यह कहना, सोचना और उम्मीद करना छोड़ना होगा कि पैशाचिक बर्बर सभ्यताओं से घिरे इस देश और इसके मूल धर्म पर हमले होने बन्द हो जाएंगे। साथ ही छोड़ना होगा ऐसे हर हमले के बाद अपनी चुनी हुई सरकार को कोसना भी। हमले हो रहे हैं इसमें कोई बड़ी बात नहीं — वे डेढ़ हज़ार वर्षों से हर पल, हर क्षण कहीं न कहीं रक्तपात कर रहे हैं — अनवरत।

बड़ी बात यह है कि उनके हर हमले का दस गुना प्रचंड और भयानक जवाब दिया जाए। हर बार उनकी माँद में घुस कर उन्हें 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक की ही तरह दफ़नाने लायक न छोड़ा जाए; बल्कि उनके मरे, ज़िंदा और अधमरे जिस्मों के ढेर पर डीज़ल छिड़क कर उन्हें कटे हुए सूअरों की तरह जलाया जाए।

काफ़िरों की अंतड़ियाँ निकाल कर 72 हूरों के हरम में घुसने का ख़्वाब देखने वाले हर नरभक्षी जिहादी को अब यह डर होना ज़रूरी है कि उसकी लाश को क़ब्र की अब्राहमी आरामगाह नहीं, टट्टी के नाले में बहती राख़ ही नसीब होगी। और साथ ही ज़रूरी है ऐसे हर जिहादी पिशाच के आक़ाओं के दिल में यह ख़ौफ़ समाना भी कि उनकी ऐसी हर हरमज़दगी की ऐसा कमरतोड़ और विनाशकारी सज़ा दी जाएगी कि आख़िरकार एक दिन उनके सऊदी बाप भी इन हरमज़दगियों को घाटे का सौदा मानते हुए अपनी जेब हर बार जलाने से तौबा कर लेंगे।

और अब यही होगा, बार-बार होगा, हर बार होगा। अब ‘भगवा आतंकवाद’ को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताने वाले मिलावटी गोत्र वालों की सरकार नहीं है। अब वह सरकार है जो उन्हें और उनके पाले हुए जिहादी नरपिशाचों को उनके कुकर्मों का दण्ड दे रही है।

अपने ख़ून का उबाल कम न होने दें, लेकिन साथ ही विश्वास और धैर्य भी बनाए रखें। हमारे लोगों पर हिंसा जितनी उन्हें प्यारी है, अब उनके रक्त की प्यास हमें उससे कहीं ज़्यादा है।