछ भी लिखकर देने की आवश्यकता नहीं है। इससे न तो नेपाल दूतावास जैसी दुर्गम स्थिति पैदा होती है, जहां उन्हें शोक संदेश भी फोन से नकल करके लिखना पड़ा था, और न ही सोमनाथ मंदिर जैसी दुविधा, जहां उनका नाम ग़ैर-हिंदुओं की सूची में सम्मिलित किया गया था।

पर उनके लिए निराशा का विषय तब बना जब उन्हें पता चला कि यात्रा में कैमरा उनके साथ नहीं चलेगा। दलित के घर रोटी खाने और रात गुज़ारने का प्रपंच हो या किसानों के हित के नाम पर उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल में किया गया पॉलिटिकल-टूरिस्म, उनका प्रदर्शन हमेशा कैमरे के सामने ही हुआ है। बहरहाल, गांधी ने यह यात्रा प्रारम्भ करने का निर्णय लिया। सबसे पहले उन्होंने अपने सलाहकार मण्डल को यात्रा पर साथ चलने के लिए बुलाया। परंतु सभी सलाहकार यात्रा के लिए अयोग्य घोषित किए गए क्योंकि यात्रा के नियमों के अनुसार यात्रियों की अधिकतम आयु सीमा 70 वर्ष है जबकि गांधी के सलाहकार मण्डल में निम्नतम आयु 80 वर्ष है।

पर गांधी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होनें अपने युवा मित्रों का यात्रा के लिए आह्वान किया जो कि 2019 के महाठगबंधन, क्षमा चाहूँगा, महागठबंधन में उनके साथी हैं। सबसे पहले वे उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व युवा मुख्यमंत्री के पास गए और प्रस्ताव किया कि दोनों साईकल पर बैठकर जा सकते हैं। पर उन्होनें यह कहकर मना कर दिया कि पिछली बार राहुल के साथ बैठने पर साईकल लखनऊ तक भी नहीं पहुँच पाई, और कैलाश पर्वत तो और भी दूर है। कहा जाता है कि उनके मना करने का वास्तविक कारण था कि उनको अपने नए मकान में टूटियाँ और टाइल लगवाने थे।

इसके बाद गांधी ने बिहार के एक तेजस्वी युवा नेता का रुख़ किया। पर उन्होंने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पिता समेत उनपर भी रेलवे के आईआरसीटीसी घोटाले में आरोप-पत्र दाख़िल किया जा चुका है और ऐसे में वो पिता के पास जाने का कोई मौका नहीं छोडना चाहते। अगला क्रम हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेताओं का था, पर उन सभी ने कोई न कोई कारण बताकर अपने को इस यात्रा से अलग कर लिया। तभी उन्हें दिल्ली के युवा मुख्यमंत्री की याद आई। जब वे उनके घर न्यौता देने पहुंचे तो पता चला मुख्यमंत्री दिल्ली का मोहल्ला क्लीनिक छोडकर खुद बेंगलुरु इलाज कराने गए हैं। उन्होंने पंजाब की ओर रुख़ करना चाहा, पर सलाहकारों ने सलाह दी कि एक ही तो मुख्य राज्य बचा है जहां काँग्रेस का मुख्यमंत्री है, वहाँ तो उन्हें काम करने दिया जाए।

अंततः थक-हारकर उन्होंने जम्मू-कश्मीर की ओर अपने कदम बढ़ाए। उन्हें विश्वास था कि कश्मीर के युवा नेता, जो अक्सर कश्मीर के बजाए ट्विटर पर पाए जाते हैं, उनके साथ अवश्य आएंगे। उन युवा नेता ने साथ आने के लिए हाँ भी कर दी, लेकिन एक शर्त रखी कि अलगाववादी हुर्रियत नेताओं को भी साथ लेकर चलना होगा। पहले तो गांधी हिचकिचाए, लेकिन फिर उनको साथ लेने के लिए तैयार हो गए। परंतु हुर्रियत नेताओं ने भी यह कहकर मना कर दिया कि इससे उन आतंकवादियों में असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है जो हुर्रियत द्वारा पोषित हैं और अमरनाथ यात्रा में आतंक फैलाने के लिए भेजे गए हैं।

अंतिम समाचार मिलने तक गांधी जनेऊ धारण किए हुए अकेले ही हिमालय की ओर प्रस्थान करते हुए देखे गए थे।

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Rachit Kaushik
Software engineer based in Delhi

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